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बदला बदला बनारस: युवाओं का होने लगा है मोदी से मोहभंग

भारत भूषण | Updated on: 2 March 2017, 18:59 IST

बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खोखले वादों से युवा नाराज हैं. चाय पीते हुए एक ने कहा, ‘नरेंद्र मोदी उम्मीदें जगा रहे हैं और लोग लगातार उनके झांसे में आ रहे हैं.’ उसके सुर में सुर मिलाते हुए दूसरे ने कहा, ‘मोदीजी इस देश के सबसे बड़े भाषण माफिया हैं.’ मैं उनसे पूछ रहा था कि क्या बनारस के युवा अब भी प्रधानमंत्री के साथ हैं, और उनकी ये टिप्पणियां थीं.

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ दावा करते हैं कि 2014 में युवाओं का वोट एकतरफा भाजपा के पक्ष में गया था. अब यह उतना भरोसे वाला वोट बैंक नहीं रहा, जितना हुआ करता था. इस संदर्भ में लोगों की मिली-जुली राय है. कई युवाओं को अब भी उन पर पूरा भरोसा है. उनके लिए प्रधानमंत्री अब भी आइकॉनिक शख्सियत हैं.

चायवाले को ‘चायवाले’ से उम्मीदें

एक युवा भाजपा नेता कहते हैं, ‘मोदी लहर है, पर 2014 जितनी नहीं.’ इससे ज्यादा वे क्या कह सकते थे. जो पार्टी के सदस्य नहीं हैं, वे भी मोदी के प्रशंसक हैं. बनारस के गोदौलिया चौक के जिस रेस्तरां में हम बैठे थे, एक वेटर संकोच से मेरी मेज के पास आता है, जानने के लिए कि मैं पर्यटक हूं या पत्रकार.

जब मैंने बताया, मैं पत्रकार हूं, तो उसने पूछा, ‘तब तो आप मोदीजी से जरूर मिले होंगे. क्या आपने उनके साथ हाथ मिलाया है?’ मैंने इनकार में सिर हिलाया, तो वह उत्साह से फिर पूछता है, ‘तो आपने उन्हें देखा होगा. किसी बैठक में उनके बगल में खड़े हुए होंगे?’ मेरा जवाब फिर ना में था. लगा मेरी बात से वह निराश हो गया.

मैंने पूछा, प्रधानमंत्री की कौन-सी बात पसंद है, तो उसकी आंखों में चमक आ गई. कहता है, ‘वे नीचे से उठे हैं. यदि कोई चायवाला भारत का प्रधानमंत्री बन सकता है, तो कोई भी बन सकता है. अपनी साधारण पृष्ठभूमि को देखते हुए, वे निश्चित रूप से सोच रहे होंगे कि आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को कैसे उठाया जाए.’

‘हां सोच रहे होंगे,’ मैं दबी जबान से बोला. मैंने बात बदल दी और पूछा, उसके निर्वाचन क्षेत्र से कौन जीतेगा, जो बनारस जिले में है. ‘इस बार बसपा का चांस है.’

युवा सपा के साथ

अस्सी घाट पर एक स्थानीय शोधकर्ता और चुनाव विश्लेषक भास्कर कहते हैं कि यूपी में युवा परंपरागत रूप से सपा के साथ रहे हैं. वे आगे दावे से कहते हैं, ‘यूपी में जब सपा सत्ता में होती है तभी छात्र संघ के चुनाव होते हैं. और कई छात्र नेताओं को सपा सरकार के मंत्रिमंडल में जगह मिल जाती है.’

वे आगे कहते हैं, 'यादव परिवार का ड्रामा कुल मिलाकर युवा पीढ़ी का पुरानी पीढ़ी के साथ विरोध था. ‘इसीलिए मैं कहता हूं कि युवा अखिलेश यादव और सपा के साथ हैं.’ वे विस्तार से बताते हैं कि सपा के विरुद्ध गुंडागर्दी का आरोप इसलिए है क्योंकि उसे कॉलेज-यूनिवर्सिटी के छात्रों का अच्छा खासा समर्थन है और वे ‘स्वाभाविक रूप से उग्र’ होते हैं.'

यह सच है कि अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल में 10 से 15 पूर्व छात्र नेता थे. उनमें मुख्य ओम प्रकाश सिंह (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व महासचिव), कमाल अख्तर (जामिया मिलिया छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष), संग्राम सििंह, नफीस अहमद और नारद राय (गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष) थे. पहले भी मरहूम मोहन सिंह (इलाहबाद विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष) और बृजभूषण शरण सिंह (गोंडा के एक छात्र नेता) जैसे मंत्री मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में थे.

