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महाराजगंज: खेती की एक मशीन जिसने पलायन और बेरोजगारी को महामारी बना दिया

अतुल चौरसिया | Updated on: 1 March 2017, 14:53 IST

गोरखपुर के शहर के हृदयस्थल गोलघर से मेडिकल कॉलेज को जाने वाली सड़क पर एक जगह का नाम है बशारतपुर. यहां हफ्ते के हर कामकाजी दिन एक भवन के सामने युवाओं की भीड़ लगती है. बीते सोमवार का दिन भी अलग नहीं था. यह गोरखपुर में कुछ महीने पहले खुला विदेश मंत्रालय का पासपोर्ट सेवा केंद्र है. 20 से 30 साल के युवाओं की भीड़ यहां आम बात है.

इसी भीड़ में मौजूद रामसुभग से हमारी बात हुई. वे कुशीनगर के किसी गांव से यहां पासपोर्ट के लिए आवेदन करने आए थे. पासपोर्ट क्यों? इस सवाल के जवाब में ग्रैजुएशन कर चुके सुभग बताते हैं, 'यहां कामकाज नहीं है. मजदूरी का काम भी आसानी से नहीं मिलता. हमारे गांव के कई लोग सउदी और मलेशिया गए हैं. उन्हीं लोगों ने वहां कुछ काम खोजा है. बाहर जाकर नौकरी करेंगे तभी तो यहां घर चलेगा.'

गोरखपुर में पासपोर्ट सेवा केंद्र के बाहर जमा लोग (कैच न्यूज़ )

पूर्वांचल के पिछड़े जिलों की यह एक त्रासद तस्वीर है. कुशीनगर, पडरौना, सिद्धार्थनगर, मऊ, गोरखपुर और आजमगढ़ के ग्रामीण अंचलों में बड़े पैमाने पर युवाओं के पलायन की समस्या है. रोजगार के नाम पर यहां सिर्फ खेतों की मजदूरी थी. खेतिहर मजदूरों की एक बड़ी आबादी लंबे समय से इसी पर निर्भर रही लेकिन अब इस इलाके में खेतों में मजदूरी भी नहीं मिलती.

महाराजगंज जिले में कुछ साल पहले स्थापित हुई एक कंपनी मां वैष्णो एग्रो लिमिटे़ड ने आस-पास के चार पांच जिलों में खेतिहर मजदूरों के लिए पलायन के सिवा कोई विकल्प नहीं छोड़ा है. यह औद्योगिक स्तर पर काम करने वाली हार्वेस्टर मशीन है. यह मशीन बहुत कम समय में कटाई-दंवाई का काम निपटा देती है.

इसके अलावा यह एक साथ कई लोगों के बराबर काम करती है. पंजाब-हरियाणा में इस तरह की मशीनें आम तौर पर देखने को मिलती थी. अब यह मशीन महाराजगंज में ही बनने लगी है. इसके चलते खेतिहर मजदूरों के सामने आजीविका का संकट आन पड़ा है. इसके नतीजे में बड़े पैमाने पर इस इलाके से पलायन हो रहा है.

वैष्णो एग्रो के मालिक राजेश मधेशिया पलायन के लिए अपनी हार्वेस्ट कंपनी को जिम्मेदार नहीं मानते हैं. उनका कहना है, 'पूरे पूर्वांचल में औद्योगीकरण हुआ ही नहीं है. पलायन इस इलाके की बहुत पुरानी समस्या है. हमारी कंपनी आने के बाद से लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिला है. लोग औद्योगिक स्तर पर खेती करने लगे हैं. केला की खेती होने लगी है. लोग इसे बाहर भी भेजते हैं.'

यह पूछने पर कि आपके यहां कितने लोग काम करते हैं? राजेश कहते हैं कुछ समय पहले तक 150 से ज्यादा लोग काम करते थे लेकिन फिलहाल घटकर 20 कर्मचारी रह गए हैं. इस गिरावट की वजह बड़ी दिलचस्प है. जब हम इसकी तह में घुसते हैं तो राजेश की बड़ी दुविधा उभर कर सामने आ जाती है. वो भाजपा के महाराजगंज इकाई के नेता भी हैं. इन चुनावों में वो टिकट के दावेदार थे पर अंत समय में पार्टी ने किसी और को टिकट दे दिया. वो कहते हैं नोटबंदी के कारण आई मंदी के चलते हमारा धंधा कमजोर हो गया है. इसीलिए कर्मचारियों की संख्या घटानी पड़ी है.

