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हानिकारक बापू मुलायम या अखिलेश खुद एक बड़ी असफलता?

अतुल चौरसिया | Updated on: 30 December 2016, 8:15 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • बीते तीन महीनों में समाजवादी पार्टी में मचे घमासान में अखिलेश यादव ने कई बार प्रतिक्रियावादी रुख अपनाया है. 
  • चाचा शिवपाल यादव और पिता मुलायम सिंह यादव के फैसलों के खिलाफ जाकर फैसले किए हैं, बाद में उन फैसलों से पलटे भी हैं. 
  • मगर अखिलेश यादव असल में उस खाली पड़े खेत के लिए एसर्ट कर रहे हैं जिसके दाने चिड़िया पहले ही चुग चुकी है.

अखिलेश यादव क्रिकेट के बड़े प्रशंसक हैं. खुद भी अच्छा क्रिकेट खेलते हैं तभी तो सरकार बनाम नौकरशाही के क्रिकेट मैच में वे हमेशा अव्वल साबित होते रहे हैं. मैन ऑफ द मैच से लेकर मैन ऑफ द सिरीज़ तक उन्हें मिल चुका है. अखिलेश यादव नए दौर की क्रिकेट खेलते हैं जहां रणनीति शुरुआती प्रतिबंधित ओवरों में ताबड़तोड़ बैटिंग कर ढेर सारे रन बटोरने की रहती है. जबकि पुराने दौर में वनडे क्रिकेट की रणनीति शुरुआत में विकेट बचाकर अंत में ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करने की होती थी.

लेकिन सियासत में अखिलेश नए दौर में पुराने दौर की रणनीति से खेलने की कोशिश कर रहे थे. लिहाजा मैच उनके हाथ से निकल चुका है क्योंकि जमाना बदल चुका है.

लगभग 5 साल पहले साल 2012 में जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तब बड़ी-बड़ी उम्मीदें उनसे जुड़ी थीं. लेकिन छह महीने बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो स्थितियां बनीं उनके साथ ही अखिलेश के रूप में पैदा हुई उम्मीदें भी टूटने लगी थीं.

प्रदेश के एक वरिष्ठ नौकरशाह जो फिलवक्त अखिलेश के बेहद खास माने जाते हैं उस वक्त उनकी गुडलिस्ट से बाहर चल रहे थे. सबसे पहले उन्हीं के मुख से साढ़े पांच मुख्यमंत्री का जुमला हमने सुना था. (मुलायम, शिवपाल, रामगोपाल, अनीता सिंह, साधना गुप्ता और आधे खुद अखिलेश)

बीते तीन महीनों के दौरान अखिलेश यादव ने कई बार प्रतिक्रियावादी रुख अपनाया है. चाचा शिवपाल यादव और पिता मुलायम सिंह यादव के फैसलों के खिलाफ जाकर फैसले किए हैं, बाद में उन फैसलों से पलटे भी हैं. कमोबेश अखिलेश यादव ने यह संदेश देने की कोशिश की है वो अपने लोगों के लिए लड़ रहे हैं, खुद को निर्णायक पोजीशन में लाने के लिए एसर्ट कर रहे हैं.

लेकिन अखिलेश यादव असल में उस खाली पड़े खेत के लिए एसर्ट कर रहे हैं जिसके दाने चिड़िया पहले ही चुग चुकी है.

अखिलेश के कार्यकाल का शुरुआती छह महीना बेहद अहम था. यह बात सबको पता थी कि वह चुनाव समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव के चेहरे पर जीता था. प्रदेश के गांव-गांव और शहर-शहर में उन्होंने साइकिल यात्रा कर एक माहौल बनाया था. जिसके नतीजे में उन्हें उत्तर प्रदेश की जनता ने निर्णायक जनादेश दिया था- 225 सीटें.

इसके बाद अखिलेश यादव लगातार चूकते रहे. चाहे वो एक अच्छा बेटा दिखने का दबाव रहा हो या फिर आज्ञाकारी भतीजा बनने की चाहत. प्रशासन से लेकर घरेलू मोर्चे तक हर जगह उन्होंने ऐसी चीजों को हावी होने का मौका दिया जिसके चलते हालात आज इस मुकाम तक पहुंचे हैं. अखिलेश यादव को जो दावा या दृढ़ता 2012 में सरकार बनने के शुरुआती छह महीनों में दिखानी थी वह दृढ़ता अखिलेश स्लॉग ओवरों में (आखिरी के छह महीनों) में दिखा रहे हैं.

शुरुआत में ही फिसल गई कमान

सत्ता संभालने के शुरुआती दौर में ही यह साफ हो गया था कि सत्ता संचालन की डोर पांच कथित मुख्यमंत्रियों के हाथ में हैं. प्रशासनिक मोर्चे पर देखें तो छह महीने के भीतर ही प्रदेश के अलहदा हिस्सों में छिटपुट और बड़े स्तर के लगभग 48 सांप्रदायिक टकराव हुए. यह बयान खुद सरकार ने प्रदेश की विधानसभा में एक सवाल के जवाब में दिया था.

महज तीन महीने के भीतर ही हजरतगंज बाजार में, जो कि विधानसभा के ठीक सामने स्थित है, बैंक कर्मचारी को गोली माकर 32 लाख रुपए लूटकर लुटेरे फरार हो गए. कानून व्यवस्था जो कि हमेशा से सपा के गले में फंसी हुई हड्डी साबित हुई है.

इसके अलावा नौकरशाही के मोर्चे पर एक अहम पद, प्रमुख सचिव अनीता सिंह को बना दिया गया. वो मुलायम सिंह की सचिव और खास अधिकारी मानी जाती हैं. मुलायम सिंह ने उन्हें प्रमुख सचिव बनवा दिया. पंचम तल पर अनीता सिंह की तूती बोलने लगी, मुलायम सिंह के वरदहस्त के चलते. कई बार इस बाबत खबरें आईं की मुख्यमंत्री का अपनी प्रमुख सचिव (अनीता सिंह) से बातचीत के रिश्ते भी नहीं है.

यह स्थिति शासन के हर मोर्चे पर रही. चुनाव अखिलेश यादव जीते लेकिन उनका मंत्रिमंडल बनाया मुलायम सिंह यादव ने. हर अहम पद पर मुलायम के पुराने लोग मंत्री बनाकर स्थापित कर दिए गए. चुनाव हार कर आए अंबिका चौधरी तक इसी सूची में हैं.

पार्टी संगठन में भी कमोबेश यही हालत रही. ज्यादातर पुराने लोग ही महत्वपूर्ण पदों पर बने रहे. ऐसा लगता है कि अखिलेश किसी चमत्कारलोक में बैठे हुए थे. लगभग पांच सालों तक वे मुख्यमंत्री के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश के मुखिया भी थे. लेकिन इस दौरान उन्होंने पार्टी संगठन में किसी बड़े बदलाव की पहल नहीं की.

उन्हें शायद यह अंध भरोसा था कि सिर्फ अध्यक्ष बने रहने से पार्टी और सरकार दोनों उनके काबू में रहेगी. ऐसा नहीं हुआ. अखिलेश के भीतर का सारा गुस्सा तब बाहर निकला जब मुलायम सिंह ने हाल ही में उन्हें हटाकर शिवपाल यादव को प्रदेश की कमान थमा दी.

अखिलेश के भीतर का गुस्सा तब बाहर निकला जब मुलायम ने हाल ही में उन्हें हटाकर शिवपाल को प्रदेश की कमान सौंप दी.

पांच साल तक न तो वो सरकार में अपने लोगों को कोई ओहदा दे पाए न ही पार्टी में. अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग का हाल और बुरा रहा. ज्यादातर फैसले खुद मुलायम सिंह, शिवपाल या फिर राम गोपाल करते रहे. अखिलेश देखते रहे. अटकलें हैं कि कई फैसले मुलायम सिंह की पत्नी साधना गुप्ता की पसंद-नापसंद से भी होते रहे. प्रदेश के राजस्व का सबसे बड़ा जरिया नोएडा-एनसीआर का इलाका है. यहां भी कहा जाता है कि रामगोपाल यादव के इशारे पर पत्ता डोलता है.

अखिलेश की स्थिति एक मुखौटे जैसी बनी रही. पार्टी के भीतर भी यह बात सबको पता है. अखिलेश यादव के समर्थक चार विधायक सरकार में तो मंत्री हैं लेकिन पार्टी से बाहर हैं. अखिलेश आज तक पार्टी में उनकी वापसी नहीं करवा पाए हैं.

अमर सिंह को लेकर अखिलेश जब-तब फब्तियां कसते रहते हैं, उनकी आलोचना करते रहते हैं इसके बावजूद हर बार अमर सिंह और मजबूत होकर पार्टी में स्थापित हुए हैं. लखनऊ में दबी जुबान मसखरी होती है कि एक बार फिर से अमर सिंह सपा के सबसे ताकतवर महासचिव बन चुके हैं. बस राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद उनके लिए शेष रह गया है.

यही बात परिवहन मंत्री गायत्री प्रजापति के बारे में भी कही जा सकती है. हाल ही में उन्हें मुलायम सिंह यादव ने राष्ट्रीय सचिव बनाया है. अब तक चार बार गायत्री प्रजापति मंत्रिमंडल में शपथ ले चुके हैं. यह अपने आप में एक मुख्यमंत्री की डांवाडोल हैसियत का सबूत है.

तो क्या सीटों के बंटवारा पार्टी का बंटवारा बन जाएगा?

अगर हम चीजों को उनकी निरंतरता में देखें तो यह मानने की कोई वजह नहीं है कि सिर्फ सीटों के बंटवारे को लेकर अखिलेश यादव सपा का बंटवारा करेंगे. इसे कुछ आंकड़ों से भी समझा जा सकता है.

अगर हम मुलायम सिंह द्वारा घोषित की गई 325 उम्मीदवारोंं की लिस्ट देखें तो ऐसे 47 मौजूदा विधायक और मंत्री हैं जिनके टिकट कट गए हैं. यह कुल घोषित उम्मीदवारों का करीब 14.5 फीसदी है.

अगर हम चुनाव दर चुनाव सियासी दलों के टिकट बंदवारे का विश्लेषण करें तो औसतन हर बार 20 फीसदी के आस-पास टिकट काटे-बदले जाते हैं. यह कई बातों पर निर्भर करता है, मौजूदा उम्मीदवार के खिलाफ एंटी इंकंबेंसी, विनेबिलिटी, युवाओं को मौका देना आदि.

अब अगर काटे गए टिकटों में अखिलेश यादव के हार्डकोर समर्थकों का हिसाब-किताब लगाया जाय तो ऐसे करीब 15 से 20 उम्मीदवार सामने आएंगे. एक और बात हर बार जिन लोगों के टिकट कटते हैं वे अपने समर्थकों और दल-बल के साथ हल्ला करते हैं. इस बार टिकट न पाने वाला हर उम्मीदवार खुद को अखिलेश समर्थक खेमें में दिखा रहा है क्योंकि वह ऐसा भारी-भरकम छाता हैं जिसके नीचे आने से सबको कुछ फायदा मिलने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है.

तो क्या ऐसे 15-20 हार्डकोर समर्थकों के लिए अखिलेश यादव पार्टी तोड़ेंगे? यह बड़ा सवाल है जिस पर बहुत जल्द स्थिति साफ हो जाएगी

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स्लॉग ओवर में ताबड़तोड़ बल्लेबाजी का कई बार उल्टा नतीजा यह भी होता है कि सारे विकेट भरभरा कर गिर जाते हैं और टीम हार जाती है.

First published: 30 December 2016, 8:15 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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