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सपा-बसपा की मुस्लिम राजनीति में बड़ा बदलाव , किसका भला और किसका नुकसान

अतुल चौरसिया | Updated on: 29 January 2017, 8:46 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • समाजवादी पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के पास यूपी की राजनीति में शिखर पर बने रहने का एक कारगर नुस्खा मुस्लिम-यादव वोटबैंक पर पकड़ बनाए रखना था. 
  • मगर महीनों की उठा-पटक के बाद सपा की कमान अपने हाथ में लेने वाले अखिलेश अब जाति आधारित राजनीतिक करने की बजाय विकास का एजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं. 
  • सूबे की दूसरी सबसे सशक्त बहुजन समाज पार्टी जिसके प्रति मुसलमान वोटर हमेशा शंकालु रहा है, अब इस वोटबैंक को अपने पाले में करने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है. 
  • ऐसी सूरत में कहां जाएंगे यूपी के 18 फीसदी मुसलमान? सपा मैनिफेस्टो में कुछ नहीं होने के बावजूद वो इसके साथ बने रहेंगे या फिर बसपा में अपना ठौर तलाशेंगे?

उत्तर प्रदेश के प्रथम परिवार (मुलायम सिंह का कुनबा) के बीच हाल तक जारी जूतम-पैजार के बीच 16 जनवरी को मुलायम सिंह यादव ने एक बयान देकर सनसनी फैला दी. उन्होंने कहा, 'अखिलेश मुसलमान विरोधी हैं. एक मौलाना ने मुझे बताया कि उन्होंने मुसलमानों के लिए कोई काम नहीं किया है.' मुलायम सिंह यहीं नहीं रुके, उन्होंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, 'मैंने जावेद अहमद को उत्तर प्रदेश का डीजीपी बनाया. अखिलेश ने उसका भी विरोध किया. वो मेरी बात ही नहीं सुनते.'

इसी दिन शाम को चुनाव आयोग ने सपा का चुनाव चिन्ह साइकिल अखिलेश यादव को सौंप दिया और उनके धड़े को असली सपा मान लिया. मुलायम सिंह के बयान के बड़े राजनीतिक नतीजे हो सकते थे इसके बावजूद उन्होंने ऐसा कहा. दरअसल यह मुलायम सिंह की ट्रेडमार्क राजनीति रही है. 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से वे लगातार मुस्लिम राजनीति को इन्हीं तरीकों से दुहते रहे हैं.

इसके विपरीत अखिलेश यादव ने पिछले पांच साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में अपने पिता की मुस्लिम राजनीति से खुद को लगभग दूर रखा है. आलम यह है कि चुनावी मुहाने पर आकर भी उन्होंने अभी तक सपा के कट्टर समर्थक मुसलमानों से अपने पक्ष में वोट करने की एक अदद अपील जारी नहीं की है न ही उन्होंने मुसलमानों को किसी तरह का संदेश देने की कोशिश की है. अखिलेश की यह राजनीति सपा और मुलायम सिंह की परंपरागत राजनीति से एकदम अलग है.

इसी तरह की गैर परंपरागत राजनीति इन दिनों उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भी कर रही हैं. मुलायम सिंह के विपरीत मायावती ने कभी भी खुलेआम मुसलमान समर्थक राजनीति नहीं की है. बल्कि उनका अतीत ऐसा है जहां तीन बार उन्होंने भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टी के समर्थन से सरकार बनाई है. यह रिकॉर्ड मुसलमानों को उनके प्रति हमेशा शंकालु बनाए रखता है.

लेकिन इस बार के चुनाव में मायावती एकदम नई रणनीति के साथ काम कर रही हैं. उन्होंने 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है. बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकदा दल का विलय कर उन्हें और उनके परिवार को तीन सीटें भी दी हैं.

उत्तर प्रदेश के दोनों महत्वपूर्ण दल इस चुनाव में मुस्लिम राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश में हैं.