राजेश मधेशिया खुद नोटबंदी के शिकार हैं. वो कहते हैं पहले हर साल हम 20 से 25 औद्योगीक स्तर के हार्वेस्टर का उत्पादन और बिक्री करते थे लेकिन नोटबंदी के बाद से यह तेजी से गिर गया है. ताजा बिक्री के आंकड़े वे नहीं बता सके. क्या नोटबंदी मोदी सरकार का एक गलत फैसला था? इस सवाल के आड़े उनकी पार्टीगत मजबूरियां आ गई. वो कहते हैं, 'विश्व स्तर पर नोटबंदी जैसी नीति किसी सरकार ने नहीं बनाई है. हम मोदीजी के इस फैसले से पूरी तरह सहमत हैं.'

जो विदेश जा सकते हैं वो विदेश जा रहे हैं, जिनकी उम्र ज्यादा हो चुकी है या खेतिहर मजदूर महिलाएं हैं वे समूह में मौसमी विस्थापन झेलती हैं. मसलन यह पूरा इलाका बिहार और नेपाल की सीमा से लगा हुआ है. जिन इलाकों में अभी तक हार्वेस्टर मशीनें नहीं पहुंची हैं उन इलाकों में खेती के मौसम में इस इलाके की मजदूर महिलाएं और बुजुर्ग झुंड बनाकर प्रवास करते हैं. खेती का मौसम खत्म हो जाने के बाद ये वापस अपने घरों में लौट आते हैं. नेपाल के तराई वाले इलाकों में और बिहार के सीमाई जिलों में अभी भी पड़े पैमाने पर खेती मानवीय संसाधनों पर ही निर्भर है.

महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया आदि में हार्वेस्टर मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल ने छोटी जोत वाले किसानों को भी एक नया जरिया दे दिया है. दो-चार गांवों के दस-पांच सीमांत किसान (छोटे किसान) मिलकर एक साथ अपनी कटाई-दंवाई का काम किसी हार्वेस्टर मशीन के मालिक को दे देते हैं. वो एक साथ इन सबके काम एक दो दिन में ही निपटा देता है. 800 से 1000 रुपए प्रति एकड़ का रेट चल रहा है. अगले एक दो महीनों बाद रबी की कटाई के सीजन में इन मशीनों का फिर से बोलबाला रहेगा.

पलायन के साइड इफेक्ट

कुछ महीने पहले महाराजगंज जिले के रामनगर के रहने वाले राकेश चौधरी नाम के एक युवक का वीडियो तेजी से वायरल हुआ था. सउदी अरब कमाने गए राकेश चौधरी ने 40 महीने से खुद को सउदी में फंसे होने की बात सोशल मीडिया में बताई. वीडियों में राकेश कहता है- 'मैं सउदी अरब से बोल रहा हूं. मुझे यहां आए 40 महीना हो गया है. मुझे 6 महीने से वेतन नहीं मिल रहा है. मैं यहां बुरी तरह फंस गया हूं. इंडिया के भाई बंधुओं से निवेदन है कि मुझे किसी तरह यहां से निकालिए. मुझे मेरे वतन बुला लो.'

लोगों में विदेश जाने की होड़ लगी है लिहाजा दलाल और असमाजिक लोग भी इस दिशा में सक्रिय हो गए हैं. आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर विदेश भेजने का धंधा भी इलाके में पैर पसार चुका है. राकेश उसकी एक मिसाल है. उसे सउदी अरब के होम क्रियेटिव ग्रुप में बतौर मिस्त्री अनुबंधित किया गया था. जाने के पहले बाकायदा एग्रीमेंट हुआ था जिसमें सेवा की शर्तें निर्धारित थीं लेकिन वहां उसे कुशल कामगार होने के बावजूद दिहाड़ी मजदूर के बतौर काम कराया जाने लगा और निर्धारित वेतन भी नहीं मिला.

पलायन और बेरोजगारी की इस कहानी पर चुनाव के इस दौर में भी नेता कान नहीं धर रहे. डॉ. संजय निषाद इस मसले पर इतना जरूर कहते हैं, 'अगर मैं जीता तो यह सुनिश्चित करवाऊंगा कि मजदूरों को सबसे पहले मनरेगा के तहत काम मिले. ताकि उन्हें बाहर न जाना पड़े.' कुशल और पढ़े-लिखे युवाओं को रोकने की कोई योजना या राजनीति सोच फिलहाल किसी दल की न तो प्राथमिकता में है न उनके लिए यह कोई मुद्दा है.

First published: 1 March 2017, 7:34 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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