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अखिलेश यादव: चुनावी मौसम में 17 ओबीसी जातियों को एससी में शामिल करने का पुराना राग

फ़ैसल फ़रीद | Updated on: 23 December 2016, 8:20 IST

चुनावी मौसम में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक बार फिर 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल करने के एलान ने एक बार फिर बोतल से जिन्न को बाहर निकालने का काम किया है.

समाजवादी पार्टी इसे अपना चुनावी घोषणा पत्र में किया गया एक और वादा पूरा करने वाला काम बता रही हैं, लेकिन बसपा इस कदम को छल और कपट से भरा देख रही हैं. इस मुद्दे पर राजनीति तेज़ है और सभी दल ऊपरी तौर पर इन 17 जातियों को अनुसूचित जाती की श्रेणी में शामिल करने के पक्ष में खड़े हैं और हर कोई इसका सेहरा अपने सर पर बांधना चाह रहा हैं.

ये 17 जातियां इश प्रकार हैं- राजभर, निषाद, प्रजापति, मल्लाह, कहार, कश्यप, कुम्हार, धीमर, बिन्द, भर, केवट, धीवर, बाथम, मछुआ, मांझी, तुरह और गोंड. वर्तमान में यह जातियां ओबीसी वर्ग में शामिल हैं और मंडल कमीशन की संस्तुति के अनुसार आरक्षण की हक़दार हैं.

हालांकि उत्तर प्रदेश के समकालीन इतिहास को थोड़ा करीब से देखने वालों को पता होगा कि इस तरह की कवायद सत्ताधारी सियासी पार्टियां पिछले करीब एक दशक से करती आ रही हैं. इस लिहाज से ये 17 जातियां राजनीतिक दलों के आपसी खेल का फुटबॉल बन गई हैं. हर कोई इन पर हाथ-पैर साफ करता है लेेकिन अंत में इनका कोई भला नहीं होता.

मामला कैसे शुरू हुआ?

सन 2005 में तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार ने पहली बार इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी. उन्होंने 17 जातियों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में डालने का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा. केंद्र की तरफ से कोई संतोषजनक उत्तर नही मिला. इस बीच प्रदेश में सपा के इशारे पर इन जातियों को एससी कैटेगरी का प्रमाण पत्र जारी करना शुरू कर दिया. इसके विरोध में कुछ लोग इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए. कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया.

दरअसल किसी भी जाति को एससी कैटेगरी में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार की संस्तुति आवश्यक है. बिना केंद्र सरकार के नोटीफिकेशन के किसी नई जाति को एससी कैटेगरी में नहीं डाला जा सकता.

सन 2007 में उत्तर प्रदेश की सत्ता बदली. मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. उन्होंने एक बार फिर से इन 17 जातियों को ओबीसी की श्रेणी से निकाल कर एससी में शामिल करने की सिफारिश की. हालांकि मायावती द्वारा भेजे गए नए प्रस्ताव में एक नई शर्त जोड़ दी गई थी कि. इसके मुताबिक नई 17 जातियों को एससी में शामिल करने से पहले एससी का आरक्षण का कोटा बढ़ा दिया जाय. यह प्रस्ताव अभी भी लंबित हैं.

सपा ने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि इन 17 जातियों को फिर एससी श्रेणी में शामिल किया जाएगा

इस बीच दोनों पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी लगे. सपा का कहना था की बसपा ने इन 17 जातियों को फिर ओबीसी में कर दिया और अपने लोगों से अदालत में केस करवाया. वहीं बसपा का दावा हैं की ये 17  जातियां एससी केटेगरी में शामिल हो नहीं पाई और ओबीसी से बाहर हो गयी इसीलिए उनको कोई आरक्षण नहीं मिल रहा. इसीलिए मजबूरन इनको दुबारा ओबीसी में शामिल किया गया.

सन 2012 में सपा फिर से सत्ता में आई और उसने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि इन 17 जातियों को फिर एससी श्रेणी में शामिल किया जायेगा. इसके बाद पूरे साढ़े चार साल तक इस मुद्दे को गरम रखा गया. आते ही अखिलेश सरकार ने इन्हीं 17  जाति के नेताओ की मांग पर निषाद राज जयंती (5 अप्रैल) को सरकारी छुट्टी की घोषणा कर दी.

अब अखिलेश सरकार द्वारा दुबारा इन जातियों को एससी श्रेणी में शामिल करने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा गया है. इन जातियों का एक सम्मलेन पार्टी कार्यालय पर करवाया गया जिसमें मुलायम सिंह ने साफ कहा की राजनीतिक रूप से अब समय आ गया है की जाग जाओ.

इन जातियों के नेता जैसे गायत्री प्रजापति, राजपाल कश्यप, शंखलाल मांझी को आगे रखा जाने लगा. इसी बीच अखिलेश ने स्वयं सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को इसी सन्दर्भ में पत्र लिखा. केंद्र द्वारा मांगी गयी आपत्तियों का जवाब भी दिया.

अब जब एक बार फिर चुनाव सामने हैं तो अखिलेश ने कैबिनेट मीटिंग में इसी आशय का प्रस्ताव पारित करवा कर दुबारा केंद्र सरकार के पाले में गेंद डाल दी हैं.

इन जातियों का महत्व

आबादी के हिसाब से ये 17  जातियां प्रदेश की 403 विधानसभा क्षेत्रों में फैली हुई हैं. हर विधानसभा में इनका वोट 25-35 हज़ार तक है, जो किसी की हार-जीत में निर्णायक हो सकता है. मूलतः ये बात सबसे पहले मुलायम सिंह यादव ने समझी और पूर्व दस्यु फूलन देवी को टिकट दे कर सांसद बनाया. इसके बात ये जातियां सपा के साथ रही. इसी बीच ये जातियां बसपा में भी- 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी'- के नारे में चली गयी. अभी ये जातियां सभी पार्टियों में बंट गयी हैं और सब इनको लामबंद करना चाहते हैं.

दरअसल ये जातियां पिछड़ों में अतिपिछड़ी हैं. इन्हें मोस्ट बैकवर्ड क्लास कहा जा सकता है. बिहार में इसी तर्ज पर नीतीश कुमार ने ओबीसी के बीच दो-फाड़ करके अपने लिए एक नया वोटबेस तैयार करने की सफल कोशिश की थी. मुलायम सिंह यादव भी उसी तर्ज पर दलितों के हिस्से में अपने लिए एक वोटबेस तलाश रहे हैं. लेकिन केंद्र की सहमति के बिना यह संभव नहीं है.

First published: 23 December 2016, 8:20 IST
 
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