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सुरेश राणा: 'मेरा बयान सांप्रदायिक लगता है तो लगे लेकिन मैं सच बोलता हूं'

सादिक़ नक़वी | Updated on: 8 February 2017, 7:41 IST
(कैच न्यूज़)

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से लगे शामली जिले की थाना भवन सीट से भाजपा विधायक सुरेश राणा वर्ष 2013 से ही विवादों में घिरे रहे हैं. मुजफ्फरनगर जिले के मंगला मंदौड़ में हुई महापंचायत में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया था. उनका नाम मुजफ्फरनगर दंगों के मुख्य अभियुक्तों में से एक था. तब से उनकी छवि एक स्थानीय कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की बन गई है जो बढ़ती ही जा रही है. 

इसमें उनके समय-समय पर दिए गए भाषणों का भी भरपूर योगदान है, जिसके चलते उनके विरोधी उनके घृणास्पद भाषणों की शिकायत करते हैं. अभी हाल में उनका ताजा बयान आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि मैं चुनाव जीत गया तो देवबंद से लेकर मुरादाबाद तक कर्फ्यू लग जाएगा. 

उनके सहयोगियों का दावा है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, हाल में रविवार को जब चुनाव अभियान के सिलसिले में थाना भवन आए थे, तब उन्होंने राणा से कहा था कि प्रथम चरण के बाद वे 100 सीटों पर चुनाव प्रचार करें. इस बात से यही संकेत मिलता है कि उप्र में भाजपा की चुनावी रणनीति के लिए वह कितने महत्वपूर्ण हैं.

राणा पिछला विधानसभा चुनाव बमुश्किल कुछ सौ वोट से ही जीते थे. यह चुनाव भी उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण है. हालांकि राणा की टीम उनकी जीत के प्रति आश्वस्त है क्योंकि बहुजन समाज पार्टी और आरएलडी दोनों ने इस सीट से मुस्लिम प्रत्याशियों को खड़ा किया है. जबकि समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन की ओर से प्रो. सुधीर पवार हैं. पवार उप्र योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं और अखिलेश यादव के चहेते हैं. 

कैच ने राणा से लंबी बात उस समय की है, जब वह अपने विधानसभा क्षेत्र में गांव-गांव जन सम्पर्क में निकले हुए थे. उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश यहां पेश हैं:

सवाल-जवाब

इस चुनाव में मुद्दे क्या-क्या हैं?

इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में क्या-क्या किया है. इस अवधि में सड़कें बनवाई गईं हैं. आम आदमी के लिए उज्ज्वला योजना या जन धन योजना जैसी कई योजनाएं शुरू की गईं हैं. अपने आप में यही बड़े मुद्दे हैं.

भाजपा कहती रही है कि इस क्षेत्र में सेफ्टी और सिक्योरिटी बड़ा मुद्दा है. कृपया इसे विस्तार से बताएं? भाजपा पलायन की बात करती है जबकि रिपोर्ट्स कुछ और ही कहती है.

पश्चिमी उप्र का कोई गांव या शहर ऐसा नहीं है जहां बड़ी संख्या में पलायन न हुआ हो. इसकी वजह है बलपूर्वक अपहरण, भय, गुंडागर्दी, माफिया तत्वों का राज. गांवों और बड़े शहरों में इस तरह का माहौल बना दिया जाता है कि लोग डरकर अपना घर-बार छोड़ने को विवश होते हैं. हमने उन्हें भरोसा दिया है कि यदि भाजपा सत्ता में आती है तो जिन लोगों की वजह से लोग घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, उन्हें उत्तर प्रदेश छोड़ने को मजबूर होना होगा. 

इसके लिए कौन लोग उत्तरदायी हैं? 

ये गुंडा तत्व हैं.

क्या आपका मतलब है कि कोई राजनीतिक दल इसमें शामिल है? 

समाजवादी पार्टी के संरक्षण में कुछ लोग जबर्दस्त तरीके से भय का माहौल उत्पन्न कर रहे हैं. सपा-बसपा से इनका तालमेल है. ये लोग इसी की देन हैं.  

इस तरह के आरोप हैं कि आपने कहा है कि कुछ चीजें इस चुनाव का ध्रुवीकरण करेंगी...

यह केवल ध्रुवीकरण की बात नहीं है. यह मुद्दों की बात है. मैं सच बोलता हूं, जो कुछ कहना होता है, कह देता हूं. अगर लोग सोचते हैं कि यह भाषा साम्प्रदायिकता वाली है तो उन्हें सोचने दीजिए. जब मैं कहता हूं कि कैराना से पलायन हुआ है तो यह सच है. जब मैंने कहा कि देवबंद से एक एके-47 लूटी गई तो वह सच था. 

जब मैंने कहा कि मुरादाबाद में लड़कियां बिना भय के सड़कों पर चल नहीं सकतीं तो वह भी सच है. बरेली में तो लड़कियों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि उन्हें स्कूल जाने के लिए भी सुरक्षा चाहिए, तो वह भी सच है. अगर इन सबको साम्प्रदायिकता का रंग दिया जाए तब तो मैं कुछ भी मदद नहीं कर सकता. 

इस क्षेत्र के एक वर्ग के मतदाताओं का कहना है कि आपने वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर में दंगे उकसाने में बड़ी भूमिका निभाई है जिससे इस क्षेत्र की राजनीति बदल गई...

जहां तक मेरी भूमिका का सवाल है तो सरकार ने हम पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा दिया. हाईकोर्ट ने यह कहते हुए इसे निष्प्रभावी कर दिया कि हमारे खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है. कोई अपराध नहीं किया गया है. यह तो स्पष्ट है कि राज्य सरकार ने हमारे पर रासुका लगाकर हमें उत्पीड़ित किया है. 

जाट अब कह रहे हैं कि हमने 2014 के आम चुनाव में भाजपा को वोट दिया, लेकिन पार्टी ने उनके लिए कुछ नहीं किया...

भाजपा सबका साथ सबका विकास में विश्वास करती है. पार्टी किसी एक समुदाय की बेहतरी के लिए काम नहीं करती. जहां तक जाट बिरादरी का सवाल है तो जो लोग खेती कार्यों में लगे हैं, उनके लिए मोदी सरकार की गन्ना नीति है. मोदी सरकार ने सुनिश्चित किया है कि सभी चीनी मिलें चलनी चाहिए. यदि सरकार यूपीए की होती तो सभी चीनी मिलें बंद पड़ी होतीं या