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अगली लड़ाई ‘साइकिल’ के लिए चुनाव आयोग में लड़ी जाएगी

रंजीव | Updated on: 31 December 2016, 8:08 IST

समाजवादी पार्टी की कलह में अब तक मुख्य रूप से तीन केन्द्र रहे हैं. तीनों बमुश्किल एक किलोमीटर के दायरे में. इनमें से दो लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग पर- समाजवादी पार्टी का प्रदेश मुख्यालय अौर दूसरा इसी मार्ग पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का अावास. तीसरा केन्द्र इन दोनों ठिकानों के ठीक पीछे वाली सड़क यानी कालिदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का सरकारी अावास.

किसी चमत्कार की तरह सुलह-समझौता नहीं हो सका लिहाजा अब तक के तीन ठिकानों से निकल कर यह विवाद दो नए ठिकानों तक पहुंच सकता है. एक, लखनऊ का राजभवन अौर दूसरा दिल्ली में चुनाव अायोग का दफ्तर.

गए कुछ महीनों से पार्टी के भीतर एक-दूसरे को मात देने की रणनीतियों, स्क्रिप्ट अौर फैसलों को लखनऊ के तीन ठिकानों से अंजाम दिया गया. जिसकी चरम परिणति शुक्रवार शाम को खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के रूप में सामने अाई. मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव के साथ प्रो. रामगोपाल यादव को भी पार्टी से छह साल के लिए निकाल दिया. दोनों पर अारोप यह है कि उन्होंने पार्टी संविधान के परे जाकर लखनऊ में एक जनवरी को सपा का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने की पहल की.

अारोप-प्रत्यारोप अौर निष्काषनों के बाद अगला बड़ा प्रश्न यह है कि समाजवादी पार्टी में अब क्या होगा? सपा से निकाले जाने के बाद भी अखिलेश यादव सपा विधानमंडल दल के नेता के रूप में मुख्यमंत्री बने रह सकेंगे? एक जनवरी को बुलाए गए राष्ट्रीय अधिवेशन की अहमियत क्या है? क्यों इसके अायोजन से सपा मुखिया इतने खफा हो गए कि अखिलेश को भी पार्टी से निकाल दिया?

दरअसल इन सवालों के जवाब में ही सपा के सत्ता संग्राम में अागे की राह खुलेगी. अगले अड़तालीस घंटों में इसके संकेत मिलेंगे कि कौन ताकतवर होकर उभरा अौर किसने ताकत गंवाई. अौर यहीं से यह लड़ाई लखनऊ के राजभवन अौर दिल्ली में चुनाव अायोग के दफ्तर भी पहुंच सकती है.

राजभवन की भूमिका

राजभवन यानी राज्यपाल की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि अखिलेश यादव के अब सपा में अब न होने के हवाले से उनके मुख्यमंत्री बने रहने पर सवाल खड़ा करते हुए समाजवादी पार्टी विधानमंडल दल का नया नेता चुन सकती है. इसे भांपते हुए ही अखिलेश ने कल सुबह सभी विधायकों की बैठक बुलाई है.

इस बात की संभावना है कि इस बैठक में बहुमत का प्रस्ताव पारित करवाया जाए कि विधायक अभी भी अखिलेश यादव को ही नेता मानते हैं. चूंकि कई विधायक चुनाव में अखिलेश यादव का साथ चाहेंगे इसलिए संभव है कि वे उन्हें ही नेता मान लें. अखिलेश की बुलाई बैठक के एक घंटे बाद मुलायम ने अब तक घोषित सभी प्रत्याशियों की बैठक बुलाई है जिसमें करीब पौने दो सौ मौजूदा विधायक भी हैं.

अगर इनमें से कई मुलायम की बैठक में पहुंच गए तो इस संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा कि अखिलेश को विधानमंडल दल के नेता पद से हटा कर नया नेता चुनने की पहल हो. ऐसा हुअा तो मामला राजभवन पहुंचेगा अौर राज्यपाल को दोनों धड़ों के बीच बहुमत किसके पास है, इसका निर्णय करवाने के लिए विधानसभा की बैठक बुलाने पर फैसला लेना होगा.

एक अटकल यह भी चल रही है कि पार्टी और सरकार को किसी विघटन से बचाने के लिए खुद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री का पद संभाल सकते हैं. ऐसा होने की सूरत में हो सकता है कि ज्यादातर विधायक उनके पाले में आ जाएं.

संभावना है कि आज की बैठक में प्रस्ताव पारित करवाया जाए कि विधायक अभी भी अखिलेश यादव को ही नेता मानते हैं

क्या वह ऐसा करेंगे? राज्यपाल राम नाइक की शुक्रवार देर शाम की प्रतिक्रिया से इसके संकेत कम ही लगते हैं. उन्होंने कहा कि प्रदेश में कोई संवैधानिक संकट नहीं है अौर जो हो रहा वह पार्टी का अंदरूनी मामला है. फिलहाल संवैधानिक संकट न होने की उनकी टिप्पणी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने की संभावनाअों को भी कम करती है लेकिन खारिज नहीं.

