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कौन कितने पानी में? 314 सीटों पर मतदान के बाद एक आकलन

सादिक़ नक़वी | Updated on: 1 March 2017, 7:46 IST

उत्तर प्रदेश के मतदान के पांच चरण पूरे हो चुके हैं. पांचवें चरण के चुनाव में सिर्फ 57 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. इस चरण में बलरामपुर, गोंडा, फैजाबाद, अंबेडकर नगर, बहराइच, बस्ती, श्रावस्ती, सिद्धार्थ नगर, संत कबीर नगर, अमेठी और सुल्तानपुर जिलों में चुनाव पूरे हुए हैं.

अमेठी में चुनाव विशेष रूप से रोचक रहा, जहां गठबंधन साझेदार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोस्ताना संघर्ष यानी फ्रेंडली फाइट में दिख रहे हैं. यहां समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हैं गायत्री प्रसाद प्रजापति और कांग्रेस से अमिता सिंह चुनाव मैदान में हैं. इनको भाजपा की ओर से चुनौती दे रही हैं गरिमा सिंह.

मोदी की रैली हुई दोगुना

अब जबकि चुनाव के सिर्फ दो चरण बचे हैं जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश को कवर किया जाएगा, सभी दल अपने-अपने प्रदर्शन का मूल्यांकन करने में जुटे हैं. इस बीच भाजपा की ओर से एक संकेत मिला है, किसी और से नहीं खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्तर से, जिन्होंने चुनाव में अपनी रैलियों की संख्या बढ़ाकर दोगुनी कर दी है. इसके अनुसार भाजपा ने अब तक के चुनाव में अपनी उम्मीद के अनुकूल ही बेहतर प्रदर्शन किया है.

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को मऊ में एक रैली को संबोधित करते हुए दावा किया कि 'कई चरणों के चुनाव के बाद मैं आपसे कह रहा हूं वे हार रहे हैं.' उनका इशारा सपा-कांग्रेस के गठबंधन की ओर था. प्रधानमंत्री ने कहा 'लोगों ने उनको खारिज कर दिया है. अब समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी एक नये गेम प्लान पर काम कर रहे हैं. वे अपने आपको हंग असेंबली के लिए तैयार कर रहे हैं.'

प्रधानमंत्री मोदी की यह टिप्पणी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं के उन दावों के विपरीत है जो कि यह दावा करते आ रहे थे कि भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने जा रहा है. यानी कि भाजपा सिर्फ जीतेगी ही नहीं, वह सबका सफाया कर देगी.

भाजपा का यह बेसब्री और असमंजस कुछ समय पहले उस समय दिखना शुरू हुई थी जबकि उसने ध्रुवीकरण के प्रयास शुरू किए थे. फतेहपुर की एक रैली में मोदी ने खुद ही उस विकास का एजेंडे को छोड़कर जो कि अब तक का उनका मुख्य स्वर रहा था, कब्रिस्तान और श्मशान का सांप्रदायिक कॉर्ड खेला था.

राजनीतिक विश्लेषक मोदी के इस वक्तव्य को भाजपा की ओर से हिंदू वोटबैंक को ध्रुवीकरण करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं, जिसके बिना भाजपा को सपा-कांग्रेस उस गठजोड़ को हराना मुश्किल दिख रहा है जिसमें यादव-मुस्लिम का मजबूत वोट बैंक है और एक तरफ बसपा है जिसके पास निचली जातियों का समर्थन है.

प्रथम चार चरणों में किसी तरह के हिंदू वोट बैंक के एकजुट होने की खबर नहीं थी. इसके विपरीत कई समुदायों जैसे जाट और दलितों के कुछ समुदायों जिन्होंने 2014 में भाजपा का समर्थन किया था इस बार भाजपा से दूरी बनाते दिखे. फिर भी भाजपा इस चरण तक उससे तो बेहतर करती दिख रही थी जो कि उसने 2012 में प्रदर्शन किया था.

हालात अनुकूल नहीं

तीन अंतिम चरणों में भाजपा के लिए स्थिति कुछ पेचीदा दिख रही है. इस चरण में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने अपने उच्च जातीय और गैर यादव ओबीसी वोटरों को एकजुट करने के लिए इन समुदायों से 67 उम्मीदवार खड़े किए हैं. जिनमें से कई मौजूदा विधायक हैं और जिनका अपना एक जनाधार है. बसपा ने भी इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को टिकट दिया है.

