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बुआ-भतीजा का गठजोड़ अगर साकार होगा तो स्वर्ग में बैठे कांशीराम बहुत खुश होंगे

अतुल चौरसिया | Updated on: 10 March 2017, 12:52 IST
कैच न्यूज़

इस लेख को आगे बढ़ाने से पहले दो छोटी बातें जान लेते हैं. मई, 2012 में अखिलेश यादव जब ताजा-ताजा मुख्यमंत्री बने थे उसी समय कुछ उग्र सपा कार्यकर्ताओं ने आंबेडकर पार्क में लगी मायावती की एक मूर्ति को तोड़ दिया था. मुख्यमंत्री ने घटना के तूल पकड़ने से पहले ही न सिर्फ नई मूर्ति लगवा दिया बल्कि मायावती को व्यक्तिगत रूप से फोन करके उन्हें आश्वस्त किया. बदले में मायावती ने भी खुशी जताई और बसपा द्वारा पूरे प्रदेश में इसका विरोध करने के लिए प्रस्तावित सड़क जाम को स्थगित कर दिया.

इस घटना से कुछ ही दिन पहले, 2012 के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के ठीक बाद अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री बने थे उस वक्त इस लेख के लेखक को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि उनकी सरकार बदले की भावना से कोई काम नहीं करेगी. मायावती द्वारा बनवाए गए पार्क और मूर्तियों को कतई हटाया नहीं जाएगा. हां, हम इनके जनता के लिए व्यापक इस्तेमाल के बारे में विचार कर सकते हैं.

इन दोनों कहानियों के जिक्र करने का एक मकसद है. असल में सपा-बसपा के रिश्ते उतने सहज नहीं रहे हैं, लेकिन अखिलेश यादव ने सत्ता संभालने के बाद उन्हें सहज करने की कोशिशें की हैं. राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी स्थायी नहीं होती लेकिन सपा-बसपा की दुश्मनी ने इस कथन को झूठा साबित किया है वो भी पूरे 22 साल. इसे समझने के लिए दोनों दलों के अतीत को समझना होगा.

साल 1993 में कांशीराम की सोच और प्रयास से उत्तर प्रदेश में दलितों, मुसलमानों और पिछड़ों का ऐसा राजनीतिक गठजोड़ बना था जिसने उस समय उभार पर चल रही भाजपा का बिस्तर गोल कर दिया था. उस दौर में एक नारा लगता था- 'मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जय श्री राम'. हालांकि 1993 में बना सपा-बसपा का गठजोड़ दो साल के भीतर ऐसे मुकाम पर पहुंच गया जहां से दोनों दलों के रिश्ते फिर कभी सुधर नहीं पाए.

1995 में लखनऊ में गेस्ट हाउस कांड हुआ. 2 जून, 1995 को बसपा ने तत्कालीन सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इस वजह से मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई. सरकार को बचाने के लिए सपा जोड़-तोड़ करने लगी. अंत में जब बात नहीं बनी तो नाराज सपा के कार्यकर्ता और विधायक लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस पहुंच गए. वहां मायावती कमरा नंबर-1 में ठहरी हुई थीं. सपा के कुछ बाहुबली विधायकों ने बसपा सुप्रीमो को कमरे में बंद करके मारा-पीटा और उनके कपड़े फाड़ दिए. कहा जाता है कि सपा के विधायकों और नेताओं ने मायावती को जान से मारने की कोशिश की थी.

उस वक्त फर्रूखाबाद से भाजपा के एक नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी हुआ करते थे. उन्होंने किसी तरह से मायावती को गेस्ट हाउस से सुरक्षित बाहर निकाला. मायावती अपने अपमान को कभी भुला नहीं सकीं. मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे लिहाजा मायावती ने यही माना कि यह सब उनके इशारे पर हुआ है. नतीजतन सपा-बसपा का गठबंधन टूट गया. इस गठजोड़ के टूटने का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को हुआ. उसे उत्तर प्रदेश में फिर से राजनीतिक ऑक्सीजन मिल गई.

नए समीकरण की आहट

इन 22 सालों में सपा-बसपा एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाए. अब जब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और नतीजों का इंतजार है तब एक बार फिर से उस पुराने गठजोड़ के आकार लेने की सुगबुगाहट है. इसकी एक वजह सपा और बसपा दोनों के चुनाव में खराब प्रदर्शन की अटकलों को माना जा रहा है. बीबीसी हिंदी वेबसाइट को दिए गए एक साक्षात्कार में अखिलेश यादव ने कहा है- 'अगर उत्तर प्रदेश को भाजपा रिमोट कंट्रोल से चलाने की कोशिश करेगी तो सपा उसे रोकने के हर जरूरी उपाय करेगी.'

अखिलेश के इस बयान को राजनीतिक पंडितों ने बसपा की ओर हाथ बढ़ाने के संकेत के रूप में लिया है. 22 साल बाद सपा-बसपा के गठजोड़ की अटकलें बीते एक-दो महीनों से हवा में थी हालांकि उसकी एक शर्त यही थी कि यह गठजोड़ अगर आकार लेगा भी तो यह चुनाव बाद की परिस्थितियों में ही संभव होगा.

मौजूदा परिस्थिति में सपा-बसपा के गठजोड़ के आकार लेने की सबसे मुफीद परिस्थितियां हैं. 1993 में जिस तरीके से भाजपा ताकतवर थी कमोबेश वही स्थिति आज फिर से भाजपा की है. अगर सपा-बसपा का गठजोड़ होता है तो भाजपा एक बार फिर से उत्तर प्रदेश में अप्रासंगिक हो सकती है.

