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बुंदेलखंड: पानी, काम और पेट के लिए राशन देने वाले को वोट

सादिक़ नक़वी | Updated on: 23 February 2017, 8:15 IST

 

इस बार चुनावों में क्या चल रहा है? हवा का रुख किधर है? ‘भैया अच्छा चल रहा है’...‘तीनों पार्टी लड़ाई में हैं’...‘सब पार्टी एक-सी ही हैं’... ‘कोई भी जीते, क्या फर्क पड़ता है...’ कार्वी और मानिकपुर के चुनावी क्षेत्रों में ये प्रतिक्रियाएं आम हैं. दोनों निर्वाचन क्षेत्र बुंदेलखंड के शुष्क परिदृश्य में अपेक्षाकृत नए बने जिले चित्रकूट (1997) में हैं. कुछ लोगों का अपना स्वतंत्र निर्णय नहीं है, वे कहते हैं, ‘जिसे आप कहेंगे, उसे ही वोट दे देंगे.’


जैसे ही चुनाव हरे-भरे दोआबा से सूखे और गरीबी की मार झेल रहे इलाके की ओर बढ़ रहे हैं, पश्चिमी यूपी की फूट डालने वाली भाषा- ‘यहां तो हिंदू-मुस्लिम इलेक्शन ही होता है’ बदल गई है. लोग कहते हैं, ‘जो हमारी मदद करेगा, हमें पानी देगा, उसे वोट देंगे.’

 

मायावती ने काम किया


जंगलों के बीच मोरकेता गांव की कोल कबायली महिला निराशा कहती हैं, ‘मायावती के समय में चीजें ज्यादा अच्छी थीं.’
गांव में बबली कोल जैसे डकैत रहते हैं, जो अब भी सक्रिय हैं और वे फरमान जारी कर सकते हैं कि गांव वालों को किन्हें वोट देना है. एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि एक चुनाव के दौरान फरमान जारी किया गया- ‘मोहर लगाओ हाथी पे, वरना गोली खाओ छाती पे.’ मायावती के रहते ही खतरनाक डकैत दुदवा मारा गया था.


निराशा ने आरसीसी सडक़, बिजली के खंभों पर लगे सौर पैनल और सूखे कुओं की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘यह सारा काम मायावती के समय में हुआ. यहां पानी का भारी संकट है. गांव में कई हैंडपंप हैं. पर केवल इसी में पानी आता है. बाकी के सूख गए हैं.’ निराशा उसी हैंडपंप पर कपड़े धो रही थी.


पिछले दो साल निराशा ने काफी तकलीफें झेली हैं. उनके बारे में बताती हुई कहती हैं, ‘जो पेट को राशन देगा, उसी को वोट मिलेगा.’ उसने 8 बीघा खेत में धान बोया है, जो संयुक्त परिवार का है. वे कहती हैं, ‘हमें एक भी अनाज नहीं मिला. जो थोड़ा-बहुत उगा, सूखे वाले साल में हमारे जानवरों ने खा लिया. यह इस इलाके का बड़ा गंभीर मुद्दा है. अन्न प्रथा में किसान खाने की कमी के कारण अपने जानवरों को चारे केलिए छोड़ देते हैं. इससे छोटे किसानों पर कहर टूट पड़ता है.’


‘सूखे की स्थिति में जो भी राहत सरकार से मिली, ससुर के पास चला गया क्योंकि खेत उनके नाम से है.’ निराशा ने आगे बताया कि उसे जंगलों में मनरेगा के अधीन किस तरह गड्ढ़े खोदने का काम करना पड़ा.. ‘वो पैसा भी देर से आता है. और कभी-कभी ठेकेदार पैसा काट लेता है.’

 

नोटबंदी ने गरीबों की हत्या कर दी

 

मोरकेता मानिकपुर निर्वाचन क्षेत्र में पड़ता है. मोरकेता ने पिछले दो चुनावों में बसपा उम्मीदवार को चुना. 2007 में दादू प्रसाद और 2012 में चंद्रभान पटेल. मायावती के समय दोनों मंत्री थे. चंद्रभान को बसपा ने फिर खड़ा किया है, जबकि दादू प्रसाद बहुजन मुक्ति पार्टी से खड़े किए गए हैं. जब पिछली बार उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया गया, उन्होंने यह पार्टी बनाई थी. गुलाबी गैंग की संपत लाल सपा-कांग्रेस गठबंधन की उम्मीदवार हैं, जबकि भाजपा ने पूर्व बसपा नेता आरके सिंह पटेल को खड़ा किया है.


एक अन्य ग्रामीण राजपाल ने बताया, ‘दादू प्रसाद ने काफी काम किया है. पिछली सरकार के समय कुछ काम नहीं हुआ था, सिर्फ सूखे के समय राशन के पैकेट दिए गए थे.’ वे भी मनरेगा के लिए जंगलों में 2 से 10 फीट गहरे गड्ढ़े खोदने का काम करते हैं. हरेक गड्ढ़े पर उन्हें 30 रुपए मिलते हैं. ‘मैं रोजाना 4 से 5 खोद लेता हूं,’ यह कहते हुए राजपाल ने बताया कि किस तरह वह यहां रह रहे कुछ लोगों में हैं और बाकी के काम की तलाश में बड़े नगरों में चले गए.


निराशा और राजपाल दोनों ने बताया कि उन्होंने पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा को वोट दिया था. राजपाल ने कहा, ‘तब भी हमारे जीवन में कुछ नहीं बदला. नोटबंदी के दौरान मुझे दिहाड़ी भी नहीं मिली.’ केकरामर गांव के शिवनारायण कोल कहते हैं, ‘नोटबंदी करके मोदीजी ने गरीबों की हत्या कर दी. यह बुवाई के ठीक समय पर हुई. हम बसपा नेताओं को पानी का संकट दूर करने का कहते-कहते थक चुके हैं. अब हम सपा विधायक को चुनेंगे क्योंकि यदि पार्टी फिर सत्ता में आती है, तो वह कम से कम हमारी फिर मदद करेगी.’

 

फिर भी भाजपा मजबूत


हालांकि भाजपा ने इस इलाके में अपने पैर जमा लिए हैं. पंधरा कोल कहते हैं, मायावती हरिजनों की मदद करती हैं. सपा सरकार ने केवल यादवों की मदद की. इस बार हमें मोदी की भी परीक्षा लेनी चाहिए. पंधरा अपने गांव गढ़वा जा रहे थे, जो मोरकेता से कुछ किलोमीटर दूर है. वे कहते हैं, ‘संपत पाल सही हैं. काफी औरतें उनका साथ दे रही हैं. पर वे गलत पार्टी सपा से खड़ी हो रही हैं.’


दुर्गा प्रसाद पाल कहते हैं, ‘पर यदि किसी बिजूके को भी भाजपा से टिकट मिलता है, तो उसे मोदी के कारण वोट मिलेंगे’. वे आगे बताते हैं कि किस तरह पाल समुदाय संपत पाल का साथ दे सकता है. गांव की अन्य कई पिछड़ी जातियां भाजपा के साथ हैं.

 

अमरपुर गांव के बाल्मीक राजू बंसल कहते हैं, ‘जब सब मोदी से खुश हैं, तो हम परेशान क्यों हों.’ राजू और उनके दोनों बेटे बांस की टोकरियां बनाते हैं. ‘हमारी आय का यही जरिया है. हम एक दिन में 5-6 बना लेते हैं और 200 रुपए कमाते हैं.’ ‘नोटबंदी अच्छी चीज थी. इसका हम गरीबों पर कोई असर नहीं हुआ,’ राजू के बेटे किशन बंसल बीच में बोल पड़ते हैं. ‘अब मोदी ने अमीरों पर हमला किया है, वे हमें कुछ सीधी मदद करेंगे, कुछ पैसा देंगे.’


इसी गांव की शांति कोल निराश हैं. कहती हैं, ‘हमें पानी के लिए बनियों और ठाकुरों पर निर्भर रहना पड़ता है. खेतों की सिंचाई करते समय इसमें आसानी रहती है क्योंकि वे पैसा नहीं मांगते. अन्य मौसम में वे पैसा मांगते हैं, पानी तक के लिए. कोई भी हमारी दशा सुधार नहीं सका है.’


इस ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा पटेल और ब्राह्मण काफी संख्या में हैं. दो वर्चस्व वाली जातियां. पटेल भाजपा और बसपा में विभक्त लगते हैं. निर्वाचन क्षेत्र के ब्राह्मणों का एक वर्ग भाजपा के साथ है. मानिकपुर के सुरेश त्रिवेदी कहते हैं, ‘हमें सुनिश्चित करना है कि इस बार भाजपा सत्ता में आए.’ इस क्षेत्र में आरएलडी का कोई आधार नहीं है फिर भी उसने भाजपा की गणित बिगाडऩे के लिए ब्राह्मण उम्मीदवार खड़ा किया है.


गठबंधन उम्मीदवार पाल की उम्मीदें शांति कोल और निराशा जैसी निराश औरतों पर टिकी है, जिन्हें पानी जैसी आधारभूत जरूरत के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है. एक स्थानीय सपा नेता ने बताया, ‘पिछली बार उन्हें कांग्रेस के टिकट पर 23 हजार वोट मिले थे. इस बार सपा के वोट भी मिलेंगे.’

 

कार्वी में सपा और भाजपा के बीच सीधी टक्कर

 

2007 में मारे गए डकैत दुदवा के बेटे वीर सिंह पटेल इस बार फिर यहां से सपा उम्मीदवार हैं, जबकि भाजपा ने चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय को खड़ा किया है. चंद्रिका प्रसाद शहर में पूर्व प्रमुख विकास अधिकारी रहे हैं. उन्होंने पिछला चुनाव भाजपा के टिकट पर ही लड़ा था, पर हार गए थे.


वीर सिंह के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर को देखते हुए भाजपा समर्थकों को जीतने की उम्मीद है. मुन्ना खान कहते हैं, ‘वे दुबारा नहीं जीते, तो अच्छा रहेगा.’ मुन्ना खान की मंगल बजारिन चित्रकूट में दूकान है. वे आगे कहते हैं, ‘उन्होंने 5 साल में एक बार भी चेहरा नहीं दिखाया. यदि ब्राह्मण बसपा के ब्राह्मण उम्मीदवार गौतम को जिताते हैं, तो पार्टी जीत जाएगी. मंदिरों का कस्बा होने के कारण यहां ब्राह्मण काफी संख्या में हैं.’ हालांकि ऐसा लगता नहीं है.


खोई गांव के स्वामी धर्माचार्य कहते हैं, ‘इस बार सीट भाजपा को जाएगी.’ यहां कामदगिरि पहाड़ को पवित्र माना जाता है. वे कहते हैं, ‘केवल संत समाज ही नहीं, बल्कि अन्य सभी जातियों के लोग-लोढ़ा, पटेल, निशाद, सभी भाजपा उम्मीदवार को सहयोग करते नजर आ रहे हैं’. उनके साथ अन्य ग्रामीण भी कहते हैं, ‘हम उन्हें पानी तक के लिए नहीं पूछेंगे क्योंकि वे बसपा के टिकट से खड़े हो रहे हैं.’


‘यह अच्छा रहेगा यदि राज्य और केंद्र में एक की ही सरकार हो’, मुन्ना अवस्थी बीच में अपनी बात रखते हैं. और सच्चाई बयान करने के लहजे में कहते हैं, ‘पड़ौसी एमपी को दखें, जो यहां से बहुत करीब है. शिवराज सिंह की सरकार ने यहां कितना विकास किया है.’


धर्माचार्य अपने खुद के 2 लाख के ऋण का जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘मोदी ने ऋण-मुक्ति की लॉलीपॉप देने का वादा किया था. इस क्षेत्र के 80 फीसदी से ज्यादा लोगों ने बैंक का ऋण नहीं चुकाया है. सबको मोदी से उम्मीदें हैं.’ हालांकि सपा से सभी दुखी नहीं हैं. चित्र गोकुलपुर गांव में किराने की दुकान चला रहे संजय सिंह पटेल कहते हैं, ‘अखिलेश ने गरीबों के लिए काफी काम किया है. एंबुलेंस की सेवाएं, फ्री लैपटॉप और कन्या विद्या धन. कम से कम आधे पटेल सपा को वोट देंगे.’


स्थानीय सपा नेता मानते हैं कि इस बार का चुनाव वीर सिंह पटेल के लिए मुश्किल रहेगा. पर उन्हें विश्वास है कि पटेल समुदाय अंत समय में उनका समर्थन करेंगे. एक स्थानीय नेता ने बताया, ‘आखिरकार वे सब सत्ता चाहते हैं. इसलिए वे चतुराई से मानिकपुर में आरके पटेल का साथ दे रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यदि भाजपा सत्ता में आई, तो वे मंत्री बनेंगे. और कार्वी में वे इसी वजह से अंत में समर्थन करेंगे क्योंकि यदि सपा जीतती है, तो वीर सिंह केंद्रीय मंत्री बनेंगे. मुस्लिम और यादवों जैसे अन्य समुदायों के सहयोग से वीर सिंह जीतने में सफल रहेंगे.’

First published: 23 February 2017, 8:15 IST
 
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