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मुलायम सिंह यादव: उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे

अतुल चौरसिया | Updated on: 2 January 2017, 15:24 IST
QUICK PILL
  • राजनीतिक क्षणभंगुरता के इस दौर में मुलायम सिंह यादव सिरमौर राजनेता कहे जाएंगे. 
  • उनकी राजनीति हमेशा औरों के लिए एक बड़ी पहेली बनी रही है. 
  • एक सिरे से देखने पर लगता है कि उत्तर प्रदेश का यह क्षत्रप खुद में बुरी तरह से उलझा हुआ है. 
  • दूसरे सिरे से दिखता है कि उन्होंने बड़ी चतुराई से पूरी राजनीतिक जमात को उलझा कर रखा है.

पिछले तीन महीने से शामे अवध के शहर में हर दिन शह-मात का खेल जारी है. सत्ता के अंत:पुरों में जारी यह मारकाट बिल्कुल उसी तर्ज़ पर हो रही है जिस तर्ज़ पर अठारहवीं सदी में नवाबों के दौर में हुआ करती थी, या फिर मुग़लिया हिंदुस्तान में औरंगजेब ने की थी. बस फर्क़ इतना है कि अब यह सब लोकतंत्र की चादर ओढ़कर हो रहा है. इन्हें जनता ने चुनकर राजा बनाया है. इसी तर्ज़ पर 1995 में हमने आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव को सत्ताच्युत होते देखा है. चेहरे और किरदार बदल जाते हैं, सियासत उसी फार्मूले पर आगे बढ़ती है.

मुलायम सिंह यादव को उनके बेटे अखिलेश यादव ने रविवार के दिन, जब दुनिया और देश नए साल की खुमारी से मुक्त होने की कोशिश में थी, सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से मुक्त कर दिया. उन मुलायम सिंह यादव को जिन्होंने सपा को शून्य से शिखर तक खड़ा किया था. वो मुलायम सिंह यादव जिन्होंने लगभग साठ सालों तक अनवरत राजनीति के थपेड़े झेलकर सियासत में यह मुकाम बनाया था.

मुलायम सिंह यादव समाज के ऊंचे पायदान से ताल्लुक नहीं रखते थे. मुलायम सिंह तो कायदे से हिंदी भी नहीं बोल पाते थे जिसकी जरूरत एक अदद बड़े राजनेता को हमेशा रहती है. फिर भी उन्होंने एक पार्टी बनाई, उसे यहां तक पहुंचाया. सियासी नज़रिए से देश के सबसे महत्वपूर्ण सूबे में उनकी धाक जम गई.

लेकिन क्या सिर्फ इन्हीं बातों से मुलायम सिंह के पूरे सियासी सफर को नापा जा सकता है, क्या उन्हें इन परिस्थितियों में संदेह का लाभ देकर सहानुभूति का पात्र बनाया जा सकता है?

राजनीतिक क्षणभंगुरता के इस दौर में मुलायम सिंह यादव सिरमौर राजनेता कहे जाएंगे. उनकी राजनीति हमेशा औरों के लिए एक बड़ी पहेली बनी रही है. एक सिरे से देखने पर लगता है कि उत्तर प्रदेश का यह क्षत्रप खुद में बुरी तरह से उलझा हुआ है. दूसरे सिरे से दिखता है कि उन्होंने बड़ी चतुराई से पूरी राजनीतिक जमात को उलझा कर रखा है.

उदय

जिस दौर में मुलायम सिंह ने राजनीति शुरू की थी वह पिछड़े समाज के, बमुश्किल से हिंदी बोल पाने वाले, अंग्रेजी से बिदकने वाले, छोटे कद के एक पहलवान के लिए कतई मुफीद नहीं था. इस लिहाज से उनकी राजनीतिक सफलता असाधारण की श्रेणी में आती है. चौधरी चरण सिंह कहते थे यह छोटे कद का बड़ा नेता है.

आगे चलकर उसी छोटे कद के बड़े नेता ने चौधरी चरण सिंह की पूरी राजनीतिक विरासत पर कब्जा कर लिया. चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह को सियासत के हाशिये पर पहुंचाने में मुलायम सिंह की बड़ी भूमिका है. इस तरह की तमाम छोटी-छोटी बातें मुलायम सिंह की राजनीति का अभिन्न हिस्सा हैं.

मुलायम सिंह के बारे में मशहूर है कि उनमें आला दर्जे की राजनीतिक चतुराई, हद दर्जे का अवसरवाद, साथियों के साथ खड़ा रहने का जीवट, परिवारवाद की बीमारी और राजनीति में सफलता के लिए सबसे जरूरी खास किस्म की मोटी चमड़ी जैसी खासियतें प्रचुरता में मौजूद हैं.

चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह को सियासत के हाशिये पर पहुंचाने में मुलायम सिंह की बड़ी भूमिका है.

मुलायम सिंह के बारे में मशहूर था कि वो उत्तर प्रदेश में किसी भी जनसभा में कम से कम पचास लोगों को नाम लेकर मंच पर बुला सकते थे. समाजवाद के फ्रांसीसी पुरोधा कॉम डी सिमॉन की अभिजात्यवर्गीय पृष्ठभूमि के विपरीत उनका भारतीय संस्करण मध्य भारत के कभी गांव रहे सैफई के अखाड़े में तैयार हुआ है. वहीं से उन्होंने पहलवानी के साथ राजनीति के पैंतरे भी सीखे.

मुलायम सिंह की सियासत का पहला अध्याय 60 के दशक में शुरू होता है. यह कांग्रेस विरोध का दौर था. तब से अब तक वो पांच बार लोकसभा के सदस्य, तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, देश के रक्षामंत्री रह चुके हैं. यह रिकॉर्ड उनकी सफल राजनीतिक जीवन की कहानी बताती है.

1977 में आपातकाल के बाद उत्तर प्रदेश में संघ और सोशलिस्टों की मिली-जुली सरकार बनी थी. मुलायम सिंह यादव उस सरकार में सहकारिता मंत्री थे. इसी साल के आस-पास उनकी मुलाकात जनेश्वर मिश्रा से हुई. मिश्रा को छोटे लोहिया के उपनाम से लोग याद करते हैं.

संघ-समाजवादी सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चली. लेकिन कुछ ही दिन बाद मुलायम सिंह की उठापटक वाली क्षमता का पहला नमूना देखने को मिला. मुलायम सिंह यादव 1980 में तब के उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े समाजवादी नेता लोकबंधु राजनारायण का साथ छोड़कर चौधरी चरण सिंह के साथ जा खड़े हुए.

अवसरवादिता

मुलायम सिंह का यह साथ किसी विचारधारा या सिद्धांत को लेकर नहीं था. क्योंकि चरण सिंह न तो समाजवादी विचारधारा से जुड़े थे न ही वे समाजवाद के खांचे में फिट होते थे. वे मूलत: जमींदार और जाट बिरादरी के बड़े नेता थे. फिर भी मुलायम सिंह ने चरण सिंह का हाथ थाम लिया क्योंकि वह दौर चरण सिंह के पक्ष में था.

विचारधारा के साथ छेड़छाड़ का मुलायम सिंह का प्रयोग आगे और भी बढ़ा. उस समय मुलायम सिंह यादव समर्थकों और कार्यकर्ताओं को तर्क दिया करते थे कि लोहियाजी के बाद संगठन को बचाए रखने के लिए बड़ी मात्रा में संसाधनों की जरूरत थी, इसलिए उन्हें इस तरह के समझौते करने पड़े.

आगे चलकर यह बात ज्यादा स्पष्टता से स्थापित हुई कि मुलायम सिंह का तर्क दरअसल उनके अवसरवादी व्यक्तित्व का ही हिस्सा था. बीते एक दशक के दौरान हमने उनके वैचारिक धरातल में आई तब्दीली का सबसे विकृत रूप भी देखा जब उन्होंने अनिल अंबानी से लेकर, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन तक को समाजवादी बना दिया.

अस्सी के दशक में ही मुलायम सिंह ने समाजवाद की परिभाषा में अपनी सुविधा के हिसाब से हेरफेर करना शुरू कर दिया था. अस्सी के दशक का शुरुआती साल राजनीतिक लिहाज से बहुत अहम था. इसी समय बोफोर्स का मामला देश के सामने आया था.

वीपी सिंह के रूप में देश को एक नया नेता मिला था जो भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ था राजीव गांधी के खिलाफ. मुलायम सिंह ने मौका ताड़ते हुए जनता दल का साथ पकड़ लिया. इस जमघट में कांग्रेस के असंतुष्ट और ज्यादातर समाजवादी थे. इसे वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों समर्थन दे रहे थे.

इस दौर में घटी कुछ घटनाओं ने मुलायम सिंह के राजनीतिक ‘कौशल’ को जमकर निखारा. पहला राम मंदिर आंदोलन और दूसरा मंडल आयोग की रपट. 1989 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वीपी सिह देश के प्रधानमंत्री बने और मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री.

हालांकि ग्यारह महीने बाद ही वीपी सिंह की सरकार भाजपा के समर्थन वापस लेने की वजह से गिर गई. इस मौके पर मुलायम सिंह ने भी पैंतरा बदलते हुए एक और नेता चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी के साथ जा खड़े हुए. इसके साथ ही मुलायम सिंह ने अपने लिए कांग्रेस के समर्थन का जुगाड़ कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहे.

मुलायम सिंह यादव ने अनिल अंबानी से लेकर, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन तक को समाजवादी बना दिया था.

साल 1989 में उत्तर प्रदेश की सरकार बनने के दौरान हुई एक घटना बहुत दिलचस्प है और मुलायम सिंह के व्यक्तित्व को सामने लाती है. चुनाव बाद उत्तर प्रदेश में सरकार का गठन करने की बारी आई तब मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दो नाम सबसे आगे चल रहे थे, पहला मुलायम सिंह और दूसरा अजित सिंह.

मुलायम सिंह के साथ यह एक फायदे वाली स्थिति यह थी कि वो जनाधार वाले नेता थे. दूसरी तरफ अजित सिंह थे जो अमेरिका से पढ़ाई कर लौटे थे, चरण सिंह के बेटे थे. लिहाजा उनका पलड़ा भारी माना जा रहा था. वीपी सिंह भी अजित सिंह के पक्ष में थे और उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे.

मुलायम सिंह यादव को यह बात कतई मंजूर नहीं हुई. मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम मुहर लगाने के लिए वीपी सिंह ने गुजरात के समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को लखनऊ भेजा गया. पटेल उस समय उत्तर प्रदेश के जनता दल के प्रभारी थे. सूत्रों के मुताबिक वीपी सिंह ने पटेल को स्पष्ट शब्दों में अजित सिंह का नाम फाइनल करने के लिए लखनऊ भेजा था.

इस मौके पर मुलायम सिंह यादव ने जबरदस्त राजनीतिक चतुराई का प्रदर्शन किया. चिमनभाई पटेल के लखनऊ पहुंचते ही मुलायम सिंह उनसे मिलने पहुंच गए. वहां उन दोनों के बीच जाने क्या बातचीत हुई, चिमनभाई वापस दिल्ली लौट गए अजित सिंह से मिले बिना. लौटते ही उन्होंने मुलायम सिंह के नाम पर ठप्पा लगा दिया. वीपी सिंह चाहकर भी अजित सिंह को मुख्यमंत्री नहीं बनवा सके.

यह कसक भी मुलायम सिंह के मन में थी लिहाज़ा ग्यारह महीने बाद जैसे ही मौका मिला उन्होंने वीपी सिंह को ठेंगा दिखा दिया.

उलटबासियां

विचारधारा के स्तर पर मुलायम सिंह के विचार हमेशा संदेहास्पद रहे हैं. जिस लोहिया को वे अपना राजनीतिक गुरू और रहनुमा मानते हैं, कई मामलों में मुलायम उनके ही विचारों से दूर खड़े रहे. मसलन लोहिया कई मुद्दों पर बेहद स्पष्टवादी थे, जबकि मुलायम सिंह के विचार उन मुद्दों पर आज तक कोई जान ही नहीं सका है.

लोहिया एक व्यक्ति, एक पत्नी की बात करते थे. लेकिन मुलायम ने मुस्लिम राजनीति के चलते इस पर कभी मुंह नहीं खोला. धर्म निरपेक्षता की परिभाषा के साथ उन्होंने जमकर प्रयोग किए. पिछड़ा राजनीति की लोहियावादी परिभाषा को समेटकर उन्होने "यादव" तक सीमित कर दिया.

लोहिया की विरासत और मंडल कमीशन के प्रभाव में वे उत्तर प्रदेश में पिछड़ों के बड़े नेता बन गए. मंदिर आंदोलन में उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलवाने का साहसिक निर्णय किया, इसके चलते वे मुसलमानों के रहनुमा बन गए.

यादव-मुस्लिम के चमत्कारिक मेल ने उन्हें बड़े कद वाला नेता बना दिया. कांग्रेस ने उनकी सरकार को ज्यादा दिन तक समर्थन नहीं दिया. सन 1991 में केंद्र की चंद्रशेखर और उत्तर प्रदेश की मुलायम सरकार गिर गई.

मुलायम सिंह ने फिर से पल्टी खाई. वे ज्यादा समय तक चंद्रशेखर के साथ भी नहीं रहे. सन 1992 के अक्टूबर महीने में उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा जुआ खेला. मुलायम सिंह ने अपनी समाजवादी पार्टी का गठन कर लिया. जानकार बताते हैं कि मुलायम के इस कदम से चंद्रशेखर बहुत आहत थे. जानकारों के मुताबिक इस फैसले के पीछे मुलायम सिंह की महत्वाकांक्षा सिर्फ एकमात्र वजह थी.

यहां से मुलायम सिंह यादव एकला चलो के फार्मूले पर आगे बढ़े. उनके पास एक पार्टी थी, एक कैडर था, एक कोर वोटबैंक था. इस दौरान वे बसपा के सहयोग से एक बार फिर से प्रदेश के मुख्यमंत्री बने पर दोनों के रिश्ते उसी दौरान इतने खराब हो गए कि आज तक नहीं सुधर पाए हैं.

