Home » उत्तर प्रदेश चुनाव » Akhilesh-Shivpal feud far from over: SP list of candidates incites furore
 

समाजवादियों का झगड़ा: उम्मीदवारों की लिस्ट से गुस्सा और बेसब्री

सादिक़ नक़वी | Updated on: 13 December 2016, 8:03 IST
(बुरहान कीनू/हिन्दुस्तान टाईम्स/गेट्ट)
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए जारी सपा उम्मीदवारों की लिस्ट से एक बार फिर पार्टी के दोनों गुटों में तनाव बढ़ता दिख रहा है. 
  • अपनी क्लीन इमेज को लेकर सतर्क अखिलेश यादव गुट इस बात से परेशान है कि बाहुबली की छवि रखने वाले अतीक़ अहमद और मुख्तार अंसारी को आख़िर टिकट क्यों दिया गया है.

उप्र में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों के नामों की घोषणा शुरू हो गई है. 23 नामों की लिस्ट आने के बाद सोमवार को फिर सात नए उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की गई. इस लिस्ट से पार्टी में पहले से ही चल रहा झगड़ा और गहरा गया है. जिन उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की गई है, उनमें से कई मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पसन्द के नहीं हैं. राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं. पार्टी अगर जल्द ही इस झगड़े को लेकर किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा गया तो चुनाव आते-आते दो धड़ों बंटकर सिमट जाएगी.

विकल्प

अखिलेश यादव के सामने अब दो विकल्प हैं. पहला तो यह कि जैसे हालात हैं, उसे वह स्वीकार कर लें, जहां उनके चाचा शिवपाल यादव निर्णायक भूमिका में बने हुए हैं. 

दूसरा यह कि वे खुलकर सामने आ जाएं. उनके कुछ वफादार भी यही चाहते हैं. अखिलेश के एक नजदीकी सहयोगी का कहना है कि या तो अखिलेश दूसरे धड़े पर छोड़ दें कि चाचा प्रत्याशियों के नामों को तय करें, उन्हें अभियान चलाने दें और वह उनसे दूरी बनाए रखें या अपने खुद के प्रत्याशियों की सूची जारी कर दें.

इस सहयोगी का कहना है कि दूसरे विकल्प से पार्टी में अलगाववाद और बढ़ेगा. झगड़ा शांत होने के बाद लगने लगा था कि हालात ठीक हो रहे हैं लेकिन अब तो लगता है कि स्थिति पहले वाले मोड़ पर ही आ गई है.

सूची और अराजकता

सपा सरकार की सबसे बड़ी आलोचना कानून और व्यवस्था के मोर्चे पर विफलता को लेकर होती है. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जो सूची जारी की गई है, उसमें अतीक अहमद जैसे लोगों के नाम हैं. अतीक पर अनेक आपराधिक मामले चल रहे हैं. यह मुख्यमंत्री की अपनी क्लीन इमेज बनाने की कोशिशों के एकदम विपरीत है. 

मुख्यमंत्री आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे और हाल में ही लॉन्च हुई लखनऊ मेट्रो के जरिए अपनी विकासवादी इमेज बना रहे हैं. अखिलेश ने खुलेआम अहमद के नाम पर अपनी नाखुशी जताई है. मई की शुरुआत में बहराइच की एक रैली के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से अतीक से मंच छोड़ देने को कहा था.  

कहना न होगा कि यह सूची पार्टी के राज्य अध्यक्ष शिवपाल यादव की इजाजत से तैयार की गई है. शिवपाल का अपने भतीजे अखिलेश से झगड़ा चल रहा है कि पार्टी और पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह पर नियंत्रण किसका रहेगा.

टिकट बंटवारा

यह घटनाक्रम पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के उस बयान के बाद हुआ है जिसमें उन्होंने कहा था कि समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड के सदस्य सचिव होने के नाते वह ही टिकटों का निर्धारण करेंगे. इस झगड़े में वह शुरुआती दौर से ही खुले तौर पर अखिलेश के साथ रहे हैं. यह समझा जाता है कि टिकट वितरण पर अनुमति के लिए मोहर अखिलेश ही लगाएंगे.  

