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यूपी में महागठबंधन: इस गठबंधन से कांग्रेस का अस्तित्व भी समाप्त हो सकता है

गोविंद पंत राजू | Updated on: 10 February 2017, 1:45 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में सभी बड़ी पार्टियों ने रथ यात्रा समेत तमाम जोड़तोड़ शुरू कर दी है. 
  • मगर सबसे बड़ा संकट कांग्रेस पार्टी पर है जिसके आसार समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बनते दिख रहे हैं. 

उत्तर प्रदेश में चुनाव की आहट शुरू होते-होते राजनीतिक समर में तरह तरह के रथ और रथयात्राएं नजर आने लगी हैं, कांग्रेस ने अपनी छोटी यात्राओं के दौरान प्रशांत किशोर के संचालन में राहुल गांधी की देवरिया से दिल्ली की खाट यात्रा करने के बाद जिले स्तर की यात्राएं शुरू की हैं तो बीजेपी चार रथ यात्राएं सहारनपुर, ललितपुर, सोनभद्र और बलिया से शुरू करने जा रही है.

ये सभी यात्राएं लखनऊ में एक बड़ी रैली के रूप में खत्म होंगी. युवाओं को जोड़ना इन यात्राओं का खास मकसद है. बीएसपी अध्यक्ष मायावती पहले ही हर रविवार किसी न किसी मण्डल मुख्यालय पर बड़ी रैली की शुरूआत कर चुकी हैं. अखिलेश यादव भी अपनी हाईटेक रथयात्रा ‘विकास से विजय की ओर’ निकल रहे हैं.

बेशक इन रथयात्राओं का मकसद अपनी पार्टी के लिए जीत का रास्ता तैयार करना है लेकिन लगता है कि उत्तर प्रदेश इस बार किसी भी राजनीतिक दल के लिए अपने दम पर सरकार बना पाना मुश्किल है इसीलिए इस बार चुनाव से बहुत पहले ही राजनीतिक गठबन्धनों की सुगबुगाहट शुरू हो गई है.

हालांकि बीएसपी अभी किसी गठबन्धन के लिए इच्छुक नहीं दिख रही है क्योंकि वो पहले से ही इस रणनीति पर चलती रही है कि चुनाव के बाद के गठबन्धन में सौदेबाजी की सम्भावनांए भी ज्यादा रहती हैं और इस बात की भी आजादी रहती है कि आप अपने फायदे के लिए अपने धुर विरोधी से भी समर्थन ले सकते हैं. 

गठबंधन का दौर

बीजेपी पहले से ही अपना दल के साथ गठबन्धन में है और यह विधानसभा चुनाव में भी जारी रहेगा. राष्ट्रीय लोकदल भी बीएसपी की तरह अपने पत्ते खुले रखना चाहता है ताकि चुनाव बाद की स्थितियों में वह भी मौके का फायदा उठा सके, जैसा कि उसने पूर्व में भी बसपा, बीजेपी, और समाजवादी पार्टी की सरकारों में हिस्सेदारी करके उठाया था. इस बार भी राष्ट्रीय लोकदल कांग्रेस से गठबन्धन की बातचीत कर चुका है और समाजवादी पार्टी से भी उसकी बातचीत हुई है.

लेकिन गठबंधनों की इस सुगबुगाहट के बीच सबसे बड़ी चर्चा कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के संभावित गठबंधन को लेकर चल रही है और पहले खाट यात्राओं के दौरान राहुल गांधी द्वारा ‘अखिलेश अच्छा लड़का है’ कहे जाने और फिर कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के साथ मुलाकात ने इन चर्चाओं को खूब हवा दी है.

सपा और कांग्रेस

समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने तो गांधीवादियों, लोहियावादियों और चरण सिंह के अनुयायियों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एकजुट करने की कोशिश पहले से ही शुरू कर दी है. समाजवादी पार्टी के रजत जयंती कार्यक्रम में ऐसे सभी नेताओं को आमंत्रित करना भी इसी रणनीति का एक हिस्सा है.

अब बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी को रोकने के लिए एक महागठबन्धन की भी चर्चा शुरू हो गई है. लेकिन इस महागठबंधन को लेकर कई सन्देह और सवाल हैं. समाजवादी पार्टी द्वारा बिहार चुनाव के दौरान ‘महागठबंधन’ का अगुवा होने के बावजूद बीच में ही गठबंधन तोड़ देने से पैदा हुई खलिश अभी मिटी नहीं है, नीतीश कुमार ने रजत जयन्ती का न्यौता ठुकराकर इसके साफ संकेत दे दिये हैं.

