Home » उत्तर प्रदेश चुनाव » Muslim voters are kingmaker in west UP
 

उत्तर प्रदेश: पहले दूसरे चरण में मुस्लिम वोटर किंगमेकर

अतुल चंद्रा | Updated on: 11 February 2017, 5:39 IST
(फ़ाइल फोटो )

पंजाब और गोवा में मतदान ख़त्म होने के बाद अब सभी की निगाहें उत्तर प्रदेश चुनाव पर टिक गई हैं. दो दिन बाद यानी कि 11 फरवरी को यूपी असेंबली 2017 के लिए पहले चरण का मतदान होना है जबकि दूसरे फेज़ की वोटिंग 15 फरवरी को होगी. 

इस दौरान कुल 140 सीटों के लिए मतदान होगा. पहले चरण में 15 ज़िलों की 73 और दूसरे चरण में 10 ज़िलों की 67 सीटें हैं. यह पूरा इलाक़ा मुस्लिम और जाट बेल्ट के तौर पर जाना जाता है. 

राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, कैराना के सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका, भाजपा नेता संगीत सोम, सुरेश राणा, मंत्री आज़म खान के बेटे अब्दुल्लाह, कांग्रेस के प्रदीप माथुर जैसे बड़े और हाई प्रोफाइल उम्मीदवार इन्हीं दो चरणों में अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं. 

2013 में हुए सांप्रदायिक दंगे के बाद से शामली और मुज़फ्फरनगर में जाट और मुसलमानों के बीच साफ औऱ गहरा बंटवारा हो गया है. इन दोनों ज़िलों में वोटिंग 11 फरवरी को होगी. कैराना से हिंदुओं के कथित पलायन और दादरी में अख़लाक़ अहमद की हत्या की वजह से यह पूरा इलाक़ा सांप्रदायिक आधार पर और ज्यादा बंट गया है. 

इन इलाक़ों में भाजपा के स्टार प्रचारक सांसद योगी आदित्यनाथ और संजीव बालियान हैं जो अपने मुस्लिम विरोधी बयानों के लिए कुख्यात हैं. सुरेश राणा उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष और थाना भवन सीट से विधायक हैं. हाल ही में इन्होंने कहा था कि अगर वह जीते तो मुस्लिम बाहुल्य कैराना, देवबंद और मुरादाबाद जैसे इलाक़ों में कर्फ्यू लगवा देंगे. 

पहले चरण में बाग़पत, मेरठ, गाज़ियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, आगरा, फिरोज़ाबाद, एटा और कासगंज जैसे ज़िलों में मतदान किया जाएगा. 2.28 करोड़ से ज़्यादा वोटर सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, सम्भल, रामपुर, बरेली, अमरोहा, पीलीभीत, खीरी, शाहजहांपुर और बदायूं आदि ज़िलों में 15 फरवरी को वोटिंग करेंगे. 

मुस्लिम वोटर किंगमेकर

सबसे ज़्यादा मुसलान 49.14 फीसदी रामपुर में हैं. इसके बाद मुरादाबादा/सम्भल में 45.54 फीसदी और बिजनौर में 41.71 फीसदी हैं. अमरोहा, सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, बरेली और मेरठ जैसे ज़िलों में मुसलमानों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है. लिहाज़ा, माना जा रहा है कि इतनी बड़ी संख्या होने के नाते मुस्लिम मतदाता पहले दो चरणों में किंगमेकर की भूमिका निभाएंगे. 

पूरे राज्य में मुसलमानों की आबादी 18 फीसदी से ऊपर है और भाजपा को छोड़कर सभी राजनीतिक दल इन पर नज़र गड़ाए हुए हैं. लोकसभा चुनावों की तर्ज़ पर भाजपा ने विधानसभा चुनाव में भी 403 सीटों पर किसी मुसमलान को टिकट नहीं दिया है और ध्रुवीकरण की हर मुमकिन कोशिश में लगी हुई है. 

1993 में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 31 मुस्लिम विधायक थे और 2012 में इनकी संख्या 68 हो गई है. इनमें से ज़्यादातर एमएलए इन्हीं 140 सीटों पर चुनकर आते हैं. भाजपा का डर दिखाने वाली बसपा, सपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों को मुसलमान आसानी से स्वीकार कर लेते हैं. 

2012 में चुनकर आए 68 विधायकों में सबसे ज्यादा 43 सदस्य सपा के टिकट पर चुनकर आए थे. जबकि बसपा के टिकट पर 15 और कांग्रेस के टिकट पर 4 विधायकों को जीत मिली थी. 

सपा की राह मुश्किल

बावजूद इसके, समाजवादी पार्टी के लिए मुस्लिम समुदाय में अपनी पकड़ बनाए रख पाना इस बार उतना आसान नहीं होगा. 2013 में हुए दंगों के बाद मुसलमान सपा पर आरोप लगाते रहे हैं कि सपा की हुकू़मत में वे बेघर होने और कैंपों में रहने के लिए मजबूर हुए हैं. वहीं मुलायम सिंह यादव ने तभी कहा था कि पीड़ित मुसलमान एक राजनीतिक दल के हुक्म के बाद से शरणार्थी कैंपों में रह रहे हैं. 

सपा पर दूसरी मार जाट समुदाय की तरफ से पड़ सकती है. भारतीय किसान यूनियन अखिलेश सरकार से इस बात पर नाराज़ थी कि उसने उन मु्स्लिम नेताओं पर मुकदमा दर्ज क्यों नहीं किया जिन्होंने दंगों के दौरान गड़बड़ी फैलाई. 

इस चुनाव में कांग्रेस को मुस्लिम मतदाताओं का थोड़ा बहुत फायदा मिल सकता है क्योंकि मुसलमान ऐसे उम्मीदवार को वोट देंगे जो भाजपा के उम्मीदवार पर भारी पड़े. वहीं भाजपा को यह उम्मीद है कि अलग-अलग दलों के उम्मीदवारों में वोट बंटने से उसे जीत मिल जाएगी.

भाजपा के बागी उम्मीदवारों को टिकट देकर रालोद ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं जिसका असर नतीजों पर दिखेगा.

सत्ता में वापसी के लिए लगीं मायावती ने 99 मुस्लिम और 113 सवर्ण जातियों के उम्मीदवारों को टिकट दिया है. ऐसा इसलिए क्योंकि मायावती समाज के सभी वर्गों में बराबरी का संदेश देना चाहती हैं. यह चुनाव उनके नए दांव दलित-मुस्लिम समीकरण का नतीजा देखने के लिहाज़ से भी दिलचस्प होगा. 

टिकट बंटवारे को लेकर भाजपा में जारी कलह भी पार्टी को भारी पड़ सकती है क्योंकि बहुत सारे बाग़ी उम्मीदवारों को रालोद ने मैदान में उतार दिया है. ज़ाहिर है कि इससे भाजपा के जाट वोटरों पर विपरीत असर पड़ेगा. भाजपा हिंदू वोटरों को अपना सबसे बड़ा वोट बैंक मान रही है.

हाल ही में 35 खाप पंचायतों ने भाजपा के खिलाफ धरना देकर जाटों के लिए आरक्षण की मांग की है. जाटों ने ऐलान भी कर दिया है कि वे भाजपा को हराने के लिए वोट देंगे. अगर भविष्य में कोई तिकड़म नहीं होती है तो भाजपा के लिए 2014 में किए गए क्लीन स्वीप को दोहराना मुश्किल हो जाएगा. 

First published: 9 February 2017, 7:40 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी