Home » उत्तर प्रदेश चुनाव » Akhilesh & Mulayam fight over party symbol & offices. Will the real SP please stand up?
 

साइकिल थमेगी या किसे मिलेगी, तय करेगा चुनाव आयोग

अतुल चंद्रा | Updated on: 9 January 2017, 7:46 IST
(फ़ाइल फोटो )

सोमवार तक मुलायम को चुनाव आयोग में साइकिल निशान के दावे पर अपना पक्ष रखना है क्योंंकि बेटे अखिलेश ने पहले ही साइकिल पर दावा कर रखा है. समाजवादी पार्टी में लगता है धमाका हो कर रहेगा. नेताजी ने अखिलेश यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मानने से इनकार कर दिया है. मुलायम सिंह यादव ने रविवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हैं और समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मैं ही हूं और रहूंगा.' गैरतलब है कि उन्होंंने कोई नई बात नहीं कही. सपा में स्थितियां जस की तस हैं.

उन्होंने कहा, '30 दिसम्बर 2016 को राम गोपाल यादव को पार्टी से छह साल के लिए निकाल दिया गया था. इसलिए उनके द्वारा बुलाया गया राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सम्मेलन असंवैधानिक और फर्जी है.' इस सम्मेलन का प्रस्ताव खारिज करते हुए मुलायम ने कहा, 'शिवपाल यादव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहेंगे.'

मुलायम सिंह यादव ने सोमवार को चुनाव आयोग के साथ होने वाली संभावित मुलाकात के बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. सोमवार तक मुलायम को बेटे अखिलेश द्वारा पार्टी का चिन्ह मांगने पर जवाब देना है. जिस वक्त मुलायम मीडिया से बातचीत कर रहे थे, शिवपाल और अमर सिंह भी उनके साथ थे. 

रविवार सुबह दिल्ली के लिए रवाना होने से पहले मुलायम सिंह यादव और शिवपाल ने मीडिया के सामने आक्रामक तेवर का नमूना दिखाया. दोनों ने लखनऊ के समाजवादी पार्टी के मुक्यालय में अपने कमरों पर ताला जड़ दिया. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पारिवारिक कलह केवल पार्टी के चिन्ह को लेकर ही नहीं, बल्कि पार्टी ऑफिस पर भी है.

दशकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति का चेहरा रहे मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव विक्रमादित्य मार्ग स्थित पार्टी के ऑफिस गए और अपने व शिवपाल के कमरों पर ताला लगा कर मुलायम चाबियां अपने साथ ले गए. दिल्ली रवाना होने से पहले मुलायम बार-बार यह कहते नजर आए- ‘परिवार में किसी तरह का कोई कलह नहीं है और न ही कोई विवाद है.’

अखिलेश ख़ेमा सख़्त

दूसरी ओर पार्टी महासचिव राम गोपाल यादव ने शनिवार को पत्रकारों से कहा कि दोनों धड़ों में समझौते की कोई बात ही नहीं हुई है. वे लोग असमंजस की स्थिति पैदा कर रहे हैं. मुख्यमंत्री किसी भी चुनाव चिन्ह पर जनता के बीच जाने को तैयार हैं, अगर उन्हें पार्टी के दूसरे धड़े की ओर से साइकिल चिन्ह नहीं दिया जाता है और वे इस वक्त मुलायम को सपा अध्यक्ष व शिवपाल को प्रदेशाध्यक्ष मानने को तैयार नहीं हैं.

शिवपाल की जगह प्रदेश पार्टी प्रमुख बनाए गए नरेश उत्तम भी जनता के सामने यही जताने की कोशिश कर रहे थे कि पार्टी में किसी तरह का विवाद नहीं है. बहरहाल, इन सबसे इतर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मुलायम खेमे को आज यानी 9 जनवरी तक चुनाव आयोग के उस पत्र का जवाब देना है, जिसमें उनसे कहा गया है कि वे चुनाव पैनल के समक्ष अपनी बात रखें.