उत्तर प्रदेश के दोनों महत्वपूर्ण दल इस चुनाव में मुस्लिम राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं. अखिलेश विकास की राजनीति को अपना हथियार बना रहे हैं तो मायावती दलित-मुस्लिम समीकरण साध कर उत्तर प्रदेश की सत्ता को साधना चाहती हैं. अखिलेश की रणनीति शायद 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से तय हुई है. जब सपा की मुस्लिम तुष्टिकरण की छवि को उभार कर भाजपा ने हिंदुओं का जबर्दस्त ध्रुवीकरण कर लिया था.

मायावती की रणनीति शायद इस तथ्य से आकार ले रही है कि अकेले उनका दलित वोटबैंक उन्हें सत्ता की देहरी तक नहीं पहुंचा सकता. 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दलितों के साथ ब्राह्मणों को जोड़कर सत्ता हासिल की थी. अब जब उन्हें भरोसा हो गया है कि 2014 की मोदी लहर उतार पर है, उनका दलित वोट वापस लौट आया है तब एक अदद जीत के फार्मूले के तौर पर उन्होंने मुस्लिमों को जोड़ने की आक्रामक कोशिश शुरू की है.

सपा-बसपा के इस राजनीतिक दांवपेंच के बीच सूबे की 19 फीसदी मुस्लिम आबादी क्या सोचती है यह देखना दिलचस्प रहेगा. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद के शब्दों में, 'एसपी और बीएसपी मुसलमानों की परंपरागत पसंद रहे हैं. लेकिन असलियत यह है कि मुसलमान इस समय खुद को हेल्पलेस स्थिति में पा रहा है. 

उन्होंने आगे कहा, 'भाजपा के साथ वह जा नहीं सकता, कांग्रेस की सूबे में कोई हैसियत नहीं है, लिहाजा एक भरोसेमंद अल्टरनेटिव की तलाश में वह इनके आस-पास भटकता रहता है. उसकी मजबूरी का फायदा ये सियासी दल उठाते रहते हैं. आज जो मायावती कर रही हैं, कल को अखिलेश फिर से यही करने लगेंगे.'

उत्तर प्रदेश के सियासी इतिहास के दो काल हैं. एक बाबरी विध्वंस से पहले और दूसरा बाबरी विध्वंस के बाद. ठीक इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की राजनीति को भी दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. 1992 से पहले और बाद की राजनीति. बाबरी विध्वंस से पहले उत्तर प्रदेश की मुस्लिम आबादी अमूमन कांग्रेस की समर्थक हुआ करती थी. जब तब उसमें समाजवादी खेमा भी जुड़ता रहता था.

1991 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद पर हमला करने वाले कारसेवकों के ऊपर गोली चलाने का आदेश देने के बाद मुलायम सिंह मुसलमानों के बड़े नायक बनकर उभरे. मुलायम सिंह यादव इस अहम पूंजी के दम पर आने वाले लगभग ढाई दशकों तक प्रदेश और देश की राजनीति में महत्वपूर्ण बने रहे. लेकिन उन्होंने मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक दशा को बदलने की दिशा में कोई उल्लेखनीय काम शायद ही किया हो.

मुलायम सिंह की राजनीति हमेशा मुल्ला-मौलवी केंद्रित रही. उन्होंने मुसलमानों की असुरक्षा के ऊपर राजनीति की इमारत खड़ी की. मुसलमानों के धार्मिक आग्रह उनकी राजनीति का केंद्र बिंदु थे. धर्मगुरू और मस्जिदों के इमामों की पूरी फौज थी जिन्हें मुलायम सिंह अपने राजनीतिक हित के लिए संरक्षण देते रहे.

लखनऊ विश्वविद्यालय में मानविकी और समाज विज्ञानी प्रो. नदीम हसनैन कहते हैं, 'मुलायम सिंह की सारी कोशिशें प्रतीकात्मक होती थीं. मुसलमानों के असल मुद्दों की बजाय उनके धार्मिक और भावनात्मक मसलों की ओर उन्हें धकेला गया. बहुत हुआ दो 2-3 हजार उर्दू शिक्षकों की भर्ती कर दी.'

