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राजा का राज खत्म, जीते रहो टीपू

भारत भूषण | Updated on: 1 January 2017, 7:58 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

उत्तर प्रदेश के हाई वोल्टेज राजनीतिक ड्रामे का अगर कोई सही मायने में शिकार हुआ है तो वह हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. नए साल की पूर्व संध्या पर टीवी पर जो ऑन एयर समय और जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही लेते, वह ‘ग्लैमर’ अब मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव लूट ले गए.

शुक्रवार को यूपी के राजनीतिक ड्रामे के हीरो अखिलेश यादव रहे, जिन्हें छह साल के लिए समाजवादी पार्टी से बाहर कर दिया गया लेकिन शनिवार सुबह इस ड्रामे का पटाक्षेप ‘टीपू’ की घर वापसी के साथ ही हुआ. नेताजी ने अपने बेटे के साथ एक बार फिर राजनीतिक समझौता कर लिया.

अखिलेश को इस पूरे घटनाक्रम का फायदा इस रूप में मिला कि वे पहले से अधिक मजबूत हो कर उभरे, हम भारतीयों को वैसे ही नाटक-नौटंकी में आनंद आता है. हमें बलिदान और चुनौतियां दोनों ही बहुत प्रिय हैं. कई बार तो इसका कारण अहम हो यह भी जरूरी नहीं. यहां तक कि जब पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटकाया गया था तो उस दिन भारत में भी कई लोगों ने शोक के चलते एक वक्त का भोजन तक नहीं किया. 

अखिलेश की एक खूबी यह है कि वे साफ सुथरी छवि वाले नेता माने जाते हैं जबकि ‘नेताजी’ मुलायम सिंह की छवि दांव पेंच वाले मंझे हुए राजनेता की है, जिन पर हर कोई आसानी से विश्वास नहीं कर पाता. मतदाता अखिलेश को उनकी दिलेरी के लिए वोट दे सकते है.

तय थी अखिलेश की जीत

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में अखिलेश की जीत उसी वक्त तय हो गई जब उनके घर 207 विधायक इकठ्ठे हुए और उनके पिता सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा सपा कार्यालय में बुलाई गई बैठक में सिर्फ 17 विधायक! इतना सब होने के बावजूद पुराना आदेश वापस लेने और अखिलेश की पार्टी में वापसी चुनावी जीत की बड़ी वजह बन सकती है. कारण, कि अखिलेश की चुनावी रणनीति अपने पिता मुलायम और चाचा शिवपाल यादव के बजाय अधिक सुदृढ़ है और उन्हें पार्टी को जिताने के लिए मुलायम सिंह के ‘वजन’ की जरूरत नहीं है.

मीडिया ने जबरदस्ती इस नाटक का खलनायक मुलायम सिंह के भाई शिवपाल को बना डाला. जबकि यादव परिवार को करीब से जानने वाले लोगों का मानना है कि इस ड्रामे के असली खलनायक दो लोग हैं. एक अकिलेश के पक्ष में खड़े रामगोपाल यादव और दूसरे मुलायम सिंह के साथ खड़े पार्टी के राजपूत नेता अमर सिंह. दोनों का ही आम जनता के बीच कोई आधार नहीं है. पार्टी की चुनावी राजनीति में कोई भूमिका नहीं है. उन्हें बस अपनी राजनीतिक पहचान बचाए रखने की चिंता है.

रामगोपाल यादव ने ही बिहार चुनाव में कथित तौर पर महागठबंधन तोड़ा था. नोएडा के चीफ इंजीनियर यादव सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में रामगोपाल के सगे-संबधियों का नाम आने के बाद कई लोगों ने रामगोपाल पर भाजपा के साथ मिलीभगत करने का आरोप लगाया था. रामगोपाल ही थे, जिनकी बात मानकर मुलायम सिंह यादव ने बिहार गठबंधन से नाता तोड़ लिया था. रामगोपाल ने मुलायम को सलाह दी थी कि सपा का बिहार में बमुश्किल ही कोई वजूद है; इसलिए गठबंधन में रहने का कोई फायदा नहीं है. 

पार्टी ने अपने कुछ ही उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे और वे सारे हार गए. मुलायम के आंखों की किरकिरी यूपी के ही एक राजनेता अशोक यादव ने बताया. आजकल ये ही रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव के नए सलाहकार हैं और बाप-बेटे के बीच फूट डालने में इन्हीं का हाथ है. वे यह सब सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि यूपी की राजनीति में अपना महत्व बढ़ा सकें और बिना चुनाव लड़े ही प्रभावशाली भूमिका में रहें.