समाजवादी पार्टी बनाने के पीछे एक मात्र वजह मुलायम सिंह यादव की महत्वाकांक्षा थी.

1996 मुलायम सिंह के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण साल है. इस साल वो प्रधानमंत्री पद की देहरी पर पहुंच कर फिसल गए. वामपंथियों के साथ मिलकर संयुक्त मोर्चा की सरकार बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. प्रधानमंत्री पद की रेस में मुलायम सिंह सबसे आगे चल रहे थे. तब खुद उनके सजातीय नेता लालू प्रसाद यादव ने लंगड़ी मार दी. मुलायम उसी खेल का शिकार हो गए जिसे वे अब तक अपने फायदे के लिए खेलते आए थे.

मात खाए मुलायम तीन साल रक्षा मंत्रालय और विपक्ष की राजनीति में बीते. 1999 में 13 महीने पुरानी अटल बिहारी वाजेपयी की केंद्र सरकार गिर गई. सोनिया गांधी तमाम विपक्षियों के समर्थन की चिट्ठी लेकर राष्ट्रपति भवन पहुंची थी. इसमें मुलायम के समर्थन की चिट्ठी भी थी.

मुलायम सिंह फिर से कलाबाजी खा गए. राष्ट्रपति भवन में सोनिया गांधी मुलायम के समर्थन का दावा कर रही थीं, दूसरी तरफ मुलायम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि वो कांग्रेस को समर्थन नहीं देंगे.

अक्सर मुलायम सिंह का अवसरवाद विरोधाभास पैदा करता है. मसलन जिस लेफ्ट के साथ 1989 और 1996 में वे सरकार बना चुके हैं उसी को धता बताते हुए 2008 में उन्होंने यूपीए की सरकार को बचा लिया. इतना ही नहीं वे यूपीए सरकार का रिपोर्ट कार्ड जारी करने भी पहुंचे जबकि उस सरकार में उनकी कोई भूमिका नहीं थी.

मुलायम सिंह के अवसरवाद की भेंट एक समय उनका यादव-मुसलिम भी होता दिखा. 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा नेता कल्याण सिंह को सपा में शामिल कर लिया. गौरतलब है कि कल्याण सिंह आज भी खुद को बाबरी विध्वंस का नायक बताते हैं.

इसका खमियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा. अगले ही चुनाव में सपा 39 से 22 सीटों पर आ गई और उनके सारे मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव हार गए.

दबे-छिपे उन पर भाजपा से सांठगांठ की खबरें आती रहती हैं लेकिन वे सार्वजनिक रूप से इसे कभी प्रचारित नहीं होने देते. कल्याण सिंह को छोड़ दिया जाय तो उन्होंने इस तरह का अवसर फिर किसी को नहीं दिया. जबकि राजनीतिक हलकों में यह बात मशहूर है कि अटल बिहारी वाजेपयी से उनके व्यक्तिगत रिश्ते बेहद मधुर थे. 2003 में उन्होंने भाजपा के अप्रत्यक्ष सहयोग से ही प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी.

इसी कड़ी में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी चक्कर कटवा दिया था. वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के चुनाव के दौरान 2012 में उन्होंने दो दिनों में एक के बाद एक फैसले बदले. पहले उन्होंने चुनाव में ममता बनर्जी के उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा की और फिर अगले ही दिन पलट गए.

यूपीए टू के शासनकाल में एफडीआई के मसले पर उन्होंने विपक्षी पार्टियों के साथ भारत बंद भी कराया और बाद में यह बयान भी जारी किया कि सरकार को कोई खतरा नहीं है.

ढलान

मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी को लंबे समय से कवर कर रहे लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक उनका स्वास्थ्य पहले जैसा नहीं है, याददाश्त प्रभावित होने लगी है.

इतने सारे उलटफेर और दांवपेंच से आज मुलायम सिंह का साम्राज्य यहां तक पहुंचा था. लिहाज़ा अगर हम चीजों को उसकी निरंतरता में देखें तो पाएंगे कि मुलायम सिंह के राजनीतिक जीवन में यह एक और उटापटक भर है. अंतर सिर्फ यह है कि इस बार वो इस खेल में पराजित दिख रहे हैं, अपने ही बेटे से.

उत्तर भारत में एक मान्यता है कि बेटे से हार में बाप का कोई अपमान नहीं होता, बाप अंतरमन में खुशी-खुशी इस तरह की हार को स्वीकार कर लेता है. मुलायम सिंह वो मन अभी तक नहीं दिखा पाए हैं.

First published: 2 January 2017, 15:24 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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