मुसलमानों के असल मुद्दों की बजाय उनके धार्मिक और भावनात्मक मसलों की ओर उन्हें धकेला गया.

इस राजनीति का नतीजा यह रहा कि मुसलमान जिसका बड़ा हिस्सा पसमांदा (पिछड़ा) है वह इन ढाई दशकों के दौरान अपनी शिक्षा, स्वास्थ्य, हकों के बारे में सोचने की बजाय अपनी धार्मिक असुरक्षा से लड़ता रहा.

लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. लोगों की अपेक्षाएं और उम्मीदें बढ़ गई हैं. मुसलमानों के बीच से एक ऐसा वर्ग उभर चुका है जो महत्वाकांक्षी है, खुद राजनीतिक ताकत पाना चाहता है, टेकसेवी है. यह खेमा गाहे-बगाहे मुलायम सिंह की राजनीति को आम मुसलमनों के बीच उजागर कर रहा है.

इसी कड़ी में हम छोटे-छोटे मुस्लिम राजनीतिक दलों के उदय को देख सकते हैं. जो सीमित क्षेत्र और प्रभाव के बावजूद राजनीति को आने वाले लंबे समय के लिए प्रभावित कर रहे हैं. इनमें पीस पार्टी से लेकर एमआईएम सरीखे दल हैं.

प्रोफेसर हसनैन कहते हैं, 'बीते कुछ सालों से मुसलमानों का मुलायम सरीखे नेताओं से लगातार मोहभंग हो रहा है. इससे मुस्लिम पहचान की राजनीति के लिए बड़ा स्पेस पैदा हो रहा है. असदुद्दीन ओवैसी बार-बार जिस तरह से मुलायम सिंह को लोकसभा से लेकर प्रदेश में एक्सपोज कर रहे हैं उससे मुलायम मार्का राजनीति को बहुत नुकसान होगा. ओवैसी को वोट भले ही न मिले लेकिन भविष्य में वो सपा को भारी नुकसान पहुंचाएगा.'

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक गणित को समझें तो यहां की 403 विधानसभा सीटों में लगभग 120 सीटें ऐसी हैं जिनके नतीजे मुसलिम मतदाताओं के रुझान से तय होते हैं. इसका एक फलसफा यह भी हो सकता है कि फिर उत्तर प्रदेश में अलग मुस्लिम नेतृत्व क्यों नहीं उभर सकता.

असदुद्दीन ओवैसी इसी कोशिश में दिख रहे हैं हालांकि वे अभी चुनावी नतीजों को बहुत बदल पाने की स्थिति में नही है. प्रो. सज्जाद के मुताबिक अलहदा मुस्लिम राजनीति का स्पेस तो बाद की बात है लेकिन अपनी कोशिशों से ओवैसी ने उसे एक डिस्कोर्स में जरूर बदल दिया है. यह सपा-बसपा के लिए खतरे की घंटी है.

अखिलेश की रणनीति

अखिलेश की रणनीति शायद एक सर्वस्वीकार्य नेता की छवि बनाने की है. एक सोच यह है कि मुसलमानों से सीधे-सीधे अपील न करके वे हिंदुओं की बाकी जातियों के बीच से भी विशेषकर सवर्णों के भीतर अपनी पैठ को कुछ हद तक बढ़ाना चाहते हैं. एक इन्क्लूजिव नेता की छवि बनाना की कोशिश दिख रही है.

उनके ऊपर एक दबाव नरेंद्र मोदी की हिंदुवादी, विकासवादी कॉटेल का भी है. लिहाजा वे बहुत खुलकर मुस्लिम केंद्रित राजनीति नहीं कर रहे हैं.

