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सपा-कांग्रेस गठबंधन से अजित सिंह की आरएलडी आउट

सादिक़ नक़वी | Updated on: 20 January 2017, 3:03 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख शनिवार, 21 जनवरी है. इस संबंध में अब तक जो संकेत मिले हैं वो यही कहते हैं कि इस चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन में राष्ट्रीय लोक दल नहीं होगा. 

समाजवादी पार्टी के उपाध्यक्ष किरणमोय नंदा ने गुरुवार को एक बयान जारी कर यह साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी 300 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेगी और 403 विधानसभा सीटों में से शेष सीटों पर गठबंधन सहयोगी पार्टी के रूप में कांग्रेस अपने उम्मीदवार खड़ा करेगी.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सपा के एक संभावित उम्मीदवार कैच टीम को बताया कि दोपहर तक हमें यही जानकारी मिली है कि पार्टी इस बार अकेले ही चुनाव लड़ने जा रही है. सूत्रों से जो खबर मिली है वह यही है कि आरएलडी 22-23 सीटों पर लड़ने के प्रस्ताव से खुश नहीं थी और सपा या कांग्रेस इससे अधिक कोई सीट उसके लिए छोड़ने को तैयार नहीं थे. 

सूत्रों ने बताया कि आरएलडी की सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस से तो एक सहमति बन चुकी थी लेकिन इस संबंध में सपा से सीधे उसकी कोई बात नहीं हो सकी. दरअसल कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर चाहते थे कि आरएलडी इस गठबंधन का सदस्य हो.

सपा ने दे दिया था संकेत

सपा के साथ गठबंधन के संबंध में चर्चा तो समाजवादी पार्टी की 25वीं सालगिरह पर 6 नवंबर को लखनऊ में हुए समारोह और रैली के दौरान ही लगभग समाप्त हो गई थी, जबकि अजित सिंह, मुलायम सिंह यादव और जनता परिवार के दूसरे सदस्य एक साथ मंच पर बैठे थे. इस समारोह के दूसरे ही दिन मुलायम सिंह ने आरएलडी को साफ संदेश देते हुए यह घोषणा कर दी थी कि चुनाव में किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं होगा और जो भी पार्टी सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत करना चाहती है वह सपा में अपना विलय कर सकती है.

इस रैली से पूर्व, सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव आरएलडी नेतृत्व से गठबंधन को लेकर चर्चा कर रहे थे. लेकिन इस रैली के बाद आए मुलायम सिंह के वक्तव्य और इसके बाद सपा में शुरू हुए गृह युद्ध के जैसे हालात में इस तरह की किसी चर्चा की कोई संभावना नहीं रह गई.

इसके बाद नवंबर में समाजवादी पार्टी को दबाव में लेने के लिए जनता दल यूनाइटेड और आरएलडी ने संयुक्त वक्तव्य जारी किया था कि वे दोनों मिलकर चुनाव लड़ेंगे. 

नहीं आया कोई प्रोपोज़ल

लेकिन जब यह साफ होता जा रहा था कि मुलायह सिंह यादव के हाथ से सपा की कमान निकल चुकी है, ऐसे में आरएलडी नेतृत्व को उम्मीद थी कि वह गठबंधन का हिस्सा बनकर अच्छी मात्रा में सीटों पर चुनाव लड़ सकेगी. लेकिन आरएलडी सूत्रों का कहना है कि पूरे दिसंबर तक किसी भी पक्ष से उनके पास सीटों के बंटवारे या गठबंधन को लेकर कोई ठोस प्रस्ताव नहीं आया. 

हालांकि आरएलडी सूत्रों का कहना है कि अखिलेश की टीम की ओर से कुछ सकारात्मक संकेत उन्हें मिल रहे थे. चुनाव आयोग की 13 जनवरी की उस सुनवाई से ठीक पहले जिसमें यह तय होना था किस खेमे को साइकिल का चुनाव चिह्न मिलेगा, अखिलेश खेमे के कुछ सदस्यों ने आएलडी से संपर्क कर उसे कुछ दिन और इंतजार करने के लिए कहा था. सूत्रों का दावा है कि इसी दौरान मुलायम खेमे ने भी उनसे संपर्क किया था.

बीजेपी ने भी किया संपर्क

दरअसल भाजपा की पहली सूची जारी होने से पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी आरएलडी से संपर्क किया था. सूत्रों का कहना है कि भाजपा ने आरएलडी को 20 से भी कुछ कम सीटों का प्रस्ताव दिया था या फिर भाजपा में विलय का भी प्रस्ताव था. लेकिन आरएलडी सूत्रों का दावा है कि भाजपा से गठबंधन को लेकर पार्टी में कभी आम राय नहीं बनी. पार्टी नेतृत्व का सोचना है कि भाजपा से गठबंधन पार्टी के लिए खात्मे को न्योता देना होगा, क्योंकि इसके बाद पार्टी के साथ जो थोड़ा भी मुस्लिम मतदाता जुड़ा हुआ है वह उससे हमेशा के लिए कट जाएगा और साथ ही पार्टी के लिए जाट वोटों का ट्रांसफर करना मुश्किल हो जाएगा.

कांग्रेस से बातचीत

सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस, जो अब सपा के साथ गठबंधन में 105 से 108 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है, ने उसे 22 से 23 सीटों का प्रस्ताव दिया था. लेकिन कैच टीम को आरएलडी सूत्रों ने बताया कि पार्टी नेतृत्व इतनी कम सीटों के लिए कतई तैयार नहीं था. यही वजह थी कि इस संबंध में कोई चर्चा और आगे नहीं बढ़ी. इसके अतिरिक्त कुछ सीट विशेष पर भी दलों में मतभेद थे. उदाहरण के लिए, शामली सीट. यहां कांग्रेस का विधायक है पर आरएलडी भी इस सीट को नहीं छोड़ना चाहती थी.

गिरावट की ओर

2012 के विस चुनाव में आरएलडी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में 46 सीटों पर चुनाव लड़ा था और पार्टी को औसतन उन सीटों पर 20 प्रतिशत वोट मिले थे. लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पार्टी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसकी संभावनाओं को झटका लगा है. जाट-मुस्लिम किसानों का जो वोट बैंक पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने तैयार किया था, वह इन दंगों के बाद बिखर गया. 

दंगों के कारण जाटों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में निष्ठा बदलते हुए भाजपा का साथ दिया और उसे 80 में से 73 सीटों पर जीत मिलीं. इसका नतीजा यह हुआ कि जिस आरएलडी को 2012 के विस चुनाव में लगभग 18 लाख वोट मिले थे 2014 के लोकसभा चुनाव में उसके वोट मात्र छह लाख ही रह गए.

दरअसल, आरएलडी के प्रदर्शन में यह गिरावट एक दशक से दर्ज की जा रही है. 2007 के चुनाव में पार्टी को 61 प्रतिशत जाटों के वोट मिले थे, जो कि 2012 के चुनाव में 45 प्रतिशत ही रह गए. मुस्लिम वोटों के संबंध में भी पार्टी के साथ ऐसा ही हुआ है. 2007 में पार्टी को 8 प्रतिशत मुस्लिमों ने वोट दिया था जबकि 2012 में यह वोट मात्र 1 प्रतिशत रह गया.

जाटों के वोट आएंगे एक साथ

यह आरएलडी का खराब होता प्रदर्शन ही है, जिसके कारण समाजवादी पार्टी का कोई भी खेमा मुलायम या अखिलेश, आरएलडी के साथ गठबंधन का बहुत इच्छुक नहीं था. दरअसल गन्ना बेल्ट कहे जाने वाले इस क्षेत्र में मुस्लिम एक प्रमुख मतदाता समुदाय है और समाजवादी पार्टी को डर था कि अगर वह आरएलडी के साथ गठबंधन करती है तो आएलडी की जाट छवि को देखते हुए मुजफ्फरनगर दंगों के बाद के जाट-मुस्लिम तनाव के माहौल में मुस्लिम उससे बिदक सकते हैं.

कैच के इस रिपोर्टर को माह की शुरुआत में ही सपा के एक मुस्लिम सांसद ने बताया था कि ऐसे हालात में आरएलडी के साथ गठबंधन का मतलब होगा बसपा को मुस्लिम वोट बैंक उपहार में दे देना. इस सांसद का कहना था कि जब अजित सिंह चुनाव क्षेत्र में जाते हैं तो उनकी जाट पहचान ही प्रमुखता से सामने आती है और इससे हमारी संभावनाओं को नुकसान पहुंचता है. दरअसल बसपा इस बार सपा के मुस्लिम वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने की हर संभव कोशिश कर रही है और इसको ध्यान में रखते हुए उसने 95 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दी है.

वहीं आरएलडी को भरोसा है कि इस बार जाट वोट बैंक वापस उसके साथ आ जाएगा, क्योंकि 2014 के चुनाव में भाजपा को वोट देने के बाद जाट समुदाय उसके बाद हुए घटनाक्रम से खुश नहीं है, विशेष रूप से जाटों को आरक्षण के मुद्दे को लेकर.

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आरएलडी इस समय एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति में है. उनको लगता है कि इस बार के चुनाव में अकेले चुनाव लड़ना ही संभवत: सबसे बेहतर रणनीति होगी. इससे पार्टी अपने जाट वोट बैंक को एकजुट कर सकेगी जिससे वह 2019 के लोकसभा के चुनाव में कहीं अधिक प्रासंगिक बन सकेगी.

First published: 20 January 2017, 3:03 IST
 
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