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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट लहर, रालोद के पक्ष में

सादिक़ नक़वी | Updated on: 14 February 2017, 10:25 IST
कैच न्यूज़ (आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

राष्ट्रीय लोकदल राजनीति में महत्वहीन न होने पाए, इसके लिए उसके मुखिया अजित सिंह ने हर दलों के पास जाकर गठबंधन के लिए जोर-आजमाइश की. समाजवादी पार्टी-कांग्रेस से उनका गठबंधन इसलिए टूटा कि अजित जाट बाहुल्य क्षेत्रों में अपने संगठन के लिए ज्यादा सीटें चाहते थे. यह भी कहा जाता है कि वह गठबंधन के वास्ते भाजपा के साथ भी सम्पर्क में थे. राजनीतिक हलकों में समझा जा रहा है कि भाजपा ने भी उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया और उनसे राष्ट्रीय लोकदल का विलय कर देने को कहा.

जाट बाहुल्य क्षेत्रों जैसे कि बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर आदि में पार्टी का वर्चस्व है. सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा से गठबंधन से न हो पाने की स्थिति में पार्टी अब अपने बूते और अपनी पहचान कायम रखने के लिए इस चुनाव में अकेले ही उतरी है. पार्टी ने स्पष्ट किया है कि वह किसी भी हालत में उप्र में भाजपा की सरकार नहीं बनने देगी. 

भाजपा को इस क्षेत्र में नोटबंदी के बाद से किसानों के सामने उत्पन्न हुई दिक्कतों और क्षेत्र से सटे हरियाणा में आरक्षण समर्थकों के आन्दोलन से जूझने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. अन्य सभी राजनीतिक दलों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद से अजित सिंह और राष्ट्रीय लोकदल ने कृषि कार्य से जुड़े जाटों से भावनात्मक अपील की है और उनकी नस पर हाथ रखा है. क्षेत्र के ज्यादातर जाट खेती से जुड़े हुए हैं. 

भाग्य से जीते मोदी

हालांकि युवाओं और अन्य समुदायों के बीच भाजपा के लोकप्रिय होने की बात कही जाती है. बागपत की एक तहसील और व्यापारिक केन्द्र के रूप में मशहूर बड़ौत के बावली गांव के देवराज सवाल करते हैं कि भाजपा ने हमारे लिए क्या किया है? वह कहते हैं कि मोदी के भाग्य में राजयोग था, इसलिए वह जीत गए.

आरएलडी यहां अकेले मैदान में है और उसने क्षेत्र में विशेषकर जाटों में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बदल दिया है. भाजपा को पिछली बार इन जिलों की कई विधान सभा सीटों पर जीत मिली थी. भाजपा यह उम्मीद मानकर चल रही थी कि उसका यह वोट बैंक है. मुजफ्फरनगर दंगे, जिसके चलते कई लोगों की हत्याएं हुईं और जाट बाहुल्य गांवों से मुस्लिमों का पलायन हुआ, ने सदियों पुराना सामाजिक ताने-बाने में दरार डाल दी है और यह ताना-बाना टूट सा गया है.

हरियाणा के एक पूर्व मंत्री, जो चुनाव अभियान के सिलसिले में मुजफ्फरनगर आए हुए हैं, कहते हैं कि राष्ट्रीय लोकदल को कई सीटों पर लोग गम्भीरता से ले रहे हैं. कई सीटों पर भाजपा और सपा-कांग्रेस को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. यदि भाजपा आरएलडी के साथ गठबंधन कर लेती तो चुनाव एकरफा हो जाता. भाजपा पर धुव्रीकरण का जो आरोप लगता है, आरएलडी की वजह से वह भी नहीं लगता. और अब जब राष्ट्रीय लोकदल अकेले ही मैदान में है, तो हालात उतार-चढ़ाव वाले हो गए हैं.

रालोद की कैंपेनिंग

केबीके ग्राफिक्स

बड़ौत विधानसभा क्षेत्र के एक आरएलडी कार्यकर्ता का कहना है कि हम गांवों में जाकर मुस्लिमों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने हमें वोट दिया तो दोनों समुदायों के लोगों को फायदा होगा. पार्टी कार्यकर्ता का कहना था कि यदि वे हमें आखरी क्षणों में वोट नहीं देते हैं तो आगामी लोकसभा चुनावों में क्षेत्र से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं चुना जा सकेगा. वर्तमान में 20 से ज्यादा जाट समुदाय के लोग लोकसभा में हैं.

छपरौली चीनी मिल में अपना गन्ना देने आए जाट बाहुल्य छपरौली विधानसभा क्षेत्र के सुधीर कुमार कहते हैं कि वर्ष 2013 के साम्प्रदायिक दंगों के बाद भाजपा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण जीत के रथ पर सवार थी. अब वे ध्रुवीकरण नहीं कर पाएंगे और वे सुनिश्चित हैं कि मुस्लिम और जाट वोट देने की खातिर एकजुट नहीं होंगे. हमने उनके खेल को पहचान लिया है. 

बड़ौत के बावली गांव के देवराज, संगीत सोम और सुरेश राणा (दोनों ही ठाकुर समुदाय के हैं) का नाम लेते हुए कहते हैं कि जो राजनीतिक दंगा आरोपों का सामना कर रहे हैं, उनमें से कोई भी जाट नहीं है. मुजफ्फरनगर के बुधना विधान सभा क्षेत्र में आने वाले गांव मोहम्मदपुर गांव के निवासी चन्द्रपाल कहते हैं कि भाजपा के नेताओं ने हमसे कहा है कि दंगों के आरोप में जो जाट युवक जेल में हैं, भाजपा उनकी मदद करेगी. 

उन्होंने कहा कि लेकिन हमें तो अपना बचाव करने के लिए अकेला ही छोड़ दिया गया है. दंगों के बाद से गांव के कई युवा अभी भी जेल में हैं. इस संवाददाता ने दो विधानसभा क्षेत्रों में जाकर राजनीतिक हलचल जानी. आरएलडी के चुनावी अभियान से जाट-मुस्लिम गठबंधन के ट्रैक पर आने में मदद मिली है. क्षेत्र में यह संदेश गया है कि भाजपा, जो दंगों के पीछे थी, उसी ने गठबंधन नहीं होने दिया और अब मतदाताओं का समर्थन हासिल करने आ गई है.

स्टार जयंत चौधरी

रालोद महासचिव जयन्त चौधरी ने विधान सभा चुनाव के लिए कमर कसी. जयन्त ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रतिकार करने के लिए एकता यात्रा और किसान अधिकार रैली निकाली जिसमें लोगों को हुजूम जुटा. उन्होंने नोटबंदी के बाद से रबी की बुवाई के लिए किसानों को हो रही परेशानी बाबत राहत दिलाए जाने की मांग की. 

बड़ौत में दौरे के दौरान इस संवाददाता ने देखा कि वहां बड़ी संख्या में मुस्लिम राष्ट्रीय लोदकल के जाट प्रत्याशी का समर्थन कर रहे हैं और शामली के थाना भवन विधान सभा क्षेत्र में जाटों का एक बड़ा वर्ग पार्टी के मुस्लिम प्रत्याशी के समर्थन में है. ऐसे में यह आकलन निरर्थक ही है कि दोनों समुदाय वोट देने साथ नहीं आएंगे. 

हालांकि, बड़ौत के बावली गांव के तारिक अली की तरह ही अन्य लोग भी कहते हैं कि हम तो आरएलडी प्रत्याशी को ही वोट देंगे क्योंकि वह भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत हैं. इसी तरह थाना भवन में जाट युवाओं का बड़ा हिस्सा भाजपा के सुरेश राणा का समर्थन करना जारी रखे है.