लेकिन अखिलेश लंबे सय तक इसे नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकते. इस रणनीति का एक खतरा भी है. खतरा यह कि मुसलमानों का उनसे मोहभंग हो सकता है. अभी तक अखिलेश का रवैया मुसलमानों को फॉरग्रांटेड लेने जैसा रहा है. पर समय बदलने के साथ ही दबे-छिपे चलने वाले प्रपंचों की उम्र भी कम हो गई है. मुलायम सिंह ने बाबरी मुद्दे के जरिए लंबे समय मुसलमानों को उलझाए रखा पर अब समुदाय के भीतर से इन बातों पर सवाल उठने लगा है.

मुलायम और अखिलेश की राजनीति से मुसलमानों का एक और नुकसान हुआ है. मुसलमानों की छवि सपा के बंधक वोटबैंक की बन गई है जबकि असलियत में होता यह रहा कि 18 फीसदी मुसलमान और 9 फीसदी यादवों के वोट से सत्ता में आने वाली मुलायम सिंह की सरकार ने कभी भी इस अनुपात में मुसलमानों के हित के काम नहीं किया.

जब भी सपा की सरकार बनी यादव राज्य सरकार की नौकरियों से लेकर अन्य मलाईदार ओहदों के सबसे बड़े लाभार्थी बने. सरकार के प्रमुख पदों पर यादवों को तरजीह मिली, राज्य प्रशासन में भी उन्हें ही वरीयता मिली. जबकि मुसलमान अपने वोट प्रतिशत के बराबर तो दूर उसका चौथाई हिस्सा भी सरकार और प्रशासन में नहीं पा सके.

नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा बताते हैं, 'मुलायम सिंह के साथ मुसलमानों के एक भरोसा हमेशा था कि वे कभी भाजपा के साथ नहीं जाएंगे. अंदरखाने में भले ही वे कुछ समझौते करते रहे हों. लेकिन अब अखिलेश जो कर रहे हैं उसमें इस बात की पूरी संभावना है कि जरूरत पड़ने पर, चुनाव बाद उत्पन्न परिस्थितियों में वे भाजपा के साथ भी जा सकते हैं. यह मेरे ख्याल से सपा और उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अहम बदलाव है.'

मायावती की रणनीति

मायावती की मुस्लिम राजनीति एक अलग आयाम लिए हुए हैं. उन्होंने 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है. इनमें से 40 उम्मीदवार पहले और दूसरे दौर के चुनाव में किस्मत आजमाएंगे.

मुस्तफा बताते हैं, 'सिर्फ ज्यादा से ज्यादा टिकट देना चुनाव में जीत की गारंटी नहीं है. अगर ऐसा कोई शॉर्टकट होता तो बाकी दल भी मुसलमानों को टिकट दे देते. बल्कि मुझे तो लगता है कि ज्यादा लोगों को टिकट देने से नुकसान बाकी सीटों पर हो सकता है. इसके अलावा मुस्लिम उम्मीदवार की राजनीत मुस्लिमों के मूल मसलों को हल नहीं करती है. मुसलमान किसी मुस्लिम कैंडिडेट की बजाय एक सेक्युलर, अच्छी छवि वाले हिंदू उम्मीदवार को ज्यादा तरजीह देगा जो उनके मुद्दों को संवेदनशील तरीके से हल कर सके.'

मायावती के सामने एक मुसीबत यह भी है कि उन्होंने टिकट भले ही कई मुस्लिमों को दे दिया है लेकिन उनके पास कोई बड़ा, भरोसेमंद और स्वीकार्य मुस्लिम चेहरा नहीं है. चुनाव आयोग को मायावती ने जो सूची सौंपी है उनमें सिर्फ तीन मुस्लिम स्टार प्रचारकों के नाम हैं. इनमें से दो नसीमुद्दीन सिद्दीकी और उनके बेटे हैं.

मायावती ने मुस्लिमों को टिकट दिया है लेकिन उनके पास प्रचार के लिए कोई भरोसेमंद मुस्लिम चेहरा नहीं है.

