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शिवपाल यादव: जसवंतनगर आग का दरिया है, डूब के जाना है

आदित्य मेनन | Updated on: 18 February 2017, 9:49 IST
कैच न्यूज़

‘इस बार इज्जत की लड़ाई है’, उत्तरप्रदेश के जसवंतनगर निर्वाचन क्षेत्र में एक ही राग है. समाजवादी पार्टी नेता शिवपाल सिंह यादव इस सीट पर पांचवीं बार खड़े हुए हैं, जिसमें यादव परिवार का गांव सैफई शामिल है. शिवपाल यादव को मुख्य चुनौती विपक्ष से नहीं है. उनके अपने ही परिवार, खासकर भाई राम गोपाल यादव और भतीजे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से चुनौतियां हैं. शिवपाल यादव के समर्थकों का आरोप है कि जसवंतनगर में दोनों उनके कैंपेन को नाकाम करने की कोशिश कर रहे हैं.

गुरुवार को इटावा में आयोजित एक रैली में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव के विरोध में वोट डालने के लिए सरे आम कहा. उन्होंने कहा, ‘जिन्होंने नेताजी और मेरे बीच खाई पैदा की है, इटावा के लोग उसे सबक सिखाने का काम करना.’ अपने भाषण में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके और मुलायम सिंह यादव के विरोध में ‘कुछ तत्व’ षडय़ंत्र रच रहे हैं और पार्टी के उम्मीदवार को हराने की कोशिश कर रहे हैं.

उन्होंने शिवपाल की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘पार्टी के खिलाफ उनके षडय़ंत्र का खुलासा हो गया था और अब वे कहते हैं कि उन्हें (सपा) विरासत से कुछ नहीं मिला.’ उन्होंने अपनी बात जारी रखी, ‘जिन पर हमने भरोसा किया था, वे मेरे और नेताजी के बीच दरार डालने की कोशिश कर रहे हैं.’

दूसरी ओर, शिवपाल यादव और उनके वफादारों पर कई निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी उम्मीदवारों के खिलाफ कैंपेन का आरोप लगाया जा रहा है. इन निर्वाचन क्षेत्रों में तीसरे चरण का मतदान 19 फरवरी को होगा. जसवंतनगर में शिवपाल अकेले कैंपेन चला रहे हैं. जसवंतनगर के पोस्टर्स, सूचना-पत्रों और बैनर्स, सभी में शिवपाल यादव को मुलायम सिंह यादव के साथ बताया गया है. कई पोस्टर्स में अखिलेश नहीं हैं. नारे भी शिवपाल पर केंद्रित हैं, जिनसे लगता है मानो उनका मान आहत हुआ है.

मुलायम का गढ़

मुलायम सिंह यादव ने इस क्षेत्र में अपना राजनीतिक कॅरियर ठीक 63 साल पहले शुरू किया था. तब उन्हें फरवरी 1954 में सिंचाई-शुल्क बढ़ाने का विरोध करने के लिए अपने गांव में पकड़ा गया था. 1950 के शुरुआती दशक में वे राम मनोहर लोहिया के प्रभाव में आए और इससे उनका राजनीतिक कॅरियर आगे बढ़ा.

1957 और 1962 में इस सीट से कांग्रेस-विरोधी विधायक चुने गए. जसवंतनगर से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विधायक नाथू सिंह ने मुलायम की क्षमताएं देखते हुए अपने साथ ले लिया. 1967 में मुलायम सिंह यादव ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर सीट जीती. इस सीट से परिवार को जोड़ा और अब आधी सदी से उनका यहां वर्चस्व बना हुआ है. उसके बाद 1996 में यह सीट शिवपाल सिंह यादव को देने तक वे केवल दो बार सीट हारे.

यादवों की सत्ता वाले जसवंतनगर में मुलायम को सबसे ज्यादा चुनौती अंदरूनी मिली. 1989 में कांग्रेस ने पूर्व लेफ्टिनेंट दर्शन सिंह यादव को उनके विरोध में खड़ा किया था. वे अगले 3 चुनावों में परिवार के मुख्य प्रतिद्वंद्वी रहे और 1993 में मुलायम को हराने तक की नौबत आ गई थी. एक घटना में मुलायम के जुलूस पर मिल से गोलियां चलाई गईं. मिल दर्शन सिंह की थी. कहा जाता है कि उन्हें मारने के लिए सडक़ों पर बम तक रखे गए.

शिवपाल यादव की प्रगति

शिवपाल यादव ने दर्शन सिंह को 11,000 वोटों से हराया और अन्य उम्मीदवारों से जीतने का मार्जिन लगातार काफी अच्छा रहा-2002 में 53000 से, 2007 में 31000 से और 2012 में 81000 के भारी मतों से.

जसवंतनगर के 3.5 लाख मतदाताओं में यादव 40 फीसदी हैं. इसके बाद शाक्य ओबीसी समुदाय की काफी अच्छी संख्या 40000 है. मुसलमान, ब्राह्मण, वैश्य और दलित समुदाय कम संख्या में हैं. भाजपा ने यहां एक यादव उम्मीदवार खड़ा किया है. चर्चा है कि अखिलेश के समर्थक उन्हें कूटनीतिक दृष्टि से मत दे सकते हैं. बसपा उम्मीदवार दुर्वेश शाक्य को शाक्य और दलितों के वोट मिलने की उम्मीद है.

शिवपाल की लोकप्रियता सभी समुदायों के बीच है और गुरुवार को उन्होंने ब्राह्मण और मुसलमान समुदाय को संबोधित किया. उनकी शैली शांत और विनम्र है. वे श्रोताओं के हिसाब से अपना भाषण बदल देते हैं. गुरुवार को उन्होंने ब्राह्मण समाज को संबोधित करते हुए कहा, ‘भगवान के बाद किसी की बात मायने रखती है, तो वह ब्राह्मण की मायने रखती है.’ मुसलमान समुदाय के बीच कहा, ‘जब कल्याण सिंह हमें खदेड़ रहे थे, किसी ने हमारा साथ नहीं दिया. केवल मुसलमानों ने दिल खोल कर समर्थन किया.’

शिवपाल ने जसवंतनगर के लिए काफी संरचनात्मक काम किया है. सडक़ें सही हैं और लगता है समय-समय पर चौड़ी और दुरुस्त की गई हैं. गंदे पानी की निकासी की भी सही व्यवस्था है. जसवंतनगर के सुरेश वर्मा कहते हैं, ‘शिवपाल यादव ने यहां काफी काम करवाया है. दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के कई इलाकों से जसवंतनगर ज्यादा बेहतर है.

इज्जत की इस लड़ाई में शिवपाल के प्रतिद्वंद्वी महसूस करते हैं कि रिकार्ड मार्जिन से ही उनके आलोचकों का मुंह बंद होगा. सपा कार्यकर्ता विनय पांडेेय कहते हैं, ‘इस बार हम चाहते हैं कि शिवपाल चाचा एक लाख से ज्यादा वोटों से जीतें.’

अंदरूनी कलह से असमंजस

शिवपाल और अखिलेश की आपसी लड़ाई ने पार्टी की रैंक और फाइल में काफी भ्रांतियां पैदा कर दी हैं. वे साफ-साफ कह रहे हैं कि ये ‘अखिलेश के आदमी’ हैं और ये ‘शिवपाल के आदमी’ हैं और वे पार्टी के लिए अक्सर अपने-अपने क्षेत्र में काम करते नजर आए. और उसी के खिलाफ उन क्षेत्रों में जहां प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार हैं.

अलीगढ़ जिले में कोइल से मौजूदा विधायक हाजी जमीरुल्लाह खान को इस बार टिकट नहीं दिया गया. उन्होंने सपा की ओर से अधिकारिक रूप से नामांकित स्वतंत्र उम्मीदवार के खिलाफ लडऩे का फैसला किया है. अब वे जसवंतनगर में शिवपाल यादव के लिए कैंपेन कर रहे हैं.

वे जसवंतनगर के मुसलमान बहुल इलाके में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहते हैं, ‘इस बार इज्जत का सवाल है.’ खान आगे कहते हैं, ‘मैं फिलहाल कुछ नहीं हूं. फिर भी शिवपाल यादव मेरा साथ दे रहे हैं. वे हमेशा आपका साथ देंगे. ’
इटावा के मौजूदा विधायक रघुराज शाक्य जसवंतनगर में शिवपाल के लिए कैंपेनिंग कर रहे हैं, पर आरोप है कि वे इलाके की कुछ अन्य सीटों पर सपा उम्मीदवार के विरोध में हैं.

स्थानीय नेताओं का मानना है कि पारिवारिक कलह ने पार्टी का नुकसान किया है. अशिलेश जसवंतनगर में कैंपेन तक के लिए नहीं आए. जसवंतनगर सपा इकाई के प्रमुख राहुल गुप्ता कहते हैं, ‘लोग असमंजस में हैं. पार्टी कार्यकर्ता असमंजस में हैं. सपा और नेताजी के लिए उनकी वफादारी दृढ़ है. पर समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या हो रहा है.’ वे आगे कहते हैं, फिर भी लोग नेताजी के नाम पर सपा को वोट करेंगे.

जो क्षेत्र कभी सपा के लिए वीआईपी निर्वाचन क्षेत्र था, आज विरोधी नेता का एंक्लैव बन गया है. शिवपाल यादव के एक करीबी कार्यकर्ता कहते हैं, ‘राम गोपाल यादव शिवपाल यादव के खिलाफ सक्रियता से कैंपेनिंग कर रहे हैं. वे भाजपा उम्मीदवार मनीष का चुपचाप साथ दे रहे हैं.’

दूसरी ओर, शिवपाल पर आरोप है कि वे इटावा, औरैया, भरथाना और दिबियापुर जैसी सीटों पर सपा उम्मीदवारों का नुकसान कर रहे हैं और बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ उनका कोई ‘गुप्त सौदा’ चल रहा है. जसवंतनगर में यह पहली बार है जब चुनाव के बारे में पहले से कुछ कहना मुश्किल है और मतदाता सपा के लिए स्पष्ट वफादारी व्यक्त करने में चौकस हैं.

दूकानदार राधे लाल यादव कहते हैं, ‘लोग डरते हैं बताने में कि वे किसके साथ हैं. सपा के साथ हैं, तो भी नहीं पता कि उन्हें सही समझा जाएगा या गलत.’ परिवार से 50 साल से जुड़ाव होने के कारण जनता अखिलेश-शिवपाल विवाद को लेकर दुखी हैं. उन्हें यह भी डर है कि अखिलेश फिर से सीएम बन जाते हैं, तो क्या राज्य सरकार उनके साथ उदार बनी रहेगी. खासकर इसलिए क्योंकि कार्यकाल के अंत में अखिलेश ने शिवपाल को पीडब्ल्यूडी मंत्री पद से हटा दिया था.

शिवपाल अपनी सीट जीत सकते हैं, पर एक बात साफ है, यादव परिवार का राजनीतिक अधिकेंद्र अब सैफई और जसवंतनगर नहीं रहा. लखनऊ हो गया है.

First published: 18 February 2017, 9:49 IST
 
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