वैसे भी कांग्रेस को छोड़कर राजद और जेडीयू का उत्तर प्रदेश में कोई खास जनाधार नहीं है, इसलिए ऐसा लगता है कि ऐसे महागठबन्धन में समाजवादी पार्टी भी ज्यादा रुचि नहीं लेगी. फिर समाजवादी पार्टी के सामने इस बात को लेकर भी बड़ा धर्मसंकट है कि वो गठबन्धन में शामिल होने की दशा में अपने किन उम्मीदवारों के टिकट काटे. जाहिर है कि पार्टी के पास टिकट के दावेदारों की भरमार है और जिसकी भी सीट गठबंधन के हिस्से जाएगी उसका नाराज होना तय है.

वैसे समाजवादी पार्टी पूर्वांचल की 10-15 सीटों पर प्रभाव रखने वाले कौमी एकता दल से जुड़ ही चुकी है, अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल से भी उसकी खिचड़ी पक रही है. कांग्रेस को साथ जोड़ना उसकी स्वाभाविक रुचि हो सकती है और कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते भी बहुत खुले हुए हैं. उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों में वो राहुल गांधी या सोनिया गांधी के खिलाफ अपना उम्मीदवार कभी नही उतारती.

यूपी कांग्रेस के बड़े नेता प्रमोद तिवारी को राज्यसभा भी समाजवादी पार्टी ने ही पहुंचाया है. केन्द्र में भी समाजवादी पार्टी मनमोहन सरकार की तारणहार रही है. इसलिए समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में फिर से सत्ता वापस पाने के लिए कांग्रेस से दोस्ताना करने में गुरेज नहीं हो सकता.

लेकिन इस तरह के किसी भी समझौते में सीटों का बंटवारा सबसे अहम मुद्दा बनेगा. कांग्रेस एक हद से कम सीटों पर मानेगी नहीं और सपा बहुत ज्यादा सीटें उन्हें दे नहीं सकती. समाजवादी पार्टी खुद ही इस समय बड़े झंझावात में फंसी हुई है. जिस तरह का दंगल पार्टी के भीतर चल रहा है, उसमें जीत हार का फैसला स्पष्ट हुए बिना यह सम्भव नहीं कि समाजवादी पार्टी किसी गठबंधन का हिस्सा बन पाए.

अखिलेश का दम

अखिलेश अपनी जीत का घोड़ा अपने दम पर दौड़ाना चाहते हैं तो राजनीति के पुराने खिलाड़ी उनके पिता और चाचा इधर-उधर से जोड़ घटाना कर मंजिल पाने के इच्छुक हैं. ऐसे में चर्चाओं के तौर पर भले ही समाजवादी पार्टी को कांग्रेस से बात चलती दिख रही हो मगर हकीकत में समाजवादी पार्टी के आत्म मंथन और गृहयुद्ध के फैसले के बाद ही ऐसा कोई फैसला हो सकता है, उससे पहले नहीं.

जहां तक कांग्रेस की बात है तो वह छह महीना पहले तक खुद को उत्तर प्रदेश की जीत के दावेदारों में बता रही थी. जाहिर है मौजूदा गठबंधन की अटकलें अगर सही हैं तो कांग्रेस पार्टी ने अपनी रणनीति में एक बड़ा यूटर्न लिया है. पार्टी को अपनी संभावनाओं के बारे में अंदाजा हो गया है.

हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश कांग्रेस में चले घटनाक्रम ने भी शायद पार्टी को अपना ट्रैक बदलने को मजबूर किया है. मोहम्मद मुस्लिम और रीता बहुगुणा जैसे दस विधायकों के पार्टी छोड़ने से उसे काफी धक्का लगा है. बेनी प्रसाद वर्मा के कांग्रेस छोड़कर सपा में शामिल होने से शुरू हुआ यह सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है.

कांग्रेस पार्टी ने बड़े जोरशोर से राजबब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था लेकिन जानकार बताते हैं कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी में संगठन निर्मल खत्री के जमाने का ही चल रहा है. मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर शीला दीक्षित को भी एक मजबूर चेहरा माना गया.