फाइल फोटो

मायावती और अखिलेश की स्थिति

तो क्या यह गठजोड़ संभव है? इसके दो पक्ष हैं, मायावती और अखिलेश. लिहाजा इसे दोनों के नजरिए से समझना होगा. 1995 में सपा-बसपा का गठजोड़ टूटने की वजह क्या थी? इसकी दो प्रमुख वजहें मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव थे. मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे जबकि शिवपाल के बारे में माना जाता है कि उन्हीं की अगुवाई वाले आपराधिक चरित्र के दंबंग नेताओं ने मायावती के ऊपर हमला किया था.

आज न तो मुलायम सिंह यादव सपा में सक्रिय रह गए हैं न ही शिवपाल यादव की सपा में कोई हैसियत है. जिन दूसरे नेताओं ने मायावती पर हमला किया था उनसे अखिलेश कमोबेश पहले ही अपराधी होने के नाम पर पल्ला झाड़ चुके हैं. ऐसे कई नेता तो भाजपा में भी शामिल हो चुके हैं, जैसे आजमगढ़ के बाहुबली नेता रमाकांत यादव जो फिलहाल भाजपा में है और लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं.

यानी मायावती की सपा से नाराजगी की दोनों वजहें आज लगभग खत्म हो चुकी हैं. और जब सवाल सियासी अस्तित्व को बचाए रखने का हो तो शायद मायावती भी इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहेंगी. और मायावती के लिए इससे बेहतर बदला क्या होगा कि जिन मुलायम सिंह यादव से उनकी दुश्मनी थी उनका बेटा ही उनसे रिश्ता तोड़कर मायावती से संबंध आगे बढ़ाए.

अब हम अगर इस गठजोड़ की संभावना को अखिलेश यादव के नजरिए से देखें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है. हाल के दिनों में अखिलेश ने लंबी पारिवारिक लड़ाई लड़कर पार्टी पर अधिकार जमाया है. ऐसी स्थिति में अगर वे चुनाव हारते हैं तो परिवार का झगड़ा फिर से सिर उठाएगा. अखिलेश यादव विपक्ष में या सत्ता से बाहर रहते हुए पार्टी और परिवार, दोनों की खींचतान को संभाल नहीं सकते. अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए उन्हें हर हाल में सत्ता चाहिए या फिर सत्ता में भागीदारी चाहिए.

...और अब साधना गुप्ता

मुलायम सिंह यादव की पत्नी साधना गुप्ता ने एक हफ्ते पहले ही यह बयान देकर अखिलेश के माथे पर बल डाल दिया है कि अब वे चुप नहीं बैठेंगी. परिवार से जुड़े सूत्रों का यह भी कहना है कि साधना गुप्ता हर हाल में अपने बेटे प्रतीक यादव के लिए राजनीतिक विरासत में हिस्सेदारी चाहती है. उनके मन में यह बात भी है कि अखिलेश यादव ने उन्हें अपमानित किया है.

चुनाव हारने की स्थिति में अगर साधना गुप्ता इस तरह का कोई मोर्चा खोलती हैं तो यह बात तय है कि मुलायम सिंह यादव साधना गुप्ता का ही साथ देंगे. शिवपाल सरीखे लोग तो मुलायम के पक्ष में होंगे ही. तब अखिलेश यादव अकेले पड़ सकते हैं. इस तरह की किसी भी स्थिति से बचने के लिए अखिलेश यादव हर वो कोशिश करेंगे जिससे सत्ता में उनकी भागीदारी बनने वाली नई सरकार में सुनिश्चित हो सके.

मायावती के लिहाज से एक संशय की स्थिति ये रहती है कि वे भाजपा के साथ मिलकर भी सरकार बना सकती हैं. अतीत में वो तीन बार ऐसा कर चुकी हैं. लेकिन एक बार और भाजपा के साथ जाना मायावती और बसपा के लिए राजनीतिक हारा किरी सिद्ध होगा. इस चुनाव में उन्होंने बड़ी मेहनत से दलित-मुस्लिम गठजोड़ खड़ा करने की कोशिश की है. ऐसे में भाजपा के साथ कोई भी रिश्ता उनके सियासी सफर का अंत साबित हो सकता है.

मौजूदा चुनाव के नतीजों में अगर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है तो सपा-बसपा का मेल दोनों के लिए जीवनदायी राजनीतिक विकल्प होगा क्योंकि यह वजूद बचाए रखने की भी लड़ाई है.

अखिलेश यादव और मायावती के बीच रिश्तों पर अगर थोड़ी नजर डालें तो अखिलेश यादव ने हमेशा उन्हें बुआजी कहा है. बदले में कई बार मायावती ने भी उन्हें भतीजा औऱ बबुआ कहा है. इस रिश्ते की राजनीति में हमेशा हास्य ही रहा है कोई तल्खी नहीं रही है. इसके अलावा अखिलेश के सबसे भरोसेमंद करीबी, चाचा रामगोपाल यादव इस पूरे दौर में मायावती और अखिलेश के बीच परदे के पीछे सेतु बने रहे हैं.

आज से दो महीने पहले कैच के न्यूज़रूम में इस तरह के गठजोड़ की संभावना पर दो पत्रकारों के बीच बेहद गंभीर बहस हुई थी. चुनाव बीतते-बीतते यह बहस सच होती दिख रही है.

अगर सपा-बसपा का गठजोड़ फिर से आकार लेता है तो स्वर्ग में कहीं कांशीराम बहुत खुश होंगे.

First published: 10 March 2017, 7:43 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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