दंगे से मुश्किल बढ़ी

वर्ष 2013 के दंगों के बाद आरएलडी ने खुद को कठिन हालात में पाया है. तथ्य तो यह है कि पार्टी जाटों के  साथ उतनी मुस्तैदी से नहीं खड़ी रही जिस मुस्तैदी से उसे खड़ा होना चाहिए था. इसकी कीमत उसे 2014 के चुनावों में चुकानी पड़ी. जब उसका वोट शेयर आश्चर्यजनक रूप से धड़ाम से आ गिरा. 

2012 के विधानसभा चुनाव में उसके उम्मीदवारों को 12 लाख वोट मिले थे जो वर्ष 2014 में 7 लाख से भी कम हो गए. मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत आने वाले शाहपुर कस्बे के एक चिकित्सक लोकेन्द्र बालियान कहते हैं कि चौधरी अजित सिंह ने 2013 के दंगों के बाद दंगा प्रभावित क्षेत्रों का अपने हेलीकॉप्टर से हवाई दौरा भी नहीं किया. 

बालियान कहते हैं कि इस समय जाट अजित सिंह को वोट कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि अजित ने उनके सम्मान के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है. बड़ौत के ही भाजपा के एक कार्यकर्ता धूम सिंह यह स्वीकार करते हैं कि जाट इस चुनाव में भावना प्रधान हो गए हैं. 

देवराज कहते हैं कि मोदी के पास छोटे-छोटे मुद्टों पर ट्विट करने के लिए वक्त है लेकिन चौधरी चरण सिंह की पुण्य तिथि पर चौधरी साहब को सम्मान देने के लिए उनके पास समय नहीं हैं. वह यह भी कहते हैं कि इस बार की गणतंत्र दिवस की परेड में कोई जाट रेजीमेन्ट नहीं दिखी. बड़ौत के एक किसान विनोद तोमर कहते हैं कि केन्द्रीय कैबिनेट में केवल एक जाट मंत्री संजीव बालियन हैं. उन्हें भी महत्वपूर्ण कृषि मंत्रालय न देकर जल संसाधन मंत्रालय में बैठा दिया गया है.

बुढ़ाना विधान सभा क्षेत्र में आने वाले मुजफ्फरनगर के शाहपुर कस्बे के डॉ. लोकेन्द्र बालियान सवाल करते हैं कि ऐसे में जब सभी जातियां अपने दलों को वोट कर रही हैं तो हमें अपने जाट उम्मीदवारों को क्यों नहीं वोट देना चाहिए. थाना भवन विधान सभा क्षेत्र के गढ़ही पुख्ता गांव के संदीप सिंह कहते हैं कि जाटों का एक बड़ा वर्ग इस समय आरएलडी को वोट देने का विचार कर रहा है जबकि अन्य वर्ग जिसमें ज्यादातर युवा हैं, का दावा है कि भाजपा अभी भी लोकप्रिय है. सपा सरकार तो केवल मुसलमानों को क्षतिपूर्ति करती है.

मोदी की हवा

एक अन्य व्यक्ति का कहना था कि कोई पार्टी कुछ नहीं करती. मोदी कम से कम हिन्दुओं की बेहतरी की बात तो करते हैं. ऐसे समय जब समुदाय का एक वर्ग आरएलडी के लिए आधार बन रहा है, तो ऐसे में यह देखना दिलचस्प है कि एक वर्ग समाजवादी पार्टी की तरफ से चौकन्ना है. कई जाटों का दावा है कि सपा ने गन्ना किसानों के लिए कुछ नहीं किया जबकि उनका लाखों रुपए बकाया पड़ा हुआ है.

बागपत कस्बे में हार्डवेयर की एक दुकान चलाने वाले अजय पाल सिंह कहते हैं कि मोदी एक ईमानदार राजनेता हैं. वह देश के लिए काम कर रहे हैं. वह हाईवे की खस्ता हालत पर कहते हैं कि अजित सिंह और नवाब हमीद (पूर्व विधायक) इस शहर के लिए केवल दुर्भाग्य हैं. उनका दावा है कि युवा जाट और महिलाएं दबाव में हो सकती हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वे भाजपा के साथ नहीं हैं, लेकिन मतदान के दिन देखिएगा, वे भाजपा को ही वोट देंगे.