कांग्रेस को चाहिए सहारा

प्रशांत किशोर की रणनीति चाहे जो गुल खिलाए मगर यूपी में बचे खुचे कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को उनका कारपोरेट अंदाज पच नहीं पा रहा है. ऐसे में काग्रेस को यूपी में मजबूत बनने के लिए किसी सहारे की शिद्दत से जरूरत है. राष्ट्रीय लोकदल से बात बन सकती है, पर उसका प्रभाव क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है. उत्तर प्रदेश के मौजूदा माहौल में सपा उसके लिए सबसे मुफीद साझीदार नजर आ रही है.

कांग्रेस पार्टी को गठबंधन का बड़ा झटका 2002 के विधानसभा चुनाव में लग चुका है. तब कांग्रेस ने बसपा के साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ा था लेकिन उसे सिर्फ 25 सीटें मिलीं. बसपा के साथ गठजोड़ का भयंकरा खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा था. बसपा का वोटर तो कांग्रेस के साथ नहीं आया लेकिन उस चुनाव में कांग्रेस का जो बचा खुचा वोटबैंक था उसमें भी बसपा ने गहरी सेंध लगा दी थी. उस चुनाव में बसपा को 98 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. दलित वोट कभी कांग्रेस का जनाधार होता था वह पूरी तरह से कांग्रेस के हाथ से खिसक कर बसपा के पाले में चला गया.

अयोध्या की घटना के बाद मुस्लिम मतदाताओं के बिखरने के कारण भी उसे धक्का पहुंचा. इसका नतीजा ‘27 साल, यूपी में कांग्रेस बेहाल’ के रूप में सामने आया. कांग्रेस अब इसी बात को ध्यान में रखकर बसपा से किसी तरह का चुनाव पूर्व गठबन्धन नहीं करना चाहती.

कांग्रेस के ज्यादातर रणनीतिकारों और स्थानीय नेताओं को लगता है कि उत्तर प्रदेश में लोकदल और कुछ अन्य छोटे दलों के साथ बिहार में सत्ता के सहयोगी दलों का महागठबन्धन उसके लिए सबसे अनूकूल हो सकता है. इसमें 275 से 300 सीटों पर कांग्रेस खुद लड़ना चाहेगी और 100 से 125 सीटें अपने इन सहयोगियों को देकर वह उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है.

कांग्रेस में एक सोच यह भी है कि कांग्रेस के लिए यूपी का 2017 का चुनाव जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्व उसके लिए अगले लोकसभा चुनाव का है. इसलिए गठबन्धन या महागठबन्धन जो भी होगा वह इसी बात को ध्यान में रखकर होगा.

सपा का क्या होगा?

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी है. गठबंधन की खबर एक तरह से चुनाव से पहले सत्ताधारी पार्टी द्वारा हार की आहट के तौर पर देखी जा रही है. इस साल की शुरुआत तक अखिलेश यादव सबसे मजबूत चेहरा नजर आ रहे थे. भाजपा और नरेंद्र मोदी के विकास के नारे पर अखिलेश यादव का विकास भारी पड़ता दिख रहा था. फिर अचानक से आदा साल बीतते-बीतते परिवार की अंदरूनी लड़ाई बुरी तरह से सतह पर आ गई. अंदरूनी खींचतान ने चुनाव से ठीक पहले पार्टी कार्यकर्ताओं और वोटरों को दुविधा में डाल दिया है. बीते तीन महीनों के दौरान मुलायम सिंह यादव के परिवार में हर दिन चले शह-मात के खेल ने पार्टी के सबसे अहम वोटबैंक मुसलमानों को भी नाराज कर दिया है.

आज की तारीख में समाजवादी पार्टी को सबसे बड़ा खतरा इसी बात का सता रहा है कि कहीं मुसलमान वोट उससे छिटक न जाय. इस कमी को पूरा करने के लिए शिवपाल यादव और मुलायम सिंह यादव ने कौमी एकता दल के सपा में विलय को मजूरी दी जबकि अखिलेश यादव लगातार इसका विरोध कर रहे थे.

जानकारों की राय है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन की हालत में सपा को कोई नुकसान भले न हो लेकिन कोई बड़ा फायदा होता भी नहीं दिख रहा है.

First published: 3 November 2016, 7:52 IST
 
गोविंद पंत राजू @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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