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हाईकोर्ट के लगातार दबाव के बाद भी मुरथल गैंगरेप मामले में कोई प्रगति नहीं

राजीव खन्ना | Updated on: 4 March 2017, 8:43 IST

पिछले साल फरवरी में जाट आरक्षण आन्दोलन के दौरान सोनीपत जिले के मुरथल में हुए गैंगरेप मामले में अभी तक कोई प्रगति नहीं हो सकी है. पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार को लगातार आड़े हाथों लिया है कि इस वीभत्स अपराध के लिए जो भी जिम्मेदार हों, उनकी पहचान की जाए, उसे कटघरे में खड़ा किया जाए.

दो दिन पहले ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आड़े हाथों लेते हुए फिर कहा है कि यह विश्वास करने की कोई वजह है कि सोनीपत की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गगन प्रीत कौर पर दबाव बनाया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि मंगलवार को सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने मुरथल गैंग रेप मामले में जवाब दाखिल करने के लिए समय मांग था, इस पर कोर्ट ने सुनवाई 16 मार्च तक टाल दी.

सिर्फ बहानेबाजी

हालांकि, जस्टिस एसएस सरोन और जस्टिस दर्शन सिंह की खंडपीठ ने इसकी पूरी व्याख्या करने से इनकार कर दिया लेकिन यह कहा गया कि सोनीपत की अदालत और हाईकोर्ट के सामने जांच टीम जो नतीजे लेकर आई है, उसमें भिन्नता है.

कथित रूप से जांच टीम ने हाईकोर्ट को बताया है कि गैंगरेप मामले की जांच चल रही है जबकि जांच टीम ने सोनीपत की अदालत में कहा है कि अपराध से धारा 376 (डी) बाहर कर दी गई है. पीठ ने पिछली तारीखों में सोनीपत की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें न्यायाधीश ने कहा है कि जांच केवल बहानेबाजी है और मामले को बंद कर दिया गया है.

अनूठे तथ्य

18 जनवरी को कोर्ट ने एक बार फिर कड़े शब्दों में कहा था कि बलात्कार का आरोप आधारहीन नहीं है और सरकार की यह ड्यूटी है कि वह दोषियों की पहचान करे और उन्हें कटघरे में खड़ा करे. कोर्ट ने राज्य सरकार से सिलसिलेवार यह भी कहा कि वह दलील न दे कि मामले में कोई विश्वसनीय, चश्मदीद गवाह नहीं है या कोई दोषी नहीं है.

तथ्य तो यह कि मामले की अजीब बात यह है कि अदालत ने कई बार सरकार से कहा है कि वह मामले की जांच करे और अपराधियों को हिरासत में ले, पर कानून प्रवर्तन से जुड़ी एजेंसियां अभी तक पीड़ितों का भी पता नहीं लगा सकी हैं.

यह था मामला

गैंगरेप मामले को मजबूती तब मिली जब दो गवाह बॉबी जोशी और राजकुमार ने यह बयान दिया कि उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग पर सुखदेव ढाबा के पास खेतों में महिलाओं को खींचकर ले जाते हुए देखा है. ऐसी भी खबरें थी कि पुलिस ने उसी खेत से महिलाओं के कुछ अंर्तवस्त्र बरामद किए थे.

प्रारम्भिक रूप से, यह दिखाने की कोशिश की गई थी कि यह अंर्तवस्त्र बंजारिन महिलाओं के थे जो लोहे से घरेलू सामान बनाने का काम करती हैं. सूत्रों ने खुलासा किया कि जब इस थ्योरी का विपरीत असर होते दिखा तो पुलिस ने डीएनए परीक्षण के लिए पांच संदिग्धों के नमूने लिए जो आगजनी, हिंसा आदि मामलों में पकड़े गए थे. लेकिन जब डीएनए रिपोर्ट आई तो वह निगेटिव निकली. इससे धारा 376 (डी) को एफआईआर से निकालने में मदद मिली.

हाईकोर्ट नाराज

18 जनवरी के अपने अंतरिम आदेश में कोर्ट ने कहा है कि पिछले साल 26 अक्टूबर को पुलिस ने जो पूरक रिपोर्ट दाखिल की है, उससे यही प्रतीत होता है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (डी) (सामूहिक बलात्कार) और धारा 365 ( अपहरण या धमका कर ले जाना) के आरोपों को ड्रॉप कर दिया गया और वाकई में इसे इस तरह उल्लिखित किया गया है कि उसे हटा दिया गया है.

कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट का एफिडेविट पेश करे कि जांच से धारा 376 (डी) और 365 को नहीं हटाया हटाया गया है और यह धाराएं यथावत बनी हुईं हैं. आरोपियों पर अपराध साबित नहीं हुआ है.

घुमाव और बदलाव

पिछले एक साल में इस मामले में कई बदलाव हुए हैं. सरकार अभी तक किसी भी ठोस नतीजे पर पहुंचने में नाकामयाब रही है. इसकी शुरुआत राज्य पुलिस के दावे से हुई. पुलिस शुरुआत में ही घटना के इनकार के मोड में आ गई कि यह मामला एक क्षेत्रीय अखबार में छपी खबर के आधार पर है. लेकिन हाईकोर्ट ने मामले का स्वतःसंज्ञान लिया और सिविल सोसाइटी की ओर से दबाव पड़ा तब जाकर विशेष जांच दल का गठन किया गया.

लेकिन तब से न तो कोई पीड़ित आगे आया और न ही किसी अभियुक्त को घेरे में लिया गया. दिल्ली की एक महिला, जो अपने प्रारम्भिक बयानों के साथ मामले में आगे आई थी, वह भी दावे के समर्थन में दूसरा सबूत नहीं दे सकी है. कथित बलात्कार पीड़ितों में से एक, जो आस्ट्रेलिया की एनआरआई है, का एक मैसेज भी सोशल मीडिया पर आया था लेकिन उसने भी सबूत नहीं दिए हैं.

कोर्ट की चिन्ता

पिछले साल जाट आरक्षण के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने के आश्वासनों पर भी कोर्ट अपनी चिन्ता जता चुका है. यह भी कहा जाता है कि जाट आन्दोलन के सम्बंध में 2000 से ज्यादा दर्ज एफआईआर को सीबीआई को सौंपने पर कोर्ट ने अपनी मंशा जाहिर की है.

जाट आन्दोलन को लेकर 2000 से ज्यादा मामले विभिन्न थानों में दर्ज किए गए थे.

अदालत इसपर विचार कर रही की है कि मामलों को कानून की प्रक्रिया के तहत ही वापस लिया जाना चाहिए जहां अभियुक्त के खिलाफ कोई आरोप न बनता हो. यह भी संकेत किया गया है कि यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि मामलों को ऊपरी दबाव के चलते वापस लिया जा रहा है.

जाटों की दो बड़ी मांगें हैं जिनके चलते उन्होंने इस साल फिर आन्दोलन कर दिया है. मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने मामलों को छह माह में वापस लेने का समय तय किया था.

अब उनकी खुद की ही सरकार के एडवोकेट जनरल बलदेव राज महाजन ने बताया है कि मामले की जांच सीबीआई द्वारा की जा रही है, ऐसे में राज्य सरकार द्वारा मामले वापस नहीं लिए जा सकते हैं. अन्य मामलों में भी, सरकार द्वारा मामलों को वापस लेने की दिशा में कोई भी कदम उठाने पर अंसतुष्ट पक्ष कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है. सरकार को इसका भी भय बना हुआ है.

First published: 4 March 2017, 7:38 IST
 
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