Home » उत्तर प्रदेश चुनाव » Polarisation card of BJP didn't work in second phase too
 

दूसरे चरण में भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का अस्त्र नहीं चला

सादिक़ नक़वी | Updated on: 16 February 2017, 7:53 IST

‘बिजनौर में हुई हत्या से इस क्षेत्र के चुनावों में अलग ही मोड़ आने की संभावनाएं बनी हैं.’ चांदपुर में एक आरएलडी कार्यकर्ता ने कैच को यह बात उस समय कही, जब शनिवार को पार्टी के महासचिव जयंत चौधरी जन सभा को संबोधित करने वाले थे.

हत्या 10 फरवरी को हुई थी नया गांव में, जो कि बिजनौर के जिला मुख्यालय के कुछ किलोमीटर दूर है. यहां जाट प्रधान संजय सिंह और उनके बेटे विशाल सिंह पर हमलावरों ने गोली चलाई और धारदार हथियारों से हमला किया था. हमले का आरोप पड़ोसी पेदा गांव के अल्पसंख्यकों पर लगाया गया. 6 महीने पहले यहां अल्पसंख्यक समुदाय के तीन लोग मारे गए थे तब से ही पूरा कस्बा तनाव में था.

आरएलडी कार्यकर्ता ने कहा, ‘स्थिति नियंत्रण में थी. भाजपा उसका इस्तेमाल वोट के लिए करना चाहती थी. वैसे पार्टी खुलकर सामने नहीं आना चाहती थी क्योंकि जाट की हत्या का मामला था. उसने अपने कार्यकत्ताओं को अप्रत्यक्ष संदेश भेजा, यह सुनिश्चित करने के लिए हालात शांत हो जाएं.’

हालांकि स्थानीय लोगों का कहना था कि जिस तरह से भाजपा हत्या को भुनाना चाहती थी, उससे अल्पसंख्यक समुदाय बसपा रशीद अहमद की बजाय मौजूदा सपा विधायक रुचि वीरा के पक्ष में चला गया. स्थानीय कारोबारी फरहान अहमद कहते हैं, ‘अपनी दूकान पर मैं कई लोगों से मिलता रहा हूं. घटना के बाद वे कह रहे थे कि वे अपने वोट बर्बाद नहीं जाने देंगे और सपा को वोट करेंगे.’

रैली फोर्स 2.0

सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा, संभल, बरेली आदि जिलों में दूसरे चरण का चुनाव हो गया है. यहां पिछले विधानसभा चुनावों में सपा का प्रदर्शन प्रभावी रहा था. हालांकि पिछले लोकसभा चुनावों में ये सभी सीटें भाजपा को चली गईं. इस क्षेत्र में, जहां ज्यादातर जिले मुसलमान बहुल हैं, भाजपा जीतने के लिए ‘अन्य’ वोट बैंक को मजबूत बनाने की कोशिश कर रही है.

अमरोहा में कांग्रेस नेता खुशतार मिर्जा ने दावा किया, ‘आरएसएस अमरोहा के नौगावां निर्वाचन क्षेत्र में सक्रिय है. यह लोगों से गंगा जल लेकर प्रतिज्ञा करने को कह रही है कि वे पार्टी के लिए वोट करेंगे. इस निर्वाचन क्षेत्र में अखिलेश के करीबी सहयोगी जावेद अदबी पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं. चेतन भाजपा से खड़े हुए हैं.’

योगी आदिनाथ जैसे भाजपा नेता इस क्षेत्र में ज्यादा मेहनत कर रहे हैं, ताकि उन्हें अच्छे वोट मिल जाएं. मसलन चेतन चौहान कैंपेन में कहते रहे हैं कि सपा ने केवल एक समुदाय-मुसलमान के लिए काम किया और औरों की परवाह नहीं की.

आसान नहीं रास्ता

पर स्थिति मजबूत करना आसान नहीं है. अमरोहा की सड़क पर नेशनल हाइवे 24 से थोड़ा दूर बांसों का मेहराबदार गांव के राजिंदर कुमार कहते हैं, ‘पिछले चुनावों में हमने नरेंद्र मोदी को वोट दिया था. इस बार हम उन्हें जाटों के वोटों का मोल बताना चाहते हैं. हमारे वोटों के बिना वे जीत नहीं सकेंगे.’

पंजाब नेशनल बैंक के पास चाय की एक दुकान पर बैटे रमेश यादव ने पूछा, ‘भाजपा को वोट तब मिलते हैं जब धार्मिक पहचान का मसला बनता है. जन-विरोधी नीतियों के लिए लोग भला उन्हें क्यों वोट करेंगे?’ बैंक के बाहर काफी लोग अपनी बारी के इंतजार में खड़े थे. चाय की दूकान पर अन्य लोग भाजपा के पक्ष में थे, ‘हम सैनी समुदाय से हैं. हम भाजपा को वोट करते हैं’, ग्राहकों को चाय देते हुए रमेश सैनी ने कहा.