हालांकि, इन सबके बाद भी, इस पूरे झगड़े के एक अन्य महत्वपूर्ण नेता अमर सिंह अभी भी पार्टी में बने हुए हैं. अखिलेश धड़े का आरोप है कि पार्टी में पैदा हलचल के लिए वे ही जिम्मेदार हैं. उन्हें हाल ही में पार्टी के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाया गया है.

पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह के निर्देश पर उनके नियुक्तिपत्र पर रामगोपाल यादव ने दस्तखत किए हैं. यह वही पार्टी का संसदीय बोर्ड है जो संयोगवश यह तय करता है कि पार्टी के चुनाव चिन्ह पर कौन चुनाव लड़ेगा.

लोगों को याद होगा कि अखिलेश ने हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स के एक सम्मिट में कहा था कि अगर वह पार्टी के राज्य अध्यक्ष होते तो तय कर चुके होते कि पार्टी में कौन रहेगा और सिंह को पार्टी से बाहर निकालने का प्रस्ताव भेज चुके होते.

मुख्यमंत्री यादव कई मौक़ों पर यह इच्छा जता चुके हैं कि साल 2017 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर कौन चुनाव लड़ेगा. हालांकि, उनके चाचा शिवपाल की ओर से उनका विरोध भी हुआ है और पार्टी का एक बड़ा वर्ग भी यह चाहता है कि अखिलेश शॉट मारें. 

समाजवादी पार्टी के एक सांसद ने कैच से बातचीत में कहा कि पार्टी का एक बड़ा वर्ग यह चाहता है कि मुख्यमंत्री तय करें कि अगला विधानसभा चुनाव कौन लड़ेगा. हालांकि, उन्होंने इस बात से इनकार किया कि पार्टी में कोई विवाद है. सपा सांसद ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री ने यह कभी नहीं कहा कि जिन नामों की घोषणा की गई है, वे उनके खिलाफ हैं.

पार्टी में फूट?

हालांकि, अन्य लोगों का मानना है कि उनके चाचा शिवपाल यादव, जो वर्तमान में पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष हैं, के कामों से अगले चुनाव में पार्टी के जीतने की सम्भावनाएं कम हो रही हैं.

अखिलेश के एक सहयोगी सवाल करते हैं कि यह विध्वंस नहीं तो और क्या है. वह आगे कहते हैं कि अतीक अहमद जैसे दागियों के नामों की घोषणा करने की क्या जरूरत थी, जब अभी चुनावों की घोषणा भी नहीं हुई है. मुख्यमंत्री अपनी क्लीन इमेज के सहारे चुनाव लड़ने की कोशिश कर रहे हैं जबकि अन्य लोग अपराधियों के नाम घोषित कराने की अपनी भरसक कोशिश कर रहे हैं.

इसके पहले भी अखिलेश ने पार्टी की गोरखपुर रैली से दूर रहने का निश्चय किया था. इस रैली में मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के नेताओं ने भाग लिया था. मुख्यमंत्री इनके साथ खुद को सहज नहीं महसूस कर पा रहे थे. उन्होंने बरेली की रैली में भी शिरकत नहीं की थी.  

इस सूची में बांदा के विधायक सिबगतुल्लाह अंसारी और मुख्तार अंसारी के भाई का भी नाम है. इस सूची में बसपा के भारी-भरकम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के भाई हसीनुद्दीन सिद्दीकी का भी नाम है. हसीनुद्दीन को बसपा ने टिकट देने से इनकार कर दिया था, इसी के बाद वह सपा में शामिल हुए.  

अभी यह साफ नहीं है कि क्या अमनमणि त्रिपाठी जो अपनी पत्नी के कत्ल का आरोप झेल रहे हैं, को भी टिकट मिलेगा. वह सपा से हैं. उनका नाम आखिरी सूची में जोड़ा गया था. इस बारे में अखिलेश ने दावा किया था कि उन्हें उनके आरोपों के बारे में जानकारी नहीं थी, जबकि पार्टी सूत्रों का कहना है कि अखिलेश इस पक्ष में नहीं थे कि अमरमणि को टिकट दिया जाए. इस सूची में मंत्री आजम खान के पुत्र अब्दुल्लाह आज़म का भी नाम है.

अंत नहीं दिख रहा

इस संघर्ष का एक अन्य खुला संकेत तब मिला जब मुख्यमंत्री के एक अन्य सहयोगी जावेद आब्दी को सिंचाई विभाग का सलाहकार नियुक्त किया गया. आब्दी को पार्टी के रजत जयन्ती समारोह में 5 नवम्बर को शिवपाल यादव ने खुलेआम बेइज्जत किया था और उन्हें मंच से उतार दिया था.

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का यह भी दावा है कि उनके चाचा शिवपाल ने यह सुनिश्चित करने के लिए अपने कार्यालय का इस्तेमाल करने की कोशिश की थी कि पार्टी कार्यकर्ता अखिलेश की रथयात्रा से दूर रहें. रथयात्रा 3 नवम्बर से शुरू हुई थी. एक सहयोगी का दावा है कि उन्होंने यात्रा में आने के लिए पार्टी की राज्य इकाइयों को कोई एडवाइजरी नहीं भेजी थी.

इस बीच एक सपा सांसद का कहना है कि रथयात्रा में सभी लोग मौजूद थे जो पार्टी के कार्यकर्ता थे. वह सवाल करते हैं कि क्या यह अच्छा संकेत नहीं है कि पार्टी कार्यकर्ता बिना बुलावे के आ रहे थे जबकि हर किसी को मालूम था कि उन्हें बुलाया नहीं गया है.

पार्टी के एक कार्यकर्ता ने यह भी कहा कि शिवपाल यादव जिला स्तर पर पार्टी पदाधिकारियों और अन्य इकाइयों में भी बदलाव करने की जिस राह पर चल रहे हैं, उससे पार्टी चुनाव में बेहतर नहीं कर पाएगी. अब जबकि चुनाव में कुछ माह ही रह गए हैं, ऐसे में इन बदलावों से पार्टी को नुकसान ही होगा. 

नए दल की कुलबुलाहट

एक आंतरिक सूत्र का यह भी कहना है कि अखिलेश भी एक अलग पार्टी बनाने में ऊपरी तौर पर दिलचस्पी ले रहे हैं. शिवपाल यादव ने उन पर अलग से पार्टी बनाने का आरोप भी लाया है. लेकिन अखिलेश तब चुप हो गए जब उन्होंने देखा कि इस कलह के दौरान किस तरह से बहुत बड़ी संख्या में पार्टी विधायक और कैबिनेट मंत्री उनके साथ हैं. 

उनके एक सहयोगी ने बताया कि पार्टी के भीतर अपना समर्थन देखकर अखिलेश ने अपना रुख बदल लिया और सोचा कि मुझे क्यों पार्टी छोड़नी चाहिए. जिन लोंगों को दिक्कत है, वे पार्टी छोड़कर चले जाएं. चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार सपा का एक वर्ग सचमुच में नई पार्टी के लिए मोटरसाइकिल का चुनाव चिन्ह मिलने की सम्भावनाएं तलाश रहा था. हालांकि, यह सम्भव नहीं है कि अब कुछ ही महीनों में नए दल का पंजीकरण हो जाए.

बहरहाल, मेल-मिलाप और सुलह के विकल्प अभी भी खुले हुए हैं क्योंकि जिन सीटों के लिए प्रत्याशियों की घोषणा की गई है, उन सीटों पर सपा को पिछले चुनावों में पराजय मिली है. एक पार्टी सांसद का कहना है कि एक बार चुनावी तारीख़ों की घोषणा हो जाए तो फिर आगे कई अन्य बदलाव देखने को मिलेंगे.

पार्टी के एक अन्य पूर्व मंत्री कहते हैं कि अगर पार्टी अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला करती है, जैसे कि कुछ-कुछ मुख्यमंत्री भी इसके लिए इच्छुक जान पड़ते हैं तो फिर ये सब कैसे अपने गठबंधन साझेदारों के साथ अपना तालमेल बैठा पाएंगे.

First published: 13 December 2016, 8:03 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी