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बिजनौर: छह महीने में दो हत्याकांड के सहारे सियासी मुकाम तलाश रहे उम्मीदवार

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 13 February 2017, 3:40 IST

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बिजनौर ज़िला पिछले छह महीने में बार-बार गलत वजहों से सुर्ख़ियों में है. जिला मुख्यालय से सटे पेदा और नया गांव में बीते छह महीने के भीतर हत्या की दो वारदातें सांप्रदायिक रंग ले चुकी हैं. दोनों ही मामलों के बाद ज़िले में सियासी दिग्गजों की हलचल तेज़ हो गई. 

उत्तर प्रदेश चुनाव नज़दीक आने के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती, मजलिस प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की यहां बड़ी-बड़ी रैलियां हो चुकी हैं. आज यहां चुनाव प्रचार का आख़िरी दिन है और अंतिम बड़े वक्ता के रूप में अफज़लगढ़ में भाषण दिया है कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने. 

कई वजहों से बिजनौर की सदर सीट हंगामाख़ेज़ हो चली है. यहां से भाजपा उम्मीदवार सुचि चौधरी राजनीति में बिल्कुल नई हैं, जमीन पर काम करने का उनको अनुभव नहीं है लिहाजा भावनाओं के सहारे चुनाव जीत लेना चाहती हैं. हिंदुत्व उनका सबसे बड़ा हथियार है. दरअसल, भाजपा के टिकट के दावेदार सुचि के पति ऐश्वर्य चौधरी थे, लेकिन पिछले साल 16 सितंबर की सुबह पेदा गांव में हुए तिहरे हत्याकांड में कथित तौर पर उनकी भूमिका सामने आने के बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

यहां से भाजपा उम्मीदवार सुचि चौधरी राजनीति में बिल्कुल नई हैं, हिंदुत्व उनका सबसे बड़ा हथियार है

उस कांड के बाद लगभग एक हफ्ते तक फरार रहे ऐश्वर्य को बिजनौर पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. यही कारण है कि भाजपा को ऐश्वर्य की जगह उनकी पत्नी सुचि को उम्मीदवार बनाना पड़ा. 

सुचि राजनीति के दांवपेच नहीं समझतीं. वो वोटरों में सहानुभूति पैदा अपनी नैया पार लगाना चाहती है. अपने भाषणों में सुचि ऐश्वर्य की बेगुनाही और कौम के ऊपर मंंडरा रहे खतरे को मुद्दा बना रही हैं. वह अपील करती हैं कि किसी तरह उन्हें जिताया जाए ताकि वह अपने पति को रिहा करवा सकें. जिन्हें जानबूझकर इस सरकार ने जेल में डाला है.

पत्नी के चुनाव प्रचार में मदद के लिए ऐश्वर्य चौधरी ने पिछले हफ्ते ज़मानत की अर्ज़ी लगाई थी लेकिन बिजनौर की अदालत ने अर्ज़ी ख़ारिज कर दी. सूत्रों के मुताबिक जेल में बंद होने के बावजूद ऐश्वर्य चौधरी अपनी पत्नी का चुनाव प्रचार मैनेज करने की कोशिश कर रहे थे.

लिहाज़ा, 8 फरवरी की रात अचानक उन्हें बिजनौर की जेल से हटाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की महाराजगंज जेल में ट्रांसफर कर दिया गया. इससे नाराज़ ऐश्वर्य के समर्थकों ने अगली सुबह जजी चौक पर इकट्ठा होकर बिजनौर प्रशासन और अखिलेश सरकार के ख़िलाफ़ मुर्दाबाद के नारे लगाए.

दोपहर में रैली, शाम में तनाव

10 फरवरी की दोपहर यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारी भीड़ को संबोधित किया. उन्होंने अखिलेश सरकार, उनकी योजनाओं, कानून-व्यवस्था पर तीखे हमले किए. उन्होंने अपने भाषण में पेदा कांड का ज़िक्र तो नहीं किया लेकिन ज़िले के तमाम भाजपा नेताओं के साथ-साथ मंच पर उनके साथ सुचि चौधरी भी मौजूद थीं. नरेंद्र मोदी की रैली में बिजनौर की सभी विधानसभाओं से लोग आए थे. स्थानीय पत्रकार ज़ुबैर के मुताबिक आसपास के ज़िलों से भी लोगों को लाया गया था. 

मगर 10 फरवरी की शाम होते-होते बिजनौर में एक बार फिर सांप्रदायिक तनाव फैल गया. शहर से सटे नया गांव में एक शख़्स संजय अपने बेटे विशाल के साथ शाम 7 बजे ट्यूबवेल के पास जा रहे थे कि तभी उनपर हमला हो गया. इस हमले में उनके नाबालिग बेटे विशाल की मौत हो गई और संजय ख़ुद बुरी तरह ज़ख़्मी हुए. इस ख़बर शहर को दोबारा तनाव की ज़द में ले लिया. 

अख़बारों में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इस हमले के पीछे पेदा गांव के पूर्व प्रधान इकबाल का हाथ है. बिजनौर पुलिस ने इकबाल समेत आठ मुलज़िमों पर हत्या समेत तमाम धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है. चूंकि अभी तक इस केस में गिरफ़्तारी नहीं हो सकी है, इसलिए हमले की वजह भी साफ नहीं है. 

दैनिक जागरण ने लिखा है कि 9 फरवरी को विशाल और हमलावरों के बीच तकरार हुई थी, जिसके बाद उनकी हत्या हुई. इस हत्या के बाद तनाव इसलिए भी फैला क्योंकि इकबाल पिछले साल सितंबर में हुए पेदा कांड के गवाह हैं. पेदा हत्याकांड में तीन मुसलमान गोलीबारी का शिकार हुए थे और कई ज़ख़्मी.

अगली सुबह फिर शहर के जजी चौक पर भाजपा नेताओं और समर्थकों ने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया. समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार रुचि वीरा के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की गई. रालोद प्रत्याशी राहुल सिंह की कार पर हमला किया गया. पत्रकार ज़ुबैर कहते हैं कि बार-बार इस सीट पर हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलने की कोशिश की जा रही है. लेकिन वोटर इन हथकंडों में दिलचस्पी लेते नहीं दिख रहे हैं. 

भाजपा को झटका क्यों?

भाजपा की सुचि चौधरी भावनात्मक अपील कर वोटरों को अपने पाले में कोशिश कर रही हैं. पति ऐश्वर्य चौधरी को रातों-रात पूर्वी उत्तर प्रदेश की जेल में भेजने की कार्रवाई के बाद वह वोटरों में सहानुभूति जगने की उम्मीद कर रही हैं. स्थानीय पत्रकार काशिफ़ कहते हैं कि भाजपा के समर्थक बेहद आक्रामक शैली में प्रचार कर रहे हैं. आम वोटर सुचि चौधरी की भावुक अपीलों और समर्थकों के तीखे तेवरों के बीच खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रहा है. 

सुचि चौधरी जाति से जाट हैं और उनकी सबसे बड़ी ताक़त इस सीट पर 40 हज़ार जाट वोटरों की संख्या थी लेकिन रालोद ने भी यहां से अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया है. यूपी के इस चुनाव में जाट बिरादरी में यह संदेश फैल चुका है कि इस बार भाजपा को नहीं रालोद को वोट देना है. रालोद प्रत्याशी राहुल सिंह को जाटों के बीच चल रही इस लहर का फायदा होगा. राहुल सिंह जीतेंगे नहीं लेकिन उनके जितने वोट बढ़ेंगे, सुचि चौधरी को उतना नुकसान उठाना पड़ेगा. 

भाजपा का दूसरा मज़बूत वोटबैंक बनिया समाज है लेकिन नोटबंदी की वजह से बिजनौर शहर के बनियों का एक बड़ा वर्ग भाजपा और नरेंद्र मोदी से नाराज़ है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार रुचि वीरा जाति से बनिया हैं. लिहाज़ा, इस बार बनियों का एक हिस्सा यहां भाजपा की बजाय सपा को मतदान कर सकता है. यहां बनिया वर्ग इस उलझन से भी जूझ रहा है कि कहीं सूबे में भाजपा की सरकार बनने के बाद उनका कारोबार और प्रभावित ना हो जाए. 

भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां रैली की है. अगर मोदी ब्रांड अभी तक फीका नहीं पड़ा है, तो सुचि चौधरी समेत अन्य उम्मीदवारों को थोड़ी राहत ज़रूर मिलेगी. 

बिजनौर भाजपा के एक बड़े नेता ऐश्वर्य चौधरी को पसंद नहीं करते. लिहाज़ा, नतीजों पर भीतरी गुटबाज़ी का असर भी दिख सकता है. भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद बिजनौर सदर सीट ध्रुवीकरण का शिकार होने से बची हुई है. 

सपा-कांग्रेस पर दांव क्यों?

समाजवादी पार्टी की रुचि वीरा ने उपचुनाव में यहां जीत दर्ज की थी. इससे पहले इस सीट पर भाजपा के राजा भारतेंद्र विधायक थे लेकिन उनके सांसद बनने के बाद यह सीट खाली हो गई थी. सुचि के मुकाबले रुचि वीरा राजनीतिक पृष्ठभूमि से आती हैं. उनके पति उदयन वीरा ज़िला पंचायत अध्यक्ष हैं और लंबे समय से ज़िले की राजनीति में सक्रिय हैं. 

इस सीट पर बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवार रशीद अहमद को उतारा है लेकिन मुसलमानों के बीच लोकप्रियता रशीद से ज़्यादा रुचि वीरा की दिख रही है. पिछले साल पेदा कांड के दौरान वह लगातार मुसलमानों के साथ खड़ी थीं. अखिलेश सरकार ने दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की थी, इसलिए भी मुसलमान रुचि और अखिलेश के साथ खड़े हैं. कांग्रेस की स्थानीय इकाई रुचि के साथ डटी है. बनिया जाति का होने के नाते नोटबंदी से गुस्साए कारोबारियों की लिस्ट में भी रुचि वीरा ऊपर हैं. 

वहीं बसपा उम्मीदवार रशीद अहमद हाल के साल में बिजनौर आकर बसे हैं. वह पास के नहटौर कस्बे से नगर पालिका चेयरमैन का चुनाव जीतते रहे हैं लेकिन बिजनौर सदर सीट का मुसलमान उन्हें बाहरी की तरह ट्रीट कर रहा है. इसलिए मुसलमान वोटरों का एक बड़ा हिस्सा उनसे दूर छिटक सकता है. 

इस सीट पर फैसला आमतौर पर मुसलमान ही करते हैं क्योंकि उनके वोटर्स की संख्या 1 लाख से ज़्यादा है. अगर मुसलमान और 60 हज़ार दलित वोटर एकजुट होकर वोट करें तो बसपा की जीत आसान हो जाएगी मगर मुसलमानों में रशीद से ज़्यादा उत्साह फिलहाल रुचि के लिए दिख रहा है. वजह रुचि की अपनी शख़्सियत और ब्रांड अखिलेश हैं.  

यहां कुल वोटरों की तादाद 3 लाख 60 हज़ार हैं. सोमवार शाम 5 बजे प्रचार थम जाएगा. सपा या बसपा उम्मीदवार मतदान होने तक इस सीट को ध्रुवीकरण से बचाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि भाजपा नाबालिग विशाल की मौत का सांप्रदायिकरण करना चाहती है. नतीजे उसी आधार पर तय होंगे कि लोग धर्म के नाम पर बंटे या नहीं? यहां मतदान 15 फरवरी को होना है. 

First published: 13 February 2017, 7:57 IST
 
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