इस सबके के साथ यह देखते हुए कि इस बार 2014 की तरह कोई लहर मोदी के लिए नहीं है, भाजपा के लिए ये चरण आसान नहीं रहने वाले. पार्टी के चुनाव रणनीतिकारों ने भी यह समझ लिया था. इसलिए पार्टी को अपनी डिफाल्ट रणनीति यानी सांप्रदायिक की नीति पर लौटना पड़ा.

भाजपा के लिए स्थिति इसलिए कठिन हो जाती है कि आगे आने वाले चरणों में मुस्लिम वोटों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी. सोमवार को हुए पांचवें चरण के मतदान के लिए जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 22.7 प्रतिशत थी तो वहीं छठवें और सातवें चरण के मतदान के लिए मुस्लिम वोटरों की संख्या क्रमश: 13 प्रतिशत और 10 प्रतिशत है.

सोमवार को जिन 52 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव हुए उनमें कम से 21 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत 25 प्रतिशत से अधिक है. यही वजह है कि मायावती ने इन सीटों से 18 मुस्लिम उम्मीदवारों की टिकट दिया है और अपने पूरे अभियान में मायावती दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर जोर देती रही हैं.

जबकि कांग्रेस-सपा गठबंधन ने इस डर से कि कहीं अधिक मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा करने से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण न हो जाए सिर्फ 10 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को ही टिकट दिया है. लेकिन अब भाजपा अपने सांप्रदायिक फ्लेवर की ओर लौटती दिख रही है. एसपी के एक रणनीतिकार की मानें तो इससे उनकी पार्टी को फायदा हो सकता है.

उनकी बात मानें तो अब हमारे नेताओं को मुस्लिम वोटरों को रिझाने के लिए कोई खास प्रयास करने की जरूरत नहीं होगी. भाजपा के नेता ही जो कर रहे हैं उससे मुस्लिम वोटर अपने आप ही हमारे पास आ रहा है साथ ही इससे हमारे नेता अखिलेश यादव की ऐसे विकासवादी नेता की छवि बन रही है जो सर्वसाधारण का ध्यान रखता है. साथ ही उनका कहना है कि कांग्रेस और सपा का गठबंधन ही अल्पसंख्यकों को साफ संदेश देने के लिए काफी था.

मुसलमान गठबंधन के साथ?

सपा के इस रणनीतिकार की मानें तो पहले तीन चरणों के चुनाव में यह स्पष्ट हो चुका है कि उन विधानसभा क्षेत्रों में जहां बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए हैं वहां मुस्लिमों का रुझान सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर ही अधिक रहा है. इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं आगे आने वाले चरणों के चुनाव में कोई ध्रुवीकरण होगा और भाजपा में बैचेनी की यही सबसे बड़ी वजह है.

सपा के एक और रणनीतिकार का कहना है कि 2014 के चुनाव में भाजपा के पास मोदी के रूप में एक चेहरा था जिसकी ओर मतदाताओं का झुकाव था पर इस बार के चुनाव यह चेहरा काफी नहीं होने वाला, यह स्पष्ट है.

लेकिन सपा हलकों में भाजपा के द्वारा दिए जा रहे इस संदेश से चिंता जरूर है कि “हम सरकार बनाने जा रहे हैं.” विशेष रूप से इसलिए कि भाजपा के अनेक नेता ऐसा कहते हुए अखबारों के फ्रंट पेज पर आ रहे हैं जबकि सपा के पास अखिलेश ही ऐसे नेता हैं जिनको फ्रंट पेज पर स्थान मिलता है.

दूसरी तरफ भाजपा उन क्षेत्रों में जहां मुस्लिम वोट स्विंग लाने की क्षमता में हैं वहां मुस्लिम वोटों के बंटवारे से उम्मीद लगाए हुए है. यहां तक कि अगर ऐसा होता भी है तो भी भाजपा को सरकार बनाने के लिए अंतिम तीन चरणों में काफी सीटों पर कब्जा करना होगा.

First published: 1 March 2017, 7:46 IST
 
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