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लगातार तीसरी हार के बाद मायावती और बसपा के लिए क्या यह खेल खत्म है?

सादिक़ नक़वी | Updated on: 14 March 2017, 8:04 IST

उत्तर प्रदेश के विधानसभा परिणाम कई मायने में चौंकाने वाले रहे हैं. परिणामों में जहां भाजपा को भारी बहुमत मिला है वहीं बहुजन समाज पार्टी जो कि राज्य में एक बेहद अहम ताकत मानी जाती है, मानो खत्म सी हो गई है.

2007 में 207 सीटें और 2012 के विधानसभा चुनाव में 84 सीटें पाने वाली बसपा को इस विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटों से संतोष करना पड़ा है. जबकि वोट शेयर के मामले में बसपा को सपा से मामूली बढ़त (22 प्रतिशत) मिली है.

इस आंकड़े में संदर्भ में रखने के लिए हमें यह देखना होगा कि अपना दल जिसका मुख्य चेहरा अनुप्रिया पटेल हैं और जिसने सिर्फ भाजपा द्वारा दी गईं 11 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, उसने नौ सीटों पर विजय प्राप्त की है, जबकि भाजपा की एक और सहयोगी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को चार सीटों पर विजय मिली है.विधानसभा में इतनी कम संख्या के साथ तो मायावती के लिए राज्यसभा में अपनी सीट बचाये रखना भी मुश्किल होगा, जब उनका वर्तमान टर्म खत्म हो जाएगा. इसके बाद पार्टी का राज्यसभा में तो कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं रह जाएगा. आपको बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी थी.

असली संकट

चुनाव के परिणामों के बाद बसपा जो कि लगभग दो दशक से मायावती द्वारा पार्टी के प्रमुख चेहरे के रूप में कांशीराम को साइड लाइन करने के बाद एक महिला के बलबूते टिकी हुई थी, के सामने अब अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है. यह साफ है कि बसपा का कोर वोट माना जाना वाला दलित अगले चुनाव में पूरी तरह से भाजपा की ओर रुख कर सकता है.

2014 के चुनाव में पूरी तरह से सफाया हो जाने के बाद मायावती ने बसपा की संभावनाओं को बेहतर करने के लिए नये गठबंधनों का निर्माण करने की कोशिश की थी. जब मायावती ने देखा कि उसके कुछ जाटव, गैर-जाटव दलित और अति पिछड़े वर्ग के मतदाता भाजपा की ओर मुड़ रहे हैं तो उन्होंने कांशीराम का दलित-मुस्लिम गठबंधन का विचार फिर से आजमाया.

अल्पसंख्यक मतों का पीछा

इस विचार को अमलीजामा पहनाने के लिए पार्टी के कार्यकर्ता और उसके सहयोगी संगठन बैकवर्ड एंड माइनोरिटी कम्युनिटीज एम्पलॉयीज़ फेडरेशन (बामसेफ) ने भाईचारा सभाओं के माध्यम से जमीन तैयार करना शुरू किया था. मुस्लिमों को रिझाने के लिए पार्टी ने 100 से अधिक मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे. जबकि उनमें से मात्र छह ही चुनाव जीत सके हैं अथवा आगे बने हुए हैं. इससे मायावती के ड्रीम एलांयस के विचार को तगड़ा झटका लगा है.

मुस्लिमों को सपा-कांग्रेस गठबंधन से अपने पाले में लाने के लिए मायावती ने जिस तरह से आक्रामक प्रयास किए उससे कुछ स्थानीय राजनेताओं के अनुसार भाजपा को यह कहने का मौका मिल गया कि अब तो बसपा भी वही तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है. अभी तक यह आरोप सिर्फ मुलायम सिंह की सपा पर ही लगता रहा है.

इस छवि को हटाने के लिए ही अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह यादव स्टाइल की वह प्रचार शैली छोड़ दी जिसमें मुलायम खुले तौर पर मुस्लिम वोटरों को रिझाने का प्रयास करते थे.

अखिलेश का आइडिया यह था कि कांग्रेस के साथ गठबंधन ही अल्पसंख्यकों को यह संदेश देने के लिए काफी है. मुस्लिम प्रभुत्व वाली विस सीटों पर जिस तरह से वोटिंग हुई है उससे अखिलेश का यह आकलन गलत भी नहीं कहा जा सकता, लेकिन बसपा की सूची में मुस्लिमों की भारी संख्या ही भाजपा को इस संतुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ लोगों से अपील करने के लिए काफी था.

कैच को सपा के उम्मीदवार ने बताया कि चुनाव को ध्रुवीकरण की ओर ले जाने वाला यह पहला कदम था. बसपा के अधिकांश मुस्लिम उम्मीदवार संपन्न तबके से आए थे जबकि इनमें से कुछ का ट्रैक रिकॉर्ड भी बहुत खराब था जैसे कि याकूब कुरैशी और मुख्तार अंसारी. लेकिन एक मुस्लिम नेता की मानें तो अभी बसपा के दलित-मुस्लिम गठबंधन के विचार को खारिज नहीं किया जा सकता. अगर मुस्लिमों ने इतनी बड़ी संख्या में सपा को वोट किया है तो अंत में वे बसपा को भी वोट कर सकते हैं.

लेकिन अगर दलित-मुस्लिम गठबंधन का विचार कामयाब नहीं हुआ तो बहिनजी के लिए अपना दलित वोट बनाए रखना भी अगले चुनाव में कठिन हो सकता है. कोई आश्चर्य नहीं कि बहनजी के कई समर्थक खुलकर यह कह रहे थे कि वे लंबे समय तक सत्ता में बाहर रही मायावती को अब एक्शन में देखना चाहते हैं.

बड़े मॉर्जिन की जीत

एक एकेडमीशियन का यह सवाल प्रासंगिक है कि अगर बसपा के मतदाता यह महसूस करना शुरू कर दें कि भाजपा के शासनकाल में उनकी लाइफ में कोई खास अंतर नहीं आया है तो वे क्यों बसपा को वोट देंगे.

अब जबकि प्रदेश में भाजपा का शासन रहेगा तो अगले आम चुनाव तक वे भाजपा के भी दो साल का शासन देख चुके होंगे. भाजपा इस वोट के लिए लंबे समय से प्रयास कर रही है यह तो स्पष्ट ही है. मोदी जिस तरह से अपनी गरीब समर्थक छवि को निखारने पर काम कर रहे हैं और उनको जिस तरह से सभी जातियों के युवा वर्ग में उन्हें समर्थन मिल रहा है वह इसका गवाह है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि भाजपा नई राजनीति की ओर जाने का प्रयास कर रही है और इसमें पुराने सड़े-गले जाति, वंश और तुष्टिकरण के विचार के लिए कोई जगह नहीं होगी. मायावती के लिए यह चिंता की बात होना चाहिए.

एक राजनेता ने हमें बताया कि भाजपा ने जिस भारी बहुमत से जीत हासिल की है उसके बाद अब कम से यह तय हो गया है कि बसपा का कोई विधायक टूट कर नहीं जा पाएगा, क्योंकि अब किसी को उनकी जरूरत नहीं है. लेकिन अगर भाजपा को बहुमत से कुछ कम सीटें मिलती तो फिर बसपा को अपने विधायकों को साथ रखना चुनौती बन जाता.

लेकिन अब जबकि दो साल बाद ही चुनाव होने हैं तब यह देखना होगा कि इस दौरान बीएसपी कैसे अपने को बचा कर रखती है.

क्या उत्तर प्रदेश में बिहार की तरह महागठबंधन सफल हो सकता था. इस पर कोई एक राय जानकारों में नहीं है. इसमें सबसे पहले तो व्यावहारिक दिक्कत यह थी कि लंबे समय से सत्ता से बाहर मायावती को सपा की तुलना में अधिक घबराहट थी, जिसने अभी अपने पांच साल पूरे किए हैं. साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह गठबंधन कैसे काम करता क्योंकि फिलहाल यादव और दलित जमीनी स्तर पर काफी उठा-पठक वाले संबंध देख चुके हैं.

एसपी के एक अन्य नेता का कहना है कि यह इतना कठिन भी नहीं होता क्योंकि, जिन नेताओं ने यह बनावटी विभाजन पैदा किया है अगर वे ही साथ आ जाते तो वे यह भी सुनिश्चित कर सकते थे कि जमीन पर यह गठबंधन काम करे और टकराव से बचा जा सके. उनके अनुसार यह सबसे स्वभाविक गठबंधन होता क्योंकि इससे समाज के सबसे वंचित तबके एक साथ आ जाते.

मायावती का इतिहास बताता है कि वे गठबंधन के प्रति बहुत उत्साहित नही रही हैं. अतीत में भी वे पार्टी से बड़ी संख्या में लोगों के जाने के बाद भी फिर से पार्टी को खड़ी करने में सफल रही हैं, जैसा कि वे 1997 में कर चुकी हैं. इस बार के चुनाव में भी यह माना जाता है कि मायावती ने कांग्रेस के चुनाव पूर्व गठबंधन के संकेतों को खारिज कर दिया था और इसके बाद ही कांग्रेस ने सपा को गठबंधन के लिए एप्रोच किया.

क्या अब एक आक्रामक भाजपा को सामने देखते हुए मायावती गठबंधन के प्रस्ताव को स्वीकार करेंगी. कोई और विकल्प नहीं होने की स्थिति में मायावती ऐसा कर भी सकती हैं.

First published: 14 March 2017, 8:04 IST
 
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