अशोक यादव ने कहा, यही हाल अमर सिंह का है जो इन दिनों फिर से मुलायम के करीब आ चुके हैं. अमर सिंह उन्हें डराते रहते हैं कि कहीं भाजपा आय से अधिक सम्पत्ति के मामलों में उन्हें न घेर ले और मुलायम को आशंका है कि कहीं बुढ़ापे में उनकी किरकिरी न हो जाए. अमर सिंह, मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता और उनके भाई शिवपाल यादव की आड़ में भी अपने हित साधते रहते हैं.

भाजपा की भूमिका

सपा में फिर से आने के बाद अमर सिंह ने वर्तमान गृह मंत्री राजनाथ सिंह से कई बार मुलाकात की है, जो कभी यूपी के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. रामगोपाल यादव, अमर सिंह की हरकतों और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक, जो कि भाजपा नेता रह चुके हैं के बयान कि वे हालात पर नजर रखे हुए हैं से स्पष्ट होता है कि भाजपा की इस पूरे ड्रामे में कहीं न कहीं कोई भूमिका जरूर है.

हालांकि समाजवादी पार्टी के इस कलह से भाजपा को शायद ही सीधे कोई फायदा हो. भाजपा यादवों का समर्थन नहीं मांगती. यादव भी भाजपा को अपनी पार्टी नहीं मानते. भाजपा का फोकस फिलहाल गैर यादव ओबीसी पर ही है. यही बात यूपी के मुसलमानों पर लागू होती है. न तो वे भाजपा को वोट देना चाहते हैं और न ही भाजपा उनके वोट की उम्मीद करती है. 

इसलिए इन दो वर्गों के मतदाताओं के वोट मिलने की संभावना भाजपा को नहीं है, भले ही सपा में कुछ भी हो. और तो और नोटबंदी के चलते पहले ही यूपी में हालात भाजपा के पक्ष में दिखाई नहीं देते. उसके मुख्य वोटर बनिये और व्यापारी भी रूठे हुए हैं, क्योंकि उनका व्यापार घाटे में चल रहा है. बनिया केवल एक जाति ही नहीं है, यह पूरा का पूरा व्यावसायिक तबका है. इसलिए कहा जा सकता है कि भाजपा को केवल जातिगत वोटों का ही नुकसान नहीं हुआ है, उससे कहीं अधिक हुआ है.

बसपा पर असर नहीं

बसपा को भी मुस्लिम वोटों के बंटने का कोई फायदा नहीं मिलने वाला, जैसा कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक दावा कर रहे हैं. मुसलमानों में उच्च जाति वर्ग शेख, सईद और पठान बसपा को कभी वोट नहीं देते. मायावती ने हमेशा पिछड़े मुसलमानों यानी पसमंदा मुसलमानों को ही साथ लेकर चलने की बात की है. उच्च जाति के मुसलमान या तो सपा या कमोबेश कांग्रेस को ही वोट देते हैं.

सीधा फायदा अखिलेश और राहुल को

फिर सपा के इस सारे ड्रामे का फायदा आखिर मिलेगा किसे? अगर सपा और कांग्रेस गठबंधन करें तो यह राहुल गांधी और अखिलेश दोनों के ही लिए फायदे का सौदा साबित होगा. कांग्रेस को इससे यूपी में एक नई शुरूआत मिल सकती है. दूसरी ओर अखिलेश राष्ट्रीय नेता के तौर पर उभर सकते हैं, और यह स्थिति उनके उज्जवल राजनीतिक भविष्य का आधार भी हो सकती है. 

यूपी के इस गठबंधन में राष्ट्रीय लोक दल के युवा नेता जयंत चौधरी भी शामिल हो सकते हैं. जनता दल यूनाइटेड भी हो सकता है इस गठबंधन में आ जाए.

भाजपा तो पहले ही नोटबंदी की वजह से नुकसान में चल रही है. उसे सपा के पारिवारिक कलह से कोई फायदा हो न हो, अपनी खुद की वजह से घाटा होना तय है. बसपा भी शायद अपना वोट बैंक बचाने से ज्यादा कुछ और न कर पाए. अगर अखिलेश अडिग रहे तो जाहिर है यूपी में सारे राजनीतिक समीकरण नए सिरे से तय होंगे और यह गैर भाजपाई पार्टियों के लिए फायदे का सौदा साबित होंगे. ये नए राजनीतिक समीकरण शायद आने वाले दिनों में देश की राजनीति का भविष्य तय करें.

First published: 1 January 2017, 7:58 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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