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अखिलेश यादव: पहली लड़ाई में धराशायी

सादिक़ नक़वी | Updated on: 14 March 2017, 8:31 IST

भारतीय जनता पार्टी की शानदार जीत से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता सकते में हैं. झांसी में एक सपा कार्यकर्ता ने कैच न्यूज से कहा 'लुटिया डूब गई.’ चित्रकूट में एक और सपा कार्यकर्ता गया प्रसाद सविता ने कहा, ‘जब
अखिलेश यादव की रैली हुई थी तो यहां काफी लोगों की भीड़ जमा हुई थी. उन्होंने विकास के नाम पर भी वोट मांगे. लेकिन यहां सब मोदी की सूनामी में बह गए.’

सपा के एक सांसद ने कहा, ‘केवल यादवों और मुसलमानों ने ही हमें वोट दिया. बाकी सभी ने भाजपा को वोट दिया. झांसी में एक सपा कार्यकर्ता ने कहा यह चुनाव ‘हिन्दू-मुस्लिम चुनाव’ बन गया. यह चुनाव परिणाम भाजपा द्वारा राज्य में किए गए ध्रुवीकरण का नतीजा है. क्या आपको श्मशान-कब्रिस्तान वाला मोदी जी का बयान याद है?

हालांकि सविता इन चुनाव नतीजों को इतनी सरलता से नहीं देखती. उन्होंने कहा, ऐसी करारी हार तभी होती है, जब कई सारे घटक आपके खिलाफ काम कर रहे हों. वे इनमें से कुछ गिनाती भी हैं. ‘पिछले चुनाव में मिली भारी जीत के
बाद हम जनता का शुक्रिया करने और उससे मिलने तक नहीं गए. जनता से सम्पर्क बनाए रखने के लिए हमें बाहर जाना चाहिए था, कार्यक्रमों में शामिल होना चाहिए था.’

उन्होंने कहा, 'सबसे बड़ी बात यह कि हमारे नेता अखिलेश यादव जरूरत से ज्यादा ही आत्मविश्वासी हो गए थे. उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं अपने पिता और चाचा के सामने इस तरह से दुस्साहस नहीं दिखाना चाहिए था. शिवपाल यादव का उदाहरण लीजिए; वे इतने अधिक मतों के अंतर से जीते हैं. उनका अनुभव काम आ सकता था.’

सपा को उत्तर प्रदेश में पुनर्गठित किए जाने की जरूरत है. उसके बिना सपा का भविष्य मुश्किल में है

झांसी में एक अन्य सपा कार्यकर्ता ने कहा, अखिलेश को और अधिक सीटों पर उम्मीदवार बदल देने चाहिए थे. परन्तु चुनावों के समय इन सारी चीजों के लिए वक्त भी नहीं बचा था. अखिलेश तो एक दूसरा ही मुकाबला लड़ने में व्यस्त थे. वे अपने पिता से पार्टी की कमान लेने के लिए लड़ रहे थे. अखिलेश के एक सहयोगी ने कहा, जब चुनाव आयोग ने साइकिल चिन्ह हमारे नाम किया उसके बाद हमारे पास बहुत ही कम वक्त बचा थ कि हम सही उम्मीदवारों के चयन पर सोचते. ना ही हमें उन कार्यकर्ताओं से मतभेद सुलझाने का मौका मिला, जो पीछे छूट गए.

मुलायम सिंह के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘नेता जी के जमाने में टिकटों के बंटवारे की घोषणा काफी पहले समय रहते ही कर दी जाती थी.’ अखिलेश और उनकी टीम को पूरा यकीन था कि उनका पारिवारिक ड्रामा एंटी इंकम्बेंसी की सारी आशंकाओं को धो डालेगा. परन्तु इतिहास गवाह है कि उत्तर प्रदेश में सरकारें कभी दोहराई ही नहीं गई.

अखिलेश को इस बात पर भी गौर करना चाहिए था और यह स्वीकार कर लेना चाहिए था कि वे कोई नरेंद्र मोदी नहीं हैं, जो अपने करिश्माई व्यक्तित्व के बल पर वोट बटोरने में कामयाब रहें. बुंदेलखंड में मतदान से दो दिन पहले महोबा में एक सपा कार्यकर्ता ने कहा, ‘यहां तो भाजपा की हवा है. नेताओं को पता नहीं कि लोग पांच साल में सरकार बदल देते हैं. यहां भी बदल देंगे.’ यह कथन सही साबित हुआ और यूपी के अन्य भागों की ही तरह भाजपा ने देश के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक बुंदेलखंड में भी अन्य पार्टियों का सफाया कर दिया.

पार्टी के एक कार्यकर्ता ने बताया मतदान के दूसरे चरण के ठीक पहले रामपुर में आजम खान के घर पर बैठक में भी कुछ इसी तरह का विचार-विमर्श हुआ था. वहां यही चर्चा हुई थी कि पार्टी को कुछ इलाकों में एंटी इंकमबेंसी का सामना करना पड़ेगा. ऐन वक्त पर मचे पारिवारिक घमासान के चलते अखिलेश को कांग्रेस के साथ गठबंधन में उसे ज्यादा अहमियत देने पर मजबूर होना पड़ा, जबकि अखिलेश पूर्व में ऐसे किसी गठबंधन के इच्छुक नहीं थे.

अखिलेश के ही एक साथी ने कहा, ‘पार्टी को यह संदेश भी देना था कि वह चुनावी रणनीति अपना रही है. अगर पार्टी कोई गठबंधन नहीं करती तो लोग यह समझ सकते थे कि पारिवारिक कलह के कारण सपा लड़ने से पहले ही हार गई है.’ गठबंधन करके पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं को भी यह संदेश देने की कोशिश की कि उन्हें सपा-कांग्रेस गठबंधन का साथ देना चाहिए. मुसलमान शायद ऐसा ही करते भी लेकिन इस गठबंधन ने भाजपा को सपा पर निशाना साधने का एक और मौका दे दिया.

भाजपा ने सपा पर ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ का आरोप लगाया. दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने यूपी में एक भी मुसलमान उम्मीदवार नहीं उतारा. इससे उसका यह आरोप और खरा उतरा. सपा-कांग्रेस गठबंधन मुसलमानों और यादवों के वोट पाने की उम्मीद से बनाया गया था. इससे अति उत्साही अखिलेश ने आरएलडी के गठबंधन के प्रस्ताव भी ठुकरा दिया. उन्हें डर था कि इससे मुसलमानों के वोट बसपा को चले जाएंगे. कांग्रेस के एक नेता ने शिकायती लहजे में कहा, ‘अगर यह गठबंधन नहीं होता तो कांग्रेस कम से कम अपने कार्यकर्ताओं को अपनी ही पार्टी के लिए व्यस्त रखती.’

इसी तरह सपा कार्यकर्ताओं को भी लगता है कि पार्टी को इस गठबंधन की भारी कीमत चुकानी पड़ी. लेकिन पार्टी के नेताओं का कहना हैं कि यह गठबंधन का फैसला इतना भी गलत नहीं था. सपा के एक सांसद ने कहा, ‘गठबंधन को कैसे दोष दिया जा सकता है? कांग्रेस ने केवल 105 सीटों पर ही चुनाव लड़ा था. बाकी 298 सीटें भी तो हैं. वहां हमारा प्रदर्शन इतना खराब कैसे रहा? कम से कम हम कहीं तो अस्तित्व बचा पाए हैं. जरा बसपा को देखिए.’

अखिलेश और सपा

एक सपा कार्यकर्ता ने कहा, अब पार्टी को विपक्ष में बैठना है और इसे जनता के साथ दोबारा जुड़ने के लिए काफी काम करना होगा. ’इससे कम से कम नेता का अति आत्मविश्वास तो दूर होगा, जिन्हें पिछले 5 साल के शासन में कोई बड़ा विरोध नहीं झेलना पड़ा है.’

सपा के एक नेता ने कहा, 'नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा ने यूपी में अपने बड़े नेताओं को केवल जातीय नेता के तौर पर पेश किया. उदाहरण के लिए राजनाथ सिंह को प्रदेश में भाजपा ने केवल एक ठाकुर चेहरे के तौर पर पेश किया. इससे अखिलेश का कद अपने आप ऊंचा हो गया. अखिलेश का कद कम करने के लिए मोदी को ऐन मौके पर अंतिम तीन दिन में खुद आकर प्रचार करना पड़ा.'

उन्होंने कहा, ‘भाजपा पर अब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (ईबीसी) के साथ किए गए वादे पूरा करने का दबाव रहेगा. और अगली बार भाजपा के पास यह बहाना भी नहीं होगा कि वह सत्ता में नहीं थी. जिसका
फायदा भाजपा ने इस बार उठाया है.’

एक अन्य सपा नेता ने कहा, सपा को उत्तर प्रदेश में पुनर्गठित किए जाने की जरूरत है. उसके बिना सपा का भविष्य मुश्किल में है.

First published: 14 March 2017, 8:31 IST
 
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