Home » उत्तर प्रदेश चुनाव » Ram the saviour: why BJP and SP are stepping up Ayodhya push
 

अयोध्या सीढ़ी है सत्ता तक पहुंचने की

अतुल चंद्रा | Updated on: 20 October 2016, 7:47 IST
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का माहौल बनते ही भगवान राम का जिन्न बोतल से बाहर निकल आया है. 
  • प्रधानमंत्री ने दशहरा समापन पर जय श्री राम का नारा लगाया था और अब उनके सांसद-मंत्री उसी अजेंडा को आगे बढ़ा रहे हैं. 

विजयदशमी के मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लखनऊ की ऐशबाग रामलीला में जय श्री राम के उद्घोष से अपना भाषण ख़त्म किया ही था. उन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने इलाहाबाद में कहा कि वे बाबरी मस्जिद मामले में रोज़ाना सुनवाई के लिए आवेदन करेंगे. उन्होंने उम्मीद जताई है कि रोज़ाना सुनवाई से मामले का निपटारा होगा और इससे राम मंदिर निर्माण के अभियान को रफ़्तार मिलेगी.

केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति राज्यमंत्री डॉ. महेश शर्मा ने भी मंगलवार को 25 एकड़ जमीन का मौका-मुआयना किया जहां रामायण म्यूजियम बनाया जाना है. इसके लिए उन्होंने 154 करोड़ रुपए की सौगात भी दी है. म्यूजियम में लोग भगवान राम के विविध रूपों के दर्शन कर सकेंगे. अयोध्या को विश्व पर्यटन के मानचित्र पर स्थापित करना इसका उद्देश्य बताया गया है. इन तमाम कसरतों से अचानक ही इस पिछड़े राज्य में राम और अयोध्या का मुद्दा हावी हो गया है.

रामनाम से बेड़ा पार होने की उम्मीद

शर्मा की अयोध्या यात्रा का मकसद था कि किसी तरह भाजपा और आरएसएस एक विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण को चुनावी मुद्दा बना दें. लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश दीक्षित कहते हैं कि भाजपा का मकसद और कारण साफ़ दिख रहा है कि वह अयोध्या मुद्दे को क्यों फिर से केन्द्र में लाना चाहती है. दरअसल भाजपा को अच्छी तरह पता चल चुका है कि विकास के मुद्दे को भुनाने में वह विफल हो गई है. 

अमित शाह का सोशल इंजीनियरिंग का मुद्दा भी फायदे का साबित नहीं हो रहा है. ऐसे में पार्टी का बेड़ा पार करने के लिए राम का ही सहारा बचता था. बहुजन समाज पार्टी ने पार्टी का चुनावी घोषणापत्र जारी नहीं किया है. लिहाज़ा, भाजपा चुनाव के पहले 'जय श्री राम' के नारे का उद्घोष कर मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम करेगी.

दरअसल राम मंदिर का मुद्दा भाजपा के लिए इस लिहाज़ से भी फ़ायदेमंद है कि इस जाल में फंसने वाला वोट जाति की परवाह किए बिना वोट करता है. हालांकि भाजपा के लिए जाति की समस्या 2014 के लोकसभा चुनाव में ही ख़त्म हो गई थी 

जब बसपा का खाता नहीं खुल सका और समाजवादी पार्टी भी अपने मुखिया मुलायम सिंह के परिवार तक ही सिमट गई थी. मुलायम परिवार के पांच सदस्य ही लोकसभा चुनाव जीत सके थे.

राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस राज्य में अब 2014 का इतिहास दोहराया जाना तो मुश्किल है. ऐसे में भाजपा और संघ के लोग अब रैलियों में धर्म का तड़का लगाने की फिराक़ में हैं. दीक्षित की राय में केवल संघ परिवार ही राम मुद्दे को भुना सकता है. समाजवादी पार्टी का प्रस्तावित राम कथा पार्क अखिलेश यादव को उतनी राजनीतिक सफलता दिला पाने में मददगार नहीं हो सकेगा.

कांग्रेस और भाजपा का रुख

राज्य कांग्रेस के मीडिया प्रभारी सत्यदेव त्रिपाठी कहते हैं कि भाजपा और संघ केवल साम्प्रदायिक कार्ड खेल रहे हैं और सपा-बसपा भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों ही दल अपने सियासी फायदे के लिए साम्प्रदायिक तत्वों की मदद ले रहे हैं. 

त्रिपाठी कहते हैं कि भाजपा राम को चुनावी मुद्दा बना रही है जो उसका चरित्र ही है जबकि अखिलेश यादव का थीम पार्क बनाना सॉफ्ट हिन्दुत्व है ताकि सपा कह सके कि वह राम विरोधी नहीं है.

उधर, बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भाजपा और सपा पर हमला बोलते हुए कहा है कि राम तभी याद आते हैं जब चुनाव नजदीक होते हैं. बसपा प्रमुख ने दोनों पार्टियों की मंशा पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि भाजपा को केन्द्र में सत्ता संभाले ढाई साल हो गया है और अखिलेश सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा कर रही है. ऐसे में दोनों को इसके पहले राम मंदिर का ध्यान क्यों नहीं आया?

First published: 20 October 2016, 7:47 IST
 
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