विशाल मेहदी कहते हैं, ‘मैंने मुसलमान समुदाय में हमेशा सपा के पक्ष में लहर देखी है.’ विशाल बिजनौर, मुरादाबाद और रामपुर के कई निर्वाचन क्षेत्रों में सपा उम्मीदवारों के लिए कैंपेनिंग करते रहे हैं. अमरोहा के ईंट भट्टे में दिहाड़ी पर काम करने वाले अली हसन कहते हैं, ‘हम सपा को वोट करेंगे. नोटबंदी ने हमें बर्बाद कर दिया है. ईंट भट्टे में जो काम तीन महीने पहले शुरू होने वाला था, अभी शुरू हुआ है.’

अंदरूनी हालात

हालांकि आजम खान के ड्रॉइंग रूम में मूड इतना जोशपूर्ण नहीं है. एक सपा नेता ने कहा, ‘हम कई निर्वाचन क्षेत्रों में अपने विधायकों के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर का सामना कर रहे हैं.’ वे कहते हैं, कमरे में बाईं ओर रखा सोफा खाली छोड़ा जाता है क्योंकि ‘बैठक के दौरान इस पर मंत्री जी बैठना पसंद करते हैं.’

अमरोहा में मौजूदा विधायक महबूब अली ने हिंसात्मक रणनीति से खुद के लिए काफी विरोध खड़ा कर लिया है. अमरोहा में बसपा के रोडशो के लिए फिरोज और अन्य लोगों ने बसपा टोपियां दिखाते हुए कहा, ‘हम सब इस बार बसपा को वोट देंगे. महबूब अली हम पर दबाव डाल रहे हैं’ जबकि औरों ने दावा किया कि विरोध के बावजूद महबूब अली के पास इतना समर्थन है कि वे आसानी से जीत जाएंगे. एक स्थानीय कार्यकर्ता की टिप्पणी थी, ‘मंत्री महबूब शेर हैं.’

कितने सही उम्मीदवार

बसपा ने कांठ, मुरादाबाद और अमरोहा जैसी कई सीटों पर सशक्त मुसलमान उम्मीदवार खड़े किए हैं. ये सपा पदाधिकारियों के लिए काफी मुश्किलें खड़ी करेंगे. इसके अलावा जैसा कि मिर्जा ने बताया, सपा-कांग्रेस गठबंधन से दोनों पार्टियों के कार्यकताओं में पूरा तालमेल नहीं हो पाया.

अमरोहा में कांग्रेस कार्यकताओं ने कहा कि उन्हें जो सम्मान सपा कैंप में मिलना चाहिए, नहीं मिल रहा. एक कांग्रेस नेता ने कहा, ‘वे हमें गंभीरता से नहीं लेते. इसी वजह से वे बसपा के लिए काम करने को विवश हुए हैं. ’ ऐसी भी सीटें हैं, जहां एक से ज्यादा मुसलमान उम्मीदवार हैं, जो भाजपा उम्मीदवारों को हाशिए पर ला सकते हैं. पार्टी ने राज्य में एक भी मुसलमान उम्मीदवार खड़ा नहीं किया है.

इसी दौरान, नौगावां जैसी कुछ सीटों पर सपा के मौजूदा विधायक अशफाक को पार्टी ने टिकट देने से इनकार कर दिया और उनकी जगह नया उम्मीदवार अदबी को खड़ा कर दिया. एक अन्य सपा नेता ने कहा, ‘उन्हें आरएलडी ने खड़ा किया है. वे काफी वोट तोडक़र अदबी के लिए मुश्किल खड़ी करेंगे.’

ओवैसी को उम्मीद

इस बीच संभल जैसे कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में असादुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी युवाओं का आकर्षण बनी हुई है. यहां पार्टी वरिष्ठ नेता शफीकुर रहमान बर्क का समर्थन पाने में सफल रही. बर्क सपा से नाखुश थे क्योंकि पार्टी ने उनके पोते ज़ियाउर रहमान को टिकट देने से इनकार कर दिया था. संभल, कांठ और मुरादाबाद (ग्रामीण) जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी रैलियों में अच्छी खासी भीड़ नजर आई.

एक सपा सांसद ने कहा, ‘1999 में सोनिया गांधी की रैली संभल में मुलायम सिंह के खिलाफ लगभग 5 लाख लोगों की भीड़ जुटाने में सफल रही थी. जब नतीजे आए, कांग्रेस को महज 19 हजार वोट मिले. और वह लोकसभा चुनाव था.’ उन्होंने अपनी बात जारी रखी कि इस मजबूती को देखते हुए पार्टी को हराना मुश्किल होता. ‘ हमारे लिए पक्ष की लहर है, कम से कम अल्पसंख्यक समुदाय में.’

अली हसन ने कहा, ‘महबूब अली खराब हैं, तो क्या हुआ, हम अखिलेश यादव को वोट करेंगे. संभल, अमरोहा और मुरादाबाद में हो सकता है हम पहले जितनी सीटें नहीं जीत पाएं. फिर भी हमें काफी बड़ा हिस्सा मिलेगा. हम इसकी भरपाई दूसरे जिलों से कर लेंगे.’

First published: 16 February 2017, 7:53 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी