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मुसलमानों को रिझाने के लिए बसपा का नया औज़ार, वट्सएप ग्रुप्स

सादिक़ नक़वी | Updated on: 2 March 2017, 19:11 IST

मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट पाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है. दरअसल मायावती समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को मिलने वाले मुसलमानों के मतों का ध्रुवीकरण करना चाहती है जो कि बाबरी
मस्जिद विध्वंस के बाद पारम्परिक तौर पर इन दोनों पार्टियों को ही वोट देते आए हैं.

इन चुनावों में 100 से अधिक मुस्लिम उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होना है. इनमें मऊ के अंसारी बंधु भी शामिल हैं. मायावती की बसपा मुसलमान वोटरों को रिझाने की वो ही तमाम कोशिशें कर रही है जो पिछले चुनावों में सपा के मुलायम सिंह और उनके साथियों ने की थी.

हाल ही गोंडा में आयोजित एक रैली में मायावती ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के धर्म के नाम पर वोट न मांगने के आदेशों को दरकिनार करते हुए मुसलमानों से कहा, ‘अगर आप समाजवादी पार्टी को वोट करेंगे तो न केवल आपका वोट बेकार जाएगा बल्कि इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा. इसलिए आप लोगों को बसपा को वोट करना चाहिए न कि सपा को.’

सच्चाई का सामना

विश्लेषकों का कहना है कि मायावती इस आशंका से ये सब बातें कर रही हैं कि कहीं सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने उनका दलित-मुस्लिम फॉर्मूला कहीं फेल न हो जाए. साल भर पहले तक मायावती की बसपा को उत्तर प्रदेश में सपा सरकार का मजबूत विकल्प माना जा रहा था. लेकिन भाजपा और उसके मोदी मैजिक के चलने की आशंका के बीच बने सपा-कांग्रेस गठबंधन ने मायावती के इरादों पर पानी फेर दिया.

अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के साथ गठबंधन करने के अलावा मुसलमानों को रिझाने का कोई प्रयास नहीं किया. उन्होंने बस एक बार यह कहा कि भाजपा वोटों को बांटने की राजनीति कर रही है. गठबंधन की राजनीति हो सकता है अल्पसंख्यक वोट हासिल करने में कामयाब रहे.

भाजपा के नए जोश और सपा-कांग्रेस गठबंधन ने मायावती की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है

लगता है सपा कांग्रेस की रणनीति काम कर गई. दोनों पार्टियों के इस गठबंधन से माया का दलित-मुस्लिम कार्ड विफल हो गया है. यूपी में सर्वे और पिछले चनावों के विश्लेषणों से साफ जाहिर है कि बसपा कभी मुलमानों की पहली पसंद नहीं थी. मुख्यमंत्री अखिलेश और सपा कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि मायावती कभी भी भाजपा के साथ हाथ मिला सकती है.

माया को सार्वजनिक मंचों पर ‘बुआ जी’ संबोधित करते आए अखिलेश ने कहा बुआ जी कभी भी भाजपा को राखी बांध सकती हैं. अगर लखनऊ में त्रिशंकु विधानसभा के हालात बनते हैं तो कोई अचरज नहीं माया एक बार फिर भाजपा से हाथ मिला ले. कैच ने कई अन्य पार्टियों से इस संबंध में बात की तो वे भी यही आशंका जताती नजर आई.

बसपा सोशल मीडिया पर

खैर इन सब आशंकाओं से परे, मायावती फिलहाल मुस्लिम वोटरों को रिझाने का कोई मौका छोड़ती नजर नहीं आ रहीं. इसके लिए वे अलग-अलग मीडिया का इस्तेमाल कर रही हैं, जैसे यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्एप और एक नई वेबसाइट नेशनल दस्तक आदि. इस वेबसाइट का उद्देश्य ‘बहुजन’ के लिए आवाज उठाना है क्योंकि बसपा का मानना है पारम्परिक मीडिया ‘ब्राह्मणवादी ताकतों’ के नियंत्रण में है.

नेशनल दस्तक नाम की यह वेबसाइट एक तरह से बसपा का मुखपत्र कहा जा सकता है. इसके यूट्यूब चैनल पर ऐसे बहुत से वीडियो अपलोड किए गए हैं जिनमें दिखाया गया है कि मुसलमान कैसे बसपा का साथ दे रहे हैं. इसमे एक ओपिनियन पोल का वीडियो भी शामिल है, जिसमें दिखाया गया है कि इस समुदाय ने कैसे वोट दिया, जबकि ऐसी सामग्री दिखाने पर चुनाव आयोग की ओर से प्रतिबंध है.

मायावती के समर्थक बहन जी की ‘भाजपा समर्थक छवि’ को तोड़ने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं. असल में सपा और भाजपा दोनों ने मायावती की 2006 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का एक वीडियो जारी कर दिखाया है कि किस तरह एक कट्टर मुस्लिम उममीदवार को जिताने के लिए मायावती ने भाजपा को दलित वोट दान कर दिए. इस वीडियो ने बसपा की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है. इससे उबरने के लिए पार्टी व्हाट्सएप पर मैसेज चला रही है.

सपा और भाजपा के दावों का जवाब देने के लिए बसपा ने यूट्यूब, व्हाट्सएप और फेसबुक का सहारा लिया है.

सोशल मीडिया पर जारी किए गए अपने ऐसे ही एक संदेश में बसपा ने राजनीतिक विश्लेषक क्रिस्टोफ जैफरलोट के उस वक्तव्य का उल्लेख किया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि मायावती ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार जरूर बनाई थी लेकिन उसका अजेंडा लागू नहीं होने दिया था. उन्होंने कहा, बल्कि मायावती ने भाजपा को राज्य में कमजोर कर दिया था और उसे तीसरे स्थान पर धकेल दिया था. बस, मायावती ने भाजपा का इस्तेमाल किया था.

व्हाट्सएप पर ही एक और संदेश में बसपा ने बताया कि किस तरह सपा सरकार ने मुसलमानों पर अत्याचार किया. दरअसल व्हाट्सएप सोशल मीडिया का ऐसा प्लेटफॉर्म है, जिस पर लोग बिना किसी प्रमाण और तथ्यों की जांच के कुछ भी अपलोड कर देते हैं. व्हाट्सएप पर ही चल रहे कुछ संदेश ऐसे हैं, जिनमें कहा गया है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद कैसे सैकड़ों बच्चे तम्बुओं में मारे गए.

कैसे सपा सरकार मूक दर्शक बनी सब कुछ देखती रही और कैसे सपा सरकार ने अखलाक की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को 25 लाख रूपए का मुआवजा दिया. साथ ही सोशल मीडिया पर एक संदेश ऐसा भी चल रहा है जिसमें मुलायम सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी को एक शादी समारोह में आमंत्रित किया है, जहां पूरा परिवार मोदी के साथ सेल्फी लेते हुए दिखाई दे रहा है.

एक संदेश ‘भारतीय इतिहास में अद्भुत घटनाएं’ नाम से भी चल रहा है, जिसमें दलित-मुस्लिम भाईचारे के किस्से सुनाए गए हैं. उदाहरण के तौर पर इनमें दिखाया गया है कि कैसे एक मुस्लिम व्यक्ति उस्मान शेख ने स्कूल खोलने के लिए ज्योतिबा फूले को जमीन दी थी और शेख की बहन व सावित्रि फुले एक ही स्कूल में पढ़ाती थीं.

ऐसे ही एक संदेश में बताया गया है कि बाबा साहेब अम्बेडकर एक बार रमजान के दिनों में मौलाना हजरत मोहानी की रोजा इफ्तार पार्टी में गए थे जबकि इसी पार्टी में बुलाया तो मदन मोहन मालवीय जी को भी गया था लेकिन उन्होंने वहां के एक गिलास पानी तक पीने से इनकार कर दिया था. इन्हीं संदेशों में से एक में यह भी दिखाया गया है कि कैसे गांधी जी व नेहरू सहित सभी हिन्दुओं ने अम्बेडकर, पश्चिम बंगाल के मुसलमानों और चांडाल जाति के लोगों के लिए विधायिका में प्रवेश के सारे रास्ते बंद कर दिए.

व्हाट्सएप पर ऐसे ढेरों ऐसे मसाले मिल जाएंगे जिन पर क्लिक करते ही जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्लाह बुखारी, शिया पंथ गुरू काल्बे जवाद नकवी और सूफी नेता अशरफ किछोछवी के ऐसे आलेख मिल जाएंगे जो बसपा के समर्थन में लिखे गए हैं. साथ ही ऐसे तथ्यों का उल्लेख है जिनमें दलित-मुस्लिम गठबंधन से दोनों ही समुदाय के फायदे की बात कही गई है.

इन सबके बावजूद यह देखना दिलचस्प होगा कि मुसलमान मायावती पर भरोसा करते हैं कि नहीं. 11 मार्च का चुनाव परिणाम आने के साथ ही इस सस्पेंस पर से भी पर्दा उठ जाएगा.

First published: 3 March 2017, 8:34 IST
 
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