यदि सपा की रार बढ़ी अौर दोनों खेमे अपने साथ बहुमत होने का दावा करते है और इसका असर सरकार अौर प्रशासन पर पड़ने लगे तो राज्यपाल को हस्तक्षेप करना पड़ेगा. इसलिए भी क्योंकि प्रदेश में चुनाव होने हैं अौर चुनाव अायोग को प्रशासनिक जरूरतों व फैसलों के लिए स्थिर सरकार की जरूरत होगी. उसमें व्यवधान पड़ने की अाशंका हुई तो राजभवन की अोर से राष्ट्रपति शासन के विकल्प पर विचार किया जा सकता है.

अलबत्ता इतना तय है कि राष्ट्रपति शासन के मुद्दे पर केन्द्र सरकार हड़बड़ी में कोई फैसला नहीं करेगी क्योंकि हाल ही में उत्तराखंड अौर अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन का उसका फैसला शीर्ष अदालत को रास नहीं अाया था.

दूसरी लड़ाई

मुख्यमंत्री की कुर्सी अौर सरकार पर नियंत्रण के अलावा समाजवादी पार्टी के दोनों धड़ों के बीच दूसरी बड़ी लड़ाई संगठन पर कब्जे को लेकर लड़ी जाएगी अौर इसलिए अखिलेश व रामगोपाल की अोर से एक जनवरी को लखनऊ में बुलाया गया अधिवेशन अहम हो जाता है, जिसे मुलायम सिंह ने पार्टी संविधान के खिलाफ बता कर पार्टी के नेताअों, पदाधिकारियों व कार्यकर्ताअों से इसमें न जाने की अपील की है. उन्होंने कहा है कि अभी उनका पूरा लक्ष्य पार्टी बचाने पर है.

सपा के सूत्रों के मुताबिक चालीस फीसदी पदाधिकारियों की लिखित अनुशंसा पर अधिवेशन बुलाया जा सकता है

वहीं रामगोपाल यादव ने कहा है कि अधिवेशन संविधानसम्मत है क्योंकि पार्टी में कई अंसवैधानिक काम होने लगे थे लिहाजा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पदाधिकारियों की अपील पर इसका अायोजन किया जा रहा है. पार्टी संविधान की जानकारी रखने वाले सपा के सूत्रों के मुताबिक चालीस फीसदी पदाधिकारियों की लिखित अनुशंसा पर अधिवेशन बुलाया जा सकता है.

सूत्रों के मुताबिक अखिलेश अौर रामगोपाल के खेमे के पास फिलहाल राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पचास फीसदी सदस्यों का समर्थन हासिल हो चुका है. यदि इस अधिवेशन में बड़ी संख्या में पार्टी के पदाधिकारी पहुंच गए तो इस खेमे को मनोवैज्ञानिक बढ़त तो मिलेगी ही साथ ही इसमें नेतृत्व परिवर्तन का प्रस्ताव भी पास किया जा सकता है.

अखिलेश की कोशिश यही रहेगी क्योंकि अगर वो नेतृत्व परिवर्तन करवा सके तो इसके जरिए पार्टी अौर उसके चुनाव चिह्न साइकल पर भी उनका कब्जा हो जाएगा. अाने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर दोनों धड़ों के लिए यह बेहद जरूरी है और यहीं पर चुनाव अायोग की भूमिका अहम हो जाएगी.

चुनाव आयोग की भूमिका

यदि अखिलेश अौर रामगोपाल का खेमा सपा में नेतृत्व परिवर्तन का प्रस्ताव पारित करवा कर साइकल चुनाव चिह्न पर कानूनी रूप से हक जताने के लिए चुनाव अायोग पहुंचता है अौर अायोग इसकी सहमति जताता है तो वैसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से मुलायम सिंह-शिवपाल अापत्ति दर्ज करवाएंगे.

अायोग में विवाद का निपटारा न हुअा अौर चुनाव में प्रत्याशियों के नामांकन की तारीख अा पहुंची तो अायोग साइकिल चुनाव चिह्न को विवाद पर अंतिम फैसला होने तक फ्रीज कर सकता है(यानी दोनो पक्षों से इसे वापस ले सता है).

ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग दोनों पक्षों को अलग-अलग चिन्ह पर अपने प्रत्याशियों को लड़ाने के लिए कहेगा. यह स्थिति भी अखिलेश यादव के लिहाज से फायदेमंद रहेगी.

यानी परिवार और नेताअों की आपसी खींचतान से निकल कर अब इस समाजवादी संग्राम के संविधान के नियमों अौर कानून की धाराअों, उसकी व्याख्याअों में उलझने के पूरे अासार हैं.

First published: 31 December 2016, 8:08 IST
 
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