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इंसेफलाइटिस: चुनाव के शोर में लुप्त हो गया पूर्वांचल का शोक, 2016 में 514 मौतें

अतुल चौरसिया | Updated on: 2 March 2017, 9:05 IST
कैच न्यूज़

गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज से पांच किलोमीटर आगे एक गांव है मानबेला. गांव देश के बाकी गांवों जैसा ही है, बस एक छोटा सा अंतर है. गांव के एक सिरे पर एक फर्टिलाइज़र फैक्ट्री है जिससे इसका गंवई चरित्र थोड़ा शहरी हो जाता है. जनवरी 2014 में इसी गांव में तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा में कुछ ऐसी बात कही थी जो आज तक उनके समर्थक और विरोधी दोहराते रहते हैं.

प्रधानमंत्री ने कहा था, 'उत्तर प्रदेश को गुजरात की तरह विकसित बनाने के लिए 56 इंच का सीना चाहिए.' प्रधानमंत्री ने उस जननसभा में कुछ और बातें भी कही थी लेकिन इस विवादित जुमले के फेर में उन बातों को भुला दिया गया. मोदी ने मानबेला की जनता के सामने कहा था कि अब एक भी बच्चे को असमय मरने नहीं दिया जाएगा. प्रधानमंत्री का इशारा इलाके में महामारी बन चुकी इंसेफलाइटिस बीमारी की तरफ था.

नरेंद्र मोदी आज देश के प्रधानंत्री बन चुके हैं. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव पांच साल का कार्यकाल पूरा कर दूसरे कार्यकाल की अर्जी जनता के सामने लगा रहे हैं. पर आज भी इंसेफलाइटिस से होने वाली मौतों और विकलांगता का सिलसिला बदस्तूर जारी है. साल 2016 का आंकड़ा बताता है कि इस साल बीते सालों की अपेक्षा मौतों की संख्या 15 फीसदी बढ़ोत्तरी के साथ 514 हो गई. कुल 1700 के लगभग मरीज भर्ती हुए थे.

यह आंकड़ा सिर्फ बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज का है. इंसेफलाइटिस पीड़ित कुल 7 जिलों के सरकारी जिला अस्पताल और 200 से ज्यादा प्राइवेट अस्पतालों की आंकड़ा इसमें शामिल नहीं है. इंसेफलाइटिस कितनी बड़ी समस्या इस इलाके में बन चुकी है, ये आंकड़ा उसकी एक बानगी है. पर यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है.

मानबेला विडंबनाओं की धरती बन चुकी है. गांव का लगभग हर दूसरा परिवार इंसेफलाइटिस का पीड़ित है. घरों में या तो किसी का बच्चा मरा है या फिर इसके कारण स्थायी विकलांगता से पीड़ित है. मानबेला की लालती देवी की 12 साल की बेटी मानसिक अपंगता की शिकार हो गई है. लालती हमसे अपनी बेबसी जाहिर करती हैं, 'लड़की बड़ी हो रही है. इसका इलाज बहुत भारी पड़ता है. लोग आते हैं, भरोसा देकर चले जाते हैं. आज तक एक पैसा हमको नहीं मिला है.' क्या आपको कोई मुआवजा मिला. इस सवाल के जवाब में लालती कहती हैं, 'कुछ नहीं मिला. हम अपने से ही सारा इलाज करवा रहे हैं.'

गांव में जितने घर उतनी त्रासद कहानियां हैं. 60 साल की जशोदा कहती हैं कि उनके घर में दो बच्चों की मौत हुई थी. एक का मुआवजा 50 हजार मिला जबकि दूसरी मौत के लिए कुछ नहीं मिला क्योंकि कागजात पूरे नहीं थे.

साल दर साल वही कहानी

साल दर साल गोरखपुर इलाके में यही कहानी दोहराई जा रही है. हर साल पांच-छह सौ बच्चे इस बीमारी की वजह से मारे जा रहे हैं. 1977 में पहली बार जापानी इंसेफलाइटिस ने गोरखपुर में दस्तक दी थी. शुरुआत में जापानी इंसेफलाइटिस का प्रकोप ज्यादा था. बाद में जलजनित इंसेफलाइटिस का असर इलाके में बढ़ा.

