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फ़तेहपुर: सपा प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम की अग्नि परीक्षा

आवेश तिवारी | Updated on: 14 February 2017, 10:22 IST
कैच न्यूज़

बनारस और इलाहाबाद में पाप धोने से पहले गंगा नदी जब फतेहपुर पहुंचती है तो निस्तेज, शांत और मैली हो जाती है. यहां न तो नाव नजर आती है न तो अपनी आजीविका के लिए गंगा पर आश्रित लोग दिखते है. कभी रामगंगा कैनाल फतेहपुर के साथ-साथ कौशाम्बी जिले के किसानों के लिए लाइफलाइन थी लेकिन अफसरशाही और मौक़ापरस्त नुमाइंदों के गठजोड़ ने इसके वजूद को ख़त्म कर दिया है. 

फतेहपुर ज़िला कभी दस्युओं के आतंक से थरथराता था लेकिन अब शांत है. यहां चुनावी माहौल कहीं नजर नहीं आता. मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से भी ज्यादा और निर्णायक हैं. लोधियों ,राजपूतों और पटेलों के वोट भी महत्वपूर्ण है. कभी धनाढ्य किसानों और मिल मजदूरों के लिए मशहूर फतेहपुर आज दिहाड़ी मजदूरों का जिला बन गया है. 

लखनऊ से फतेहपुर की सीमा में प्रवेश करने पर सबसे पहले हुसैनगंज विधानसभा का गांव सरैला मिलता है. राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ दोआब के अंतिम आदमी तक नहीं पहुँच सका है. सड़क, निर्धन आवास की मांग पर सुनवाई नहीं हुई है. विधायक निधि से हैडपंप ख़ास घरों में लगवाया गया है जहां गांव का कमज़ोर वर्ग पानी नहीं भर सकता. 2012 में बसपा के मोहम्मद आसिफ यहां से चुनाव जीते थे लेकिन इसके बाद दोबारा कभी इस गांव में नहीं आए. 

लगभग 300 घरों वाला सरैला खेतिहर किसानों और दिहाड़ी मजदूरों का गांव है. पिछले दो दशकों में तक़रीबन 40 घरों के किसान अपनी छोटी जोत की खेती छोड़कर दिहाड़ी मजदूरी करने लगे है. सरैला में नुक्कड़ की दूकान पर खड़ी शबनम से लहर पूछने पर वह मोदी का नाम लेती हैं. आसपास खड़े लोग भी उनकी हां में हां मिलाते हैं. वहीं खड़े सीताशरण कहते हैं कि हाथी को हल्के में नहीं लेना चाहिए. 

मनरेगा का काम नहीं मिलने की मार पूरे ज़िले में दिखाई पड़ती है. सरैला के रामकिशोर बताते हैं कि जब मनरेगा था तब भी हमें काम नहीं लगा गाँव के प्रधान अपने ही लोगों को काम देते थे आज भी वही हाल है. हुसैनगंज के जुगलपूर्व, ओझापुर, चांदीपुर, गोपलापुर जैसे गाँवों में सार्वजानिक वितरण प्रणाली में धांधली की शिकायते हैं. गांव के देवेन्द्र पढ़ने के लिए 6 किलोमीटर दूर जाते हैं. गांव में कई साल से खम्भा लगा हुआ है लेकिन आधे गाँव में बिजली है और आधे में नहीं.

सदर का दर्द दिखेगा मतदान में

केबीके ग्राफिक्स

फतेहपुर सदर में अचानक धार्मिक आयोजनों की बाढ़-सी आई हुई है. पार्टियों के बैनर पोस्टर तो कही नहीं दिखते लेकिन जय श्रीराम के नारों के साथ यज्ञ का जुलुस निकाल रहे युवकों की भीड़ जरुर दिखाई देती है. पत्रकार बताते हैं कि यह सब जुलुस भाजपा के विधायक और उम्मीदवार विक्रम सिंह निकाल रहे हैं. ऐसे जुलूसों ने माहौल बनाने में आसानी होती है. 

विक्रम सिंह तीन साल पहले ही विधायक बने हैं. उनके पहले वाले विधायक सैयद कासिम सपा से थे लेकिन अचानक उनकी मौत हो गई और उनके बेटे सहानुभूति के वोट हासिल नहीं कर सके और मोदी लहर में विक्रम बाजी मार ले गए. सदर विधानसभा में मुस्लिम, लोधी ,ब्राह्मण ,राजपूत वोटरों की भरमार है. यही निर्णायक भी होंगे. 

समाजवादी पार्टी के लिए मुश्किल पैदा करने को उनके पूर्व विधायक के बेटे राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर गए हैं. शहर में एक चाय की दूकान पर बैठे पार्थ नाथ तिवारी कहते हैं यहाँ पर चुनाव से 24 घंटे पहले एक रेखा खिंच जाती है एक एक तरफ मुस्लिम होता है एक तरफ हिन्दू और वही फैसला कर देता है. इस बार बसपा ने यहाँ से ब्राह्मण समीर त्रिवेदी को उतारा है. 

एक वक्त था जब फतेहपुर में शा वेलेस ,महादेव फर्टिलाइजर्स, भारत वर्क्स लिमिटेड और इंडिया इन्सुलेटर जैसी कम्पनियाँ थी लेकिन अब 95 फीसदी कम्पनियां बंद हैं. 'अपराध, वसूली, गुंडागर्दी का बोलबाला है. फतेहपुर सदर के मतदाताओं को इस बात की बेहद शिकायत है कि आजतक शहर में सीवर लाइन नहीं बनी, सीवर लाइन के लिए 23 करोड़ रूपए आये थे तो उस पैसे की नाली बना दी गई. 