सपा से युवा चुनाव में

इस चुनाव में भी, दो छात्र नेताओं को सपा ने चुनावों में खड़ा किया है. इलाहबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ की पहली महिला अध्यक्ष ऋचा सिंह इलाहाबाद पश्चिम से सपा की उम्मीदवार हैं. और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व अध्यक्ष नफीस अहमद को आजमगढ़ में गोपालपुर से खड़ा किया गया है. इसके अलावा आजमगढ़ की अतरौलिया सीट से संग्राम सिंह भी मैदान में जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में छात्रनेता रहे हैं और सपा के कद्दावर नेता बलराम यादव के पुत्र हैं.

‘क्या छात्राओं के साथ कोई समस्या नहीं है, उनकी सुरक्षा को लेकर भी नहीं? फिर भाजपा उन्हें यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए ‘रोमियो स्क्वाड’ का वादा करते हुए समर्थन क्यों मांग रही है?’ अस्सी घाट पर नीबू चाय पी रहे कुछ युवाओं से मैंने पूछा. ‘अखिलेश ने यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए पहले ही 1090 टेलीफोन लाइन की व्यवस्था कर दी है. इसलिए यह रोमियो स्क्वाड उनकी महज चाल है,’ उनमें से एक ने पलट कर कहा.

अस्सी घाट पर खड़े लोगों की आम राय थी कि सपा में युवाओं के लिए पर्याप्त गुंजाइश है. पर क्या इसके मायने यह है कि सभी युवा भाजपा से निकल गए हैं? ‘नहीं, पर उनमें से कुछ 2014 के बाद से निकल गए,’ भास्कर ने जोर देकर कहा. क्या मोदी के साथ अब भी पर्याप्त संख्या में युवा हैं या जो उन्हें समर्थन देते हैं वे सिर्फ जबानी दे रहे हैं. बनारस की 23वीं पीढ़ी के एक बुजुर्ग बंगाली कहते हैं, ‘मुझे चाय की दुकानों पर अक्सर देखने को मिलता है कि यदि मोदीजी की खुल कर आलोचना होती है, तो अचानक कहीं से युवा आते हैं और चिल्लाने लगते हैं- ‘मोदी मोदी मोदी.’

आपको चुप करने के लिए वे मोदी-हथियार इस्तेमाल करते हैं. बनारस में ऐसी संस्कृति पहले कभी नहीं रही. यह कुल मिलाकर बहस और विमर्श की बात है.’ वे कटाक्ष करते हैं, ‘मोदीजी लोगों को हमेशा सितारे गिनाते हैं. मैं सोचता हूं कि उन्हें कभी-कभी धरती पर भी आना चाहिए. पर उनकी मुख्य खूबी यह है कि वे किसी भी विचार के साथ लंबे समय तक नहीं टिकते. हर पल उनकी बॉल बाउंस होती रहती है. कुछ लोगों को उनकी यह बात पसंद आती है.’

मोदीजी हेमलीन के पाइड पाइपर

पर क्या वे अब भी युवाओं और बुजुर्गों, दोनों को साथ लेने में समर्थ हैं? पान खाते हुए वे उदासीनता से कहते हैं, ‘मोदीजी हेमलीन के पाइड पाइपर हैं. वे चूहों को आकर्षित कर सकते हैं, पर यकीन के साथ नहीं कह सकता कि इंसानों को भी आकर्षित कर सकते हैं.’ युवा ऑटो चालक, जो मेरे साथ शहरभर में घूम रहा था, कहता है कि वह भाजपा को वोट देगा. कारण ‘मैं मोदीजी पर भरोसा करता हूं.’

क्यों? ‘वे सही कहते हैं कि यहां काफी संख्या में कब्रिस्तान हैं और बहुत कम श्मशान. और मुसलमान त्योहारों पर हिंदुओं के त्योहारों से ज्यादा बिजली दी जाती है.’ मैंने उसका धर्म पूछा. उसने कहा, ‘वैसे तो हम क्रिश्चियन हैं और हमारा नाम बंटी है.’ उसके जवाब से मैं हैरान था. मैं समझ नहीं सका, वह क्यों शिकायत कर रहा है और भाजपा को क्यों वोट देना चाहता है.

First published: 3 March 2017, 8:45 IST
 
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