गोरखपुर में लंबे समय से इंसेफलाइटिस उन्मूलन के लिए अकेले दम प्रयास कर रहे डॉ. आरएन सिंह दिमागी बुखार के मामलों के जीते-जागते एनसाइलोपीडिया हैं. वो बताते हैं, 'जापानी इंसेफलाइटिस को काफी हद तक टीकाकरण करके नियंत्रित किया जा चुका है. इसके अलावा जापानी इंसेफलाइटिस का तीन से चार साल का साइकिल होता है लिहाजा यह तीन-चार साल में वापस आता है. इलाके में 94 फीसदी मरीज जलजनित इंसेफलाइटिस के पीड़ित हैं. इसका कोई इलाजा फिलहाल उपलब्ध नहीं है. जागरुकता, सावधानी और साफ-सफाई इसका अकेला उपाय है.'

इंसेफलाइटिस से जुड़ी सबसे खतरनाक बात यह है कि एक बार हो जाने के बाद यह मानव शरीर पर स्थायी असर छोड़ जाती है. मानसिक अपंगता, शारीरिक अपंगता आदि प्रमुख हैं. इसके अलावा इस बीमारी में मृत्युदर आज भी सबसे अधिक है. लगभग 25 से 30 फसदी मृत्युदर होने के बावजूद राजनीतिक हलकों में इस बीमारी को लेकर कोई चिंता या अलार्म की स्थिति नहीं है.

यह मूलत: एक वायरल बीमारी है. इसकी शुरुआत में बुखार, शरीर में अकड़न आदि होती है. ज्यादा गंभीर होने पर कोमा या फिर शरीर के किसी हिस्से को लकवा मार देता है. जलजनित इंसेफलाइटिस अक्सर रिहाइसी इलाकों के आसपास गंदगी, गंदे पानी का जमाव, धान के खेतों में पानी का जमाव, आदि के कारण होता है. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती आदि जिले गंभीर रूप से इसकी चपेट में हैं.

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में इंसेफलाइटिस का एक पूरा वार्ड बना दिया गया है. वार्ड नंबर 12 इंसेफलाइटिस के मरीजों से भरा हुआ है. छोटे बच्चे बेसुध हालत में बेड पर पड़े हैं और उनके परिजन बाहर गैलरी में जमीन पर बैठे या लेटे हुए किसी चमत्कार की उम्मीद में इंतजार कर रहे हैं. हालांकि यह मौसम इंसेफलाइटिस के लिहाज से ऑफ सीजन है फिर भी हर दिन मरीजों की आमद जारी है. जून-जुलाई के महीने में यह अपने चरम पर होता है.

मेडिकल कॉलेज के एक जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर से कैच ने बीमारी के बारे में बात करनी चाही तो छूटते ही वे फट पड़े, 'कोई हम लोगों के बारे में भी सोचेगा. नेता आते हैं दौरा करके, फरमान सुना कर चले जाते हैं. यहां बेड लगा दो, इतना क्षमता बढ़ा दो. डॉक्टर तो उतने ही हैं. नेताओं को बेड बढ़वाने में कमीशन मिलता है, वो बस उतना ही करते हैं. कोई यह नहीं समझता कि सीमित डॉक्टर, नर्स और स्टाफ इतनी भारी संख्या में आने वाले बीमारों को कैसे देखेंगे. ओवरटाइम कर-कर के डॉक्टरों का हौसला भी जवाब दे देता है.'

थोड़ा शांत होने के बाद वही डॉक्टर हमसे कहते हैं, 'कृपया मेरा नाम मत छापिएगा. बाकी जो मैंने बताया है वह किसी से छुपी हुई बात नहीं है. अगर मेडिकल कॉलेज इतना सक्षम होता तो हर साल इतने बड़े पैमाने पर यहां मौतें क्यों होतीं. अभी तो यह ऑफ सीज़न चल रहा है तब औसतन 12 से 15 मरीज रोजाना आते हैं. गर्मियां चढ़ने के साथ ही औसत मरीजों का आंकड़ा 60 तक पहुंच जाता है.'

आखिर इस इलाके में इंसेफलाइटिस इतनी बड़ी समस्या क्यों हैं? इस सवाल के जवाब मे वो डॉक्टर बताते हैं, 'गरीबी और अशिक्षा. इस इलाके में लोग ज्यादातर अनपढ़ हैं. उन्हें साफ-सफाई का महत्व भी ज्यादा समझ नहीं आता. लोगों की हैसियत ही नहीं है कि वे साफ-सफाई के बारे में ध्यान दे सकें. आप देखेंगे तो पाएंगे कि इस बीमारी के ज्यादातर शिकार दलित और पिछड़ी जातियों के लोग हैं जो अमूमन मलिन बस्तियों में रहते हैं.' बीमारी के इस जातीय सामाजिक विश्लेषण से हमें भी थोड़ा अचरज हुआ.

बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में इंसेफलाइटिस रोगी के साथ उसकी मां (कैच न्यूज़ )

चुनाव में दरकिनार इंसेफलाइटिस

लंबे समय से अकेले ही इंसेफलाइटिस उन्मूलन की लड़ाई लड़ रहे डॉ. आरएन सिंह राजनीति से निराश हो चुके हैं. हालांकि अपने दम पर लोगों को इस बीमारी से बचाने का उनका जीवट अभी भी बना हुआ है.

वे बताते हैं, 'सरकार ने यहां एम्स बनाने की घोषणा की है. यह स्वागत योग्य कदम है. पर मेरा कहना है कि यह बीमारी एम्स से खत्म नहीं होने वाली है. इस बीमारी से बचने के लिए लोगों को सक्षम बनाना होगा. उन्हें इसके लिए जरूरी सुविधाएं उनके, घरों, मुहल्लों में उपलब्ध करवानी होंगी. इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है लेकिन यह बीमारी होने ही न पाए इसका प्रबंध किया जा सकता है और यह बेहद आसान है. यही इसका इलाज है क्योंकि अगर एक बार बीमारी हो गई तो यह किसी न किसी रूप में अपना दुष्प्रभाव छोड़कर जाती है. फिर आपका एम्स किस काम का रहेगा. लेकिन न तो केंद्र सरकार इस दिशा में गंभीर है न ही राज्य की सरकार.'

लोगों तक यह बात पहुंचाने और इसे चुनावी मुद्दा बनाने के लिए डॉ आरएन सिंह ने इस बार एक जनता का घोषणा पत्र बनाया है. इसे उन्होंने गांव-गांव में मतदाताओं को बांटा है और उनसे कहा है कि जब भी कोई नेता आपके बीच वोट मांगने के लिए आए तो उसे आप यह अपना घोषणा पत्र दें. घोषणापत्र का मजमून छह बिंदुओं में है जो यह मांग करता है कि जीतने पर वे नेता गांव में साफ पीने का पानी की व्यवस्था करेंगे, गंदे पानी के सुरक्षित निपटारे का प्रावधान करेंगे आदि.

सिर्फ पिछले साल ही गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में 514 नौनिहालों की मौत हुई है. इसके बावजूद एक सच यह है कि किसी भी दल ने अपने घोषणा पत्र या संकल्प पत्र मेें इस महामारी को लेकर एक लाइन खर्च नहीं किया है. यह भी एक कड़वा सच है कि जहां हर साल मेडिकल सुविधाओं के अभाव में इतने बड़े पैमाने पर मौते हो रही हैं वहां के जनप्रतिनिधि योगी आदित्यनाथ अपने हर भाषण में श्मशान-कब्रिस्तान का जिक्र करना नहीं भूलते, वे बार-बार याद दिलाते हैं कि उन्होंने शहर के उर्दू बाज़ार का नाम हिंदी बाज़ार कर दिया. अली बाजार का नाम आर्य नगर कर दिया.

जब जनप्रतिनिधि की प्राथमिकताएं इतनी भटकी हुई हों तब कोई आश्चर्य नहीं की मानबेला की 60 वर्षीय जशोदा देवी अपनी 13 साल की बेटी की मौत को किस्मत का लेखा मानकर चुप्पी साध लेती हैं. वे कहती हैं, 'हम लोगों की कौन सुनेगा. इसी घास-फूस के घर में रहते हैं. बेटी मर गई कोई पूछने तक नहीं आया. हम किसी से क्या मांगेंगे. नेता तो हमेशा आते हैं.'

First published: 2 March 2017, 7:49 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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