दोनों ही अपने समुदाय के बीच कोई खास पकड़ या मास अपील नहीं रखते. इनके साथ ही इनका चुनाव क्षेत्र भी बुंदेलखंड है जो कि सबसे कम मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां की करीब 140 सीटों पर पहले दो चरणों में मतदान होना है वहां उन्हें बाहरी माना जा रहा है. और इसी चरण में मायावती द्वारा दिए गए कुल 40 मुस्लिम उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होना है.

मायवती ने अपनी राजनीति को नए सिरे बुना है, लेकिन उनका अतीत मुसलमानों को उनके प्रति सशंकित बनाए रखता है. गौरतलब है कि मायावती तीन बार भाजपा के सहयोग से थोड़े-थोड़े समय के लिए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं. लिहाजा चुनाव बाद उत्पन्न परिस्थितियों में वे भाजपा के साथ नहीं जाएंगी इसकी कोई गारंटी नहीं है, हालांकि उन्होंने इस बार बयान जरूर दिया है कि चुनाव बाद भी वे किसी हाल में भाजपा के साथ नहीं जाएंगी.

हालांकि मायावती ने इस बार अपनी मुस्लिम राजनीति को बहुत समझदारी से आकार दिया है. मुसलमानों के बीच दो हिस्सों का एक महीन बंटवारा उनकी आस्था और पूजा पद्धतियों के आधार पर रहा है. एक वह तबका जो सूफी मजारों की आराधना करता है दूसरी वहाबी तबका है जो कथित तौर पर धार्मिक नजरिए से ज्यादा रूढ़िवादी और कट्टर है.

मुसलमानों का बहुसंख्यक तबका सूफी मजारों को मानने वाला है. मायावती ने जिन लोगों को टिकट दिया है उनमें से ज्यादातर लोग इसी तबके से ताल्लुक रखते हैं. प्रो. हसनैन कहते हैं, 'इस रणनीति से मायावती को पूरे सूबे में फयदा मिले न मिले लेकिन जिन सीटों पर उन्होंने मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा किया है उन पर उन्हें जरूर फायदा हो सकता है.'

प्रो हसनैन मुस्लिम समुदाय के भीतर जिस फॉल्टलाइन की बात कर रहे हैं वह पूरे प्रदेश में अलग अलग रूपों में मौजूद है. यह बंटवारा सिर्फ पसमांदा बनाम अशराफ का नहीं है. इनके भीतर भी कई फॉल्टलाइनें मौजूद हैं और ये चुनावी प्रक्रिया पर अपना असर डालती रही हैं.

इसे हम एक-दो उदाहरणणों से समझ सकते हैं. मसलन अलीगढ़ को ले तो यहां पसमांदा की दो सबसे बड़ी जातियां हैं कुरैशी और सैफ़ी. इनके बीच अदावत का लंबा इतिहास रहा है. दोनों के अपने-अपने नेता होते रहे हैं और उनके इशारे पर ही दोनों समुदाय अपनी चुनावी पसंद तय करते हैं.

इसी तरह अगर हम पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, मऊ जिलों को लें तो यहां अशराफ के बीच शेख़ और अंसारी का स्पष्ट बंटवारा है. मोहम्मद सज्जाद बताते हैं, 'सपा-बसपा की राजनीति में अगर अशराफ और पसमांदा का बंटवारा होता है तो इस स्थिति में भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा.'

सपा हो या बसपा, नई राजनीति कोई नहीं कर रहा है सिर्फ भूमिकाएं बदल गई हैं. जाहिर है बदले दौर और बदली आकाक्षाओं के बीच लंबे समय तक आम मुसलमान इन पुराने तौर-तरीकों में फंसा नहीं रहेगा. लिहाजा दोनों ही दलों को मुसलमानों के वोट फॉर ग्रांटेड लेने की चूक नहीं करनी चाहिए. जितना जल्दी, उतना बेहतर होगा.

First published: 29 January 2017, 8:46 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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