सदर विधानसभा के लोगों में सांसद साध्वी निरंजन ज्योति को लेकर भी नाराजगी है. आम लोगों ने उनसे भिदौरा पम्प कैनाल को शुरू कराने की बार बार गुजारिश करी लेकिन साध्वी ने भाषणबाजी के अलावा कुछ नहीं किया. अब लोग चाहते हैं जो विधायक बने वो कैनाल का काम करवाए. 

चौराहे पर अपना ऑटो लेकर खड़े महेश कहते हैं कि अखिलेश यादव की वजह से उनकी पत्नी को 500 रूपए महीने मिलने लगे हैं. महेश सबसे बड़ी दिक्कत बेरोजगारी को बताते हैं वह कहते हैं कि 1989 में जागेश्वर प्रसाद सदर के विधायक और स्वास्थ्य मंत्री भी थे, जो विकास हुआ केवल उनके द्वारा किया गया है. फतेहपुर शहर में कुपोषण के शिकार मुस्लिमों की संख्या बेहद ज्यादा है लेकिन अखिलेश ने साइकिल बांटी, यह एक बात बार बार कही जाती है.

  

नरेश उत्तम की विधानसभा

बिन्दकी समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम की अपनी गृह विधानसभा है. यहां चाय की दुकान चलाने वाले सुरेश तिवारी पिछले चुनाव में निर्दलीय चुनाव भी लड़ चुके हैं. वह कहते हैं, 'इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि गंगा किनारे होकर भी हमारे खेत प्यासे हैं, एक वक्त था कि रामगंगा से छोटी छोटी नहरें चला करती थीं, उसमे अब पानी नहीं है. सुरेश कहते हैं "जो विजयी होता है बिल्ला हो जाता है मैं तो इस बार नोटा का इस्तेमाल करूँगा". 

मौजूदा बसपा विधायक सुखदेव वर्मा से जनता को बड़ी शिकायत है कि वो ज्यादातर समय कानपुर में ही रहते हैं जब कभी आते भी हैं तो ग्राम प्रधानों से मिलते हैं आम जनता से नहीं मिलते. गाँव के शिक्षक नरेन्द्र बताते हैं कि हमारे गाँव को जबसे लोहिया गाँव बनाया गया है तब से गाँव में विकास कार्य हुए हैं इसमें जरुर विधायक जी का योगदान है. 

हालांकि यहीं के सुरेश चन्द्र दीक्षित कहते हैं "सुखदेव वर्मा दो बार जीते हैं लेकिन इस बार हैट ट्रिक नहीं कर पायेंगे. यहाँ के विधायक केवल हैंडपंप लगवाते हैं और आरसीसी सड़क बनवाते हैं". गाँव के लड़के बताते हैं कि तीन विधायकों ने मिलकर अपने तीन कार्यकाल में 300 मीटर सड़क बनवा दी. इस विधानसभा के ज्यादातर गाँवों में कमजोर बल्लियों पर बिजली के तार झूलते देखे जा सकते हैं. 

राजाराम कहते हैं "बसपा का विधायक जितना कर सकता था उसने किया, आलू का भाव बहुत कम हो गया है इसके सुखदेव वर्मा भला क्या करें?" गाँव के अयोध्या कहते हैं "एक बार नोटा वाले बहुमत बना ले तो केवल बिन्दकी नहीं पूरा फतेहपुर ठीक हो जाए". इस बार भाजपा ने करण सिंह पटेल को उतारा है, सुखदेव वर्मा को छोड़कर अन्य प्रत्याशियों को जनता बहुत जनता नहीं जानती. कई जगह लोगों की बातचीत से पता चलता है कि यहाँ बसपा मतलब हाथी पार्टी ,भाजपा मतलब मोदी और सपा मतलब साइकिल है. 

अयोध्या पाल पर बिपदा भारी

फतेहपुर की अयाह शाह विधानसभा सीट से पूर्व खेल मंत्री अयोध्या पाल चार बार बसपा से विजयी रहे हैं लेकिन इस बार जब बसपा ने इनका टिकट काटा तो वो सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर गए. हालांकि अयोध्या पाल को कई गाँव में सभाएं नहीं करने दिया गया है. पूर्व मंत्री राधेश्याम गुप्ता जिनका भाजपा में भारी दबदबा रहा है के पुत्र विकास गुप्ता भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं, वो अपने पिता के नाम पर वोट मांग रहे हैं. 

अयाह शाह विधानसभा में घुसते ही ससुर खदेरी नदी मिलती है जिससे इस विधानसभा क्षेत्र में सिंचाई हो जाया करती थी. कुछ वर्ष पूर्व उसका जीर्णोद्धार हुआ विधायक को प्रशंसा मिली कलेक्टर को राष्ट्रपति पुरस्कार, लेकिन अब नदी फिर से पुरानी हालत में पहुँच गई है. 

विधानसभा के एक बड़े से गाँव शामियाना में घुसते ही महिलाओं का हुजूम मिलता है. वो कहती हैं कि परिवार का वोट एक ही जगह पड़ेगा और किसे पड़ेगा यह घर की महिलायें ही तय करेंगी. शामियाना गांव के लोग बताते हैं कि सरकारी चांपाकल जहाँ लगा है वो दबंग हैं और किसी को पानी नहीं लेने देते. गाँव वालों को पानी के चार किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है. यहां के घरों में शौचालय भी नहीं है.

First published: 14 February 2017, 10:22 IST
 
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