आरएलडी भी इसे महसूस करती है और वह गांवों में बैठकें कर 'गुमराह युवकों' को वापस आने पर राजी कर रही है. कैच रिपोर्टर ने बावली गांव में हुई एक ऐसी ही बैठक में भाग लिया. बैठक में सभी समुदायों के लोग आए थे. वक्ताओं ने वोट देने के लिए सभी के साथ आने की जरूरत जताई. आरएलडी के एक कार्यकर्ता का कहना था कि अकेले बड़ौत विधान सभा क्षेत्र में आने वाले कम से कम 38 गांव जाट बाहुल्य हैं. इससे हमें अन्य समुदायों के लोगों को प्रभावित करने में मदद मिलेगी.

हालांकि, वह यह भी स्वीकार करते हैं कि अन्य जातियां जैसे कश्यप आदि में रालोद के प्रति आकर्षण नहीं है. लेकिन, तथ्य यह है कि जाटों का एक बड़ा वर्ग, जिसका इन विधानसभा क्षेत्रों में अच्छा-खासा वर्चस्व है, का अब मानना है कि वर्ष 2013 के दंगों के पीछे भाजपा का हाथ रहा है. अन्य जाति समूहों जैसे कि जाटव आदि, जिन्होंने 2014 के विधान सभा चुनाव में भाजपा को वोट किया था, अब बसपा में वापस आ रहे हैं. इसका भी उलटा असर भाजपा पर होता दिखाई पड़ता है.

दंगे की गलती का एहसास

बागपत के कांथा गांव के जाट समुदाय के महेन्द्र सिंह कहते हैं कि तब हम साम्प्रदायिक ताकतों के जाल में फंस गए थे. कवाल गांव की घटना (जिसके चलते मुजफ्फरनगर के दंगे हुए) के बाद हमने सोचा कि सरकार केवल मुसलमानों का पक्ष ले रही है. इस समय ऐसा कोई संदेह नहीं है. 

वह कहते हैं कि बसपा ने विधान सभा क्षेत्र एक मुस्लिम अहमद हमीद को अपना प्रत्याशी बनाया है. वह कहते हैं कि इससे क्या पर्क पड़ता है कि वह मुस्लिम हैं. बसपा हमारी पार्टी है. सिंह कहते हैं कि मायावती भी तो मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की खातिर अपनी साम्प्रदायिक राजनीति के तहत भाजपा और सपा पर हमले करती हैं. कांथा गांव के एक छात्र पंकज कहते हैं कि अगर भाजपा सत्ता में आ गई तो क्या आरक्षण खत्म कर देगी.

बावली गांव की हरिजन चौपाल, जहां जाटव समुदाय के कई लोग जुटे थे, नोटबंदी के बाद से भाजपा से नाखुश हैं. एक सामाजिक कार्यकर्ता महिपाल कहते हैं कि नोटबंदी के बाद से अकेले ट्रोनिका सिटी से ही सैकड़ों लोगों की रोजी चली गई है. वह पूरा ब्यौरा बतलाते हुए कहते हैं कि जब बड़े उद्योगपतियों के पास ही नोटबंदी के बाद से पैसा नहीं बचा है तो वे अपने कामगारों को कैसे वापस बुला सकेंगे. ट्रोनिका सिटी बागपत से सटा औद्योगिक हब है.

इस बीच, जाटों की तरह से ही अन्य लोगों की भी शिकायत है कि सपा सरकार किस तरह से अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपाती है. एक छात्र राजकुमार का कहना है कि सभी छात्रवृत्तियां, लैपटॉप्स, साइकिल आदि मुस्लिमों को दी जा रही हैं. हमें तो एकतरफ कर दिया गया है. केवल मायावती ही हमारे हितों का ध्यान रखती हैं.

First published: 14 February 2017, 10:25 IST
 
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