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माफ़िया से 'माननीय' बने मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह के ख़ूनी गैंगवार की दास्तां

सुधाकर सिंह | Updated on: 27 January 2017, 13:05 IST
(फाइल फोटो)

अरे हुजूर माफ़िया नहीं माननीय बोलिए. पिछले साल विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) का चुनाव निर्दलीय जीतने वाले बृजेश सिंह से जब एक पत्रकार ने उनके आपराधिक अतीत का हवाला देते हुए इंटरव्यू शुरू किया, तो कुछ इसी अंदाज़ में बृजेश सिंह ने जवाब दिया था.

मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह. जरायम (अपराध) की दुनिया के दो ऐसे नाम जिनके ख़ूनी जंग की चर्चा आज भी पूर्वांचल के गांव-कस्बों और गली-मुहल्लों में अक्सर सुनने को मिलती रहती है. हालांकि दोनों बड़े ही शातिराना तरीके से ख़ुद को पाक साफ़ कहने से नहीं चूकते हैं. 

मुख्तार अंसारी अपनी हिस्ट्रीशीट को साजिशों का पुलिंदा बताते हैं. हालांकि पूर्वांचल को जानने वाले ज़्यादातर लोग वाकिफ़ हैं कि मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह ऐसे नाम हैं, जिनकी मर्जी के बगैर पूर्वांचल के छोटे-मोटे ठेके से लेकर रेलवे के करोड़ों के वारे-न्यारे करने वाले ठेके में हाथ डालने की हिम्मत शायद ही किसी की होती है. 

2012 के विधानसभा चुनाव में बृजेश सिंह जेल से ही भारतीय समाज पार्टी से सैयदराजा सीट (चंदौली) से उतरे, लेकिन चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा. हालांकि पिछले साल एमएलसी चुनाव में बृजेश ने रिकॉर्ड वोटों से जीत हासिल की. वहीं मुख्तार 1996 से लगातार मऊ सीट से जीतते चले आ रहे हैं.

माफिया से माननीय बने दोनों ही नेता फिलहाल जेल में बंद हैं. एक विधानसभा का सदस्य है, तो दूसरा विधान परिषद का. यानी सूबे में लोकतंत्र की सबसे बड़ी इमारत की ये दो शख्स शोभा बढ़ा रहे हैं. आख़िर पूर्वांचल की खूनी गैंगवार में दोनों का आमना-सामना होने की पृष्ठभूमि क्या है, यह जानना भी जरूरी है.

फाइल फोटो

पिता की हत्या ने बृजेश को बदले की आग में झोंका

बृजेश सिंह उर्फ अरुण कुमार सिंह का जन्म वाराणसी में हुआ था. बृजेश के पिता रविन्द्र सिंह की गिनती इलाके के रसूखदार लोगों में थी. राजनीतिक रुतबा भी कम न था. बृजेश ने बनारस के यूपी कॉलेज से बीएससी की पढाई की. पढ़ाई में होनहार छात्रों में बृजेश की गिनती थी.

इसी दौरान एक ऐसा मोड़ आया, जिसके बाद बृजेश ने अपराध के ऐसे रास्ते पर कदम रखा, जिसका आगाज और अंजाम दोनों मौत है. 27 अगस्त 1984 को बनारस के धौरहरा गांव में बृजेश के पिता रविन्द्र सिंह की हत्या कर दी गई. 

सियासी विरोधी हरिहर सिंह और पांचू सिंह का इसमें नाम सामने आया.सियासी वर्चस्व की जंग में पिता की हत्या ने बृजेश सिंह को पूर्वांचल की खूनी गैंगवार में उतार दिया.

27 मई 1985 को बृजेश ने अपने पिता रविंद्र सिंह के कथित हत्यारे हरिहर सिंह की दिन-दहाड़े हत्या कर दी. इसके साथ ही बृजेश की हिस्ट्रीशीट खुल गई.

हरिहर के मर्डर के बाद पिता के बाकी हत्यारों को मारने के लिए बृजेश ने एक साल और इंतजार किया. 9 अप्रैल 1986 को बनारस के सिकरौरा गांव में बृजेश ने पिता की हत्या में कथित तौर पर शामिल रहे पांच लोगों को गोलियों से भून दिया. वारदात के बाद पहली बार बृजेश की गिरफ्तारी हुई.

पत्रिका

कोयले की ठेकेदारी में मुख्तार-बृजेश गैंगवार

हत्या के इल्जाम में बंद बृजेश की जेल में मुलाकात गाजीपुर के मुडियार गांव के त्रिभुवन सिंह से हुई. यहीं से बृजेश और त्रिभुवन के बीच दोस्ती हुई. जल्द ही दोनों के गैंग ने पूर्वांचल में अपनी धाक जमा ली. शराब से लेकर कोयले की ठेकेदारी में दोनों ने अपना वर्चस्व कायम करना शुरू कर दिया.

कोयले के ठेके में ही पहली बार पूर्वांचल के दूसरे बड़े माफिया डॉन मुख्तार अंसारी से बृजेश का आमना-सामना हुआ और आगे चलकर मुख्तार और बृजेश की रंजिश एक बड़े खूनी गैंगवार में तब्दील हो गई. 

बृजेश के साथी त्रिभुवन सिंह का भाई हेड कांस्टेबल राजेंद्र सिंह बनारस पुलिस लाइन में तैनात था. अक्टूबर 1988 में साधू सिंह ने राजेंद्र की हत्या कर दी. कैंट थाने में साधू सिंह के अलावा मुख़्तार अंसारी और गाजीपुर निवासी भीम सिंह को भी नामजद आरोपी बनाया गया.

इस हत्या का बदला लेने के लिए बृजेश और त्रिभुवन ने पुलिस वाला बनकर गाजीपुर के एक अस्पताल में इलाज करा रहे साधू सिंह को फिल्मी अंदाज में गोलियों से भून डाला. इस हत्याकांड की धमक पूरे सूबे में सुनाई दी. इसी दौर में बृजेश सिंह ने मुंबई के जेजे अस्पताल में घुसकर अरुण गवली गिरोह के शार्प शूटर हलधंकर समेत चार पुलिस वालों की कथित रूप से सनसनीखेज हत्या कर दी.

सपा सरकार में बढ़ी मुख्तार की ताकत

इस बीच मुख्तार ने भी धीरे-धीरे अपना राजनीतिक रसूख बना लिया था. रेलवे की ठेकेदारी और कोयले के कारोबार में दोनों गैंग के दर्जनों लोग मारे गए. हालांकि मुख्तार ने सियासत में दखल देकर अपनी राजनीतिक पहुंच और असर बना लिया. समाजवादी सरकार में मुख्तार की ताकत बढ़ती गई. इस वजह से बृजेश का गैंग मुख्तार के सामने कमजोर पड़ने लगा. 

बृजेश का काला कारोबार संभालने वाले लोग मुख्तार गैंग के साथ ही पुलिस के निशाने पर भी आ गए. बृजेश सिंह का दाहिना हाथ कहे जाने वाले अजय खलनायक पर भी जानलेवा हमला हुआ. इसमें भी मुख्तार अंसारी का नाम सामने आया. 

मुख्तार के मजबूत होने से बृजेश को अंडरग्राउंड होना पड़ा. हालांकि उसने अपने काले कारोबार को बंगाल, मुंबई, बिहार और उड़ीसा तक फैला दिया था. इसी दौर में बृजेश के साथी त्रिभुवन सिंह के पिता की हत्या के आरोपी मकनू सिंह और साधू सिंह का गैंग तेजी से उभर रहा था.

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कृष्णानंद राय की हत्या

बृजेश के साधू की हत्या करने के बाद गैंग की कमान सीधे मुख्तार अंसारी के पास आ गई. इस बीच बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की बृजेश गैंग से करीबी बढ़ने लगी. इसी दौरान मुख्तार पर लखनऊ से लौटते वक्त उसरी चट्टी के पास जानलेवा हमला हुआ. मुख्तार के कुछ साथी तो मारे गए, लेकिन मुख्तार बाल-बाल बच गए. 

पूर्वांचल के अपराध जगत पर नजर रखने वाले लोगों की मानें तो इस हमले में सीधे बृजेश सिंह ने एके-47 से गोलियां चलाई थीं. बताया जाता है कि अंधाधुंध फायरिंग में बृजेश को भी गोली लगी, हालांकि वह फरार होने में कामयाब रहा.

इस वारदात के बाद मुख्तार ने किसी तरह कृष्णानंद राय को रास्ते से हटाने की ठान ली. 29 नवंबर 2005 को कृष्णानंद राय के काफिले पर अंधाधुंध फायरिंग हुई. हमलावरों ने करीब 250 गोलियां चलाईं. कहा जाता है कि मुख्तार के कहने पर इस हमले को पूर्वांचल के बड़े अपराधी प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी और संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा ने अंजाम दिया था. हमले में कृष्णानंद राय मारे गए. 

सनसनीखेज हत्या के बाद मुख्तार अंसारी को गिरफ्तार किया गया. हालांकि जेल से ही मुख्तार का गैंग और कारोबार बेधड़क चलता रहा. इसी बीच 2008 में बृजेश सिंह को ओडिशा के भुवनेश्वर से गिरफ्तार कर लिया गया. 

जुलाई 2013 में हुई गैंगवार में बृजेश सिंह के चचेरे भाई सतीश सिंह की हत्या से पूरा पूर्वांचल एक बार फिर दहल उठा था. बृजेश का भाई सतीश वाराणसी के चौबेपुर में जब एक दुकान पर चाय पी रहा था, तभी बाइक सवार चार लोगों ने अंधाधुंध फायरिंग कर सतीश को मौत के घाट उतार दिया.

बाएं से सपा विधायक अभय सिंह के साथ विधायक मुख्तार अंसारी.

दोनों गैंग में गुप्त समझौता!

इस हत्या के बाद कयास लगाए जाने लगे कि पूर्वांचल के दोनों बड़े गिरोह में फिर गैंगवार छिड़ सकती है. हालांकि पूर्वांचल के अपराध की दुनिया को करीब से जानने वाले कहते हैं कि मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह गैंग में गुप्त समझौता हो चुका है.

इस बात को सितंबर 2015 में हवा मिली, जब भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के मुकदमे में चश्मदीद गवाह रामकृत सिंह अपने पुराने बयान से पलट गए. ऐसा मुख्तार के खौफ से किया गया या अपने व्यावसायिक हित में यह बात चर्चा का विषय रही.

रामकृत सिंह मुख्तार के जानी दुश्मन बृजेश सिंह के बेहद करीबी हैं. करोड़ों का कारोबार है. ऐसे में साफ है कि उन पर मुख्तार सहित कृष्णानंद राय हत्याकांड के बाकी मुल्जिम मुन्ना बजरंगी जैसों का कोई खौफ नहीं होगा. 

माना जा रहा है कि सीबीआई कोर्ट में बयान देने से पहले बृजेश सिंह से हरी झंडी मिलने के बाद रामकृत सिंह ने ऐसा किया. हालांकि अपराध जगत के कुछ लोग इस बात को खारिज करते हैं. दलील यह दी जा रही है कि दोनों माफिया डॉन का ध्यान खून-खराबे की जगह काले कारोबार पर लगा है. 

दोनों एक-दूसरे के इलाके में टांग नहीं अड़ा रहे हैं. मुकदमों से बरी होने की भी ख्वाहिश है. बृजेश कई मुकदमों में बरी हो चुके हैं. लेकिन असल मामला उसरी चट्टी और लखनऊ में मुख्तार पर हमले का है. जाहिर है कि उनमें गवाही टूटने की गुंजाइश नहीं है. वहीं मुख्तार के जेल से बाहर निकलने में बड़ा रोड़ा कृष्णानंद राय हत्याकांड का मुकदमा ही रह गया है.

First published: 27 January 2017, 13:05 IST
 
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