आज देना है जवाब

चुनाव आयोग के मुख्य सचिव के.एल. विल्फ्रेड ने कहा, 'अखिलेश खेमे की ओर से मिले आवेदन का संज्ञान लेने और यह जान लेने के बाद कि समाजवादी पार्टी में दो गुट हैं; चिन्ह के अर्थ संबंधी अध्याय के अनुच्छेद 15 के अनुसार आयोग आपको मौका देता है कि आप अपनी ही पार्टी के इस खेमे के दावे संबंधी आवेदन पर सोमवार 9 जनवरी तक अपना जवाब पेश करें'.

राम गोपाल ने शनिवार को चुनाव आयोग के अधिकारियों से मिल कर अखिलेश यादव के समर्थन संबंधी दस्तावेज के करीब 1.5 लाख पेजों से भरे सात बॉक्स उन्हें सौंपे थे. समाजवादी पार्टी के ये दोनों ही धड़े खुद को असली समाजवादी पार्टी कहते हुए ‘‘साइकिल’’ चिन्ह पर दावा कर रहे हैं. साथ ही यह भी संकेत दे रहे हैं कि अगर जरूरत पड़ी तो वे अलग-अलग चुनाव चिन्हों के साथ चुनाव लड़ने को तैयार हैं.

नेम प्लेट अभी भी बरक़रार

मुलायम ने जब पार्टी ऑफिस में अपने और शिवपाल के कमरों पर ताला लगाया तो उनके कमरे के बाहर जो नेम प्लेट लगी थी उस पर लिखा था, ‘राष्ट्रीय अध्यक्ष’ जबकि यह पद अब अखिलेश ने हथिया लिया है. प्रतिनिधि सम्मेलन के बाद मचे कोहराम में अखिलेश खेमे ने पार्टी ऑफिस पर कब्जा कर लिया है और शिवपाल यादव की नेमप्लेटें हटा दीं हैं. इस सम्मेलन में शिवपाल को पार्टी प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था.

रविवार को न केवल नेमप्लेटें दोबारा लगाई गई, बल्कि इस बार शिवपाल के नाम के साथ पीडब्लूडी एवं सिंचाई मंत्री भी लगा दिखाया गया, जबकि अब वे अखिलेश कैबिनेट में मंत्री नहीं हैं.

ख़त्म हो सकता है पार्टी निशान

एक ओर अखिलेश खेमा किसी भी चुनाव चिन्ह पर असल समाजवादी पार्टी के नाम से चुनाव लड़ने पर अडिग है तो दूसरी ओर मुलायम खेमा ‘मुलायम की इच्छा’ का सम्मान करते हुए ‘ऑल इज वैल’ मोड में दिखाई दे रहा है. अगर चुनाव आयोग पार्टी के चुनाव चिन्ह को स्थगित कर दे, जैसा कि 1969 और 1977 में इंदिरा गांधी के मामले में किया गया था तो दोनों में से किसी एक धड़े को एक नया चिन्ह मिल जाएगा.

मुलायम सिंह के लिए नए चुनाव चिन्ह पर लड़ना कोई बड़ी बात नहीं होगी क्योंकि अपने 50 साल के राजनीतिक करियर में नेता जी कम से कम छह अलग-अलग चुनाव चिन्हों पर चुनाव लड़ चुके हैं. 1967 में मुलायम सिंह अपना पहला चुनाव जसवंत नगर से संयुक्त समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह बरगद के पेड़ पर लड़े थे.

1980 में वे हल जोतने वाले किसान के चुनाव चिन्ह पर लोकदल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरे थे. 1989 में जब मुलायम जनता दल में शामिल हुए तब, उनका चुनाव चिन्ह बना पहिया. इस तरह मुलायम का बार-बार पार्टी और चुनाव चिन्ह बदलने का यह सिलसिला अंततः अक्टूबर 1992 में थमा, जब उन्होंने समाजवादी पार्टी नाम से अपनी पार्टी बनाई.

अब जो परिस्थितियां बनी हैं, इसमें गेंद चुनाव आयोग के पाले में है. अब वह चाहे तो चुनाव चिन्ह स्थगित कर दे या किसी भी एक गुट को पार्टी का चुनाव चिन्ह ‘साइकिल’ दे दे.

First published: 9 January 2017, 7:46 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी