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उत्तर प्रदेश: सपा, कांग्रेस और आरएलडी गठबंधन तय, घोषणा बाकी

सादिक़ नक़वी | Updated on: 7 January 2017, 8:25 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

समाजवादी पार्टी के बहुमत वाले धड़े के नए मुखिया के तौर पर अखिलेश यादव, कांग्रेस और आरएलडी के साथ गठबंधन की घोषणा इस हफ्ते हो सकती सकती है. कांग्रेस और सपा के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि उनके बीच गठबंधन की स्थिति एक नतीजे पर पहुंच चुकी है. कहा जा रहा है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सहित कांग्रेस के शीर्ष नेता सपा के साथ गठबंधन के लिए राजी हैं ताकि भाजपा को सत्ता में आने से रोक सकें. 

खबरों के मुताबिक सपा में चल रहे पारिवारिक संकट के दौरान कांग्रेस नेतृत्व लगातार अखिलेश के संपर्क में रहा है. सूत्रों का दावा है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी अखिलेश से सीधी बात कर रहे थे. हालांकि दोनों पक्षों की तरफ से इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है. यूपी में चुनावी मुहिम का संचालन कर रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी गठबंधन पर जोर दे रहे हैं. यूपी में कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद सपा के नेतृत्व से मिलने लखनऊ जा सकते हैं. 

कांग्रेस का आकलन

कांग्रेस के आरएलडी के साथ पहले ही अच्छे संबंध हैं. वह सपा की अंदरूनी स्थिति के सामान्य होने का इंतजार कर रही है. अखिलेश यादव भी गठबंधन पर फैसला लेने से पहले पार्टी को अपने अधीन मजबूती से लेना चाहते हैं. सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस ने राज्य में 107 सीटों की मांग की है. हालांकि सपा के भीतरी सूत्रों का कहना है कि पार्टी कांग्रेस, आरएलडी और कृष्ण पटेल के अपना दल के धड़े को 100 सीटें आराम से दे सकती है.

कुछ नेताओं के मुताबिक कांग्रेस इस व्यवस्था से बेहद खुश हैं. आरएलडी लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से पराजित हुई थी, इसलिए वह भी राज्य में अपना महत्व बनाए रखने के लिए गठबंधन चाहती है. आरएलडी के जाट वोट बैंक से सपा को पश्चिम यूपी में मदद मिल सकती है, जहां वह मायावती की बसपा और भाजपा से पिछड़ी थी.

कांग्रेस भी पहले गठबंधन के सवाल पर जुड़ने के पक्ष में थी, जबकि कांग्रेस के शीर्ष नेता इसके पक्ष में नहीं थे. उनकी राय थी कि अपना काडर बनाने के लिए उन्हें अकेले लड़ना चाहिए. दूसरे धड़े का मानना था कि यूपी में भाजपा अगर सत्ता में आती है तो 2019 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए लगभग असंभव हो जाएंगे.

जैसा कि कांग्रेस के एक भीतरी सूत्र ने कहा, ‘अगर आप जूनियर पार्टनर की हैसियत से भी सत्ता में हैं, तो बिहार की तरह काडर खड़ा कर पाना बनिस्बत ज्यादा आसान हो जाएगा और उनमें जोश भरना भी.’ कांग्रेस के साथ गठबंधन से सपा को मुस्लिम वोट बैंक मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है. सपा में दरार से डर था कि इससे मुस्लिम मतदाता भ्रमित होंगे और हो सकता है वे बसपा की ओर रुख कर लें क्योंकि बसपा इस समुदाय का समर्थन पाने की भरसक कोशिश कर रही है. 

यादव का पारिवारिक ड्रामा

इस बीच यादवों के पारिवारिक ड्रामे से कई बातों का खुलासा हो रहा है. दो बातें तो साफ हैं. पहली, अखिलेश समाजवादी पार्टी के निर्विवाद मुखिया हैं. दूसरी, यदि पार्टी के अपदस्थ मुखिया और उनके पिता मुलायम सिंह यादव अगर उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के नियंत्रण को नहीं मानते हैं, तो कोई संधि नहीं होगी.

शुक्रवार को भी लखनऊ में दिनभर बैठकें चलीं लेकिन कोई स्पष्ट नतीजा सामने नहीं आ सका. लखनऊ में पहली बार अखिलेश यादव, मुलायम सिंह, शिवपाल के साथ अमर सिंह भी बैठक में शामिल हुए. लेकिन खबर है कि अखिलेश यादव ने अमर सिंह को पार्टी से बाहर करने और राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटने से दो टूक इनकार कर दिया है.

यह भी कहा गया कि, ‘दोनों धड़ों के बीच चाहे कितनी ही बैठकें हों, मुख्यमंत्री उनके फैसले को नहीं मानेंगे.’ राज्य सभा के एक अन्य सांसद ने भी यही कहा, ‘जो भी होना था एक जनवरी को हो गया. अब सबकुछ महत्वहीन है.’ सांसद ने यह उस ओर इशारा करते कहा कि पार्टी के भविष्य को लेकर बड़े फैसले लिए जा चुके हैं.

पक्ष में स्थिति

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा यूपी विधानसभा चुनाव के शेड्यूल की घोषणा के एक दिन बाद अखिलेश ने अपने समर्थकों से कहा था कि उन्हें चुनावों की तैयारी करनी चाहिए. और उन्हें इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए कि उनके धड़े को साइकिल चुनाव चिह्न मिलेगा या नहीं.

पार्टी में विधायक और सांसदों के 90 फीसदी से ज्यादा समर्थन से अखिलेश आश्वस्त थे कि उनका धड़ा चुनाव आयोग को आश्वस्त कर लेगा कि सही मायने में वही असली समाजवादी पार्टी हैं. अखिलेश यादव राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष भी रहेंगे, कम से कम तब तक जब तक कि चुनाव नहीं हो जाते. इसके विपरीत कुछ वर्गों में चर्चा थी कि वे समझौता करने के इच्छुक हैं.

यह उस वक्त हुआ है जब जनमत सर्वेक्षणों से यह बात सामने आ रही है कि सपा के विभाजन से आने वाले चुनावों में भाजपा को लाभ मिल सकता है. हालांकि निडर अखिलेश और उनके समर्थक आश्वस्त हैं कि अमर सिंह और शिवपाल यादव जैसे चेहरों से मुक्ति मिलने से उनकी साफ छवि में इजाफा होगा. यहां तक कि जनमत सर्वेक्षण उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय विकल्प बता रहे हैं.

5, कालिदास मार्ग पर 5 जनवरी को रखी गई बैठक में मुख्यमंत्री के समर्थन में लगभग 275 विधायक और विधान परिषद सदस्य थे. वहां मौजूद एक विधान परिषद सदस्य ने कैच को बताया, ‘अविभाजित पार्टी में 229 विधायक और 66 विधान परिषद सदस्य हैं, करीब 275 सदस्य मुख्यमंत्री के समर्थन में सामने आ चुके हैं और उन्होंने अपना हलफनामा हस्ताक्षर कर सौंप दिया हैं.’ 

यहां तक कि कौमी एकता दल के विधायक सिबगतुल्लाह अखिलेश यादव से मिले और समर्थन का वादा किया. कौमी एकता दल  इस साल शुरू में मुख्यमंत्री की इच्छा के खिलाफ सपा में शामिल हुआ था. कौमी एकता दल का नेतृत्व सजायाफ्ता डॉन मुख्तार अंसारी कर रहे हैं.  

पार्टी प्रमुख का पतझड़

भारत निर्वाचन आयोग ने यूपी में दोनों धड़ों को नोटिस दिया था. इस सिलसिले में आगे क्या हुआ, यह देखना महत्वपूर्ण है. एक धड़ा अखिलेश यादव के नेतृत्व का है, तो दूसरा मुलायम सिंह, शिवपाल यादव और अमर सिंह का है, जिन पर 9 जनवरी तक पार्टी के विधायक, सांसद और विधान परिषद के सदस्यों के समर्थन का प्रमाण देने का दबाव डाला गया है. 

इस बाध्यता से मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल यादव को छोड़ दिया गया. 1 जनवरी को हुए आपात राष्ट्रीय सभा के चुनाव में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अनिश्चित स्थिति में भी उन्हें पार्टी के नए अध्यक्ष के तौर पर भारी बहुमत से चुना. लखनऊ लौटने से पहले मुलायन सिंह और शिवपाल यादव दिल्ली में थे.

मुलायम के आवास पर, उनके साथ अमर सिंह और पूर्व सांसद जया प्रदा और एक वकील भी थे. आगे क्या कदम उठाने हैं, इस संदर्भ में विमर्श के लिए. बहुत संभव है कि मामला कोर्ट में रफा-दफा हो जाए. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इस धड़े ने अपने समर्थन में कितने हलफनामे जुटाए हैं.  

मुलायम ने पहले एक जनवरी को हुई बैठक की वैधता को चुनौती देते हुए निर्वाचन आयोग से पार्टी पर अपने अधिकार के औचिका दावा किया था. बाद में रामगोपाल यादव और नरेश अग्रवाल भी भारत निर्वाचन आयोग के शीर्ष अधिकारियों से मिले और उनके दावे के समर्थन में फाइल पेश की.

एक जनवरी को शिवपाल यादव को अपदस्थ करते हुए नरेश उत्तम को समाजवादी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया

निर्वाचन आयोग के प्रमुख नसीम जैदी ने 4 जनवरी को कहा था कि दोनों तरफ से प्रस्तुत प्रतिनिधित्व और प्रस्तुत दस्तावेज और ऐसे मामलों में रहे पहले के उदाहरणों को देखने के बाद फैसला लिया जाएगा. 

1 जनवरी की बैठक के बाद आजम खान जैसे वरिष्ठ नेताओं ने पारिवारिक लड़ाई में सुलह कराने की कोशिश की थी. भीतरी सूत्र के अनुसार, इस बीच, आज की बैठक में मुख्यमंत्री यादव अपने पिता से संधि की बात करने को सजग हैं क्योंकि वे मानते हैं कि उनमें अब भी गलतफहमिया पैदा की जा रही हैं. 

‘सीएम का कहना है कि वे लगभग रोज अपने पिता मुलायम सिंह से मिल रहे हैं, पर वे अपने शब्दों पर अड़े हुए हैं.’ भीतरी सूत्र ने आगे कहा कि सीएम नाराज थे, ‘उन्होंने बताया कि किस तरह आज सबुह नौ बजे तक मुलायम सिंह ने उन्हें कहा कि वे दिल्ली नहीं जा रहे हैं. हालांकि जैसे ही वे बैठक से बाहर आए, मुलायम शिवापाल यादव के साथ राजधानी जा रहे थे.’ 

भीतरी सूत्र के मुताबिक, ‘मुख्यमंत्री किसी तरह की जोखिम उठाना नहीं चाहते क्योंकि वे जानते हैं कि बहुत संभव है मुलायम सिंह अपने शब्दों पर लौट आएं, क्योंकि ऐसा पहले हो चुका है. चुनाव जब महज एक महीने दूर है, वे इस निर्णायक मोड़ पर ऐसा नहीं होने देना चाहते हैं.’

भीतरी सूत्र ने दावे के साथ बताया, ‘कम से कम जब तक चुनाव नहीं हो जाएं, वे अपने फैसले पर शायद पुनर्विचार नहीं करेंगे’ उन्होंने आगे कहा, ‘सीएम ने कहा कि यदि हम चुनाव जीतते हैं तो नेताजी खुश होंगे और इससे मतभेद अपने आप दूर हो जाएंगे.’

सीएम अखिलेश यादव ने एक जनवरी को शिवपाल यादव को अपदस्थ करते हुए नरेश उत्तम को समाजवादी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया. जिला इकाइयों में भी बदलाव कर रहे हैं. गुरुवार को पार्टी के सात जिला अध्यक्ष बदल दिए. यह इसका संकेत है कि सीएम यादव चुनावों से पहले वफादार लोगों को अपने धड़े में मजबूती से चाहते हैं.

First published: 7 January 2017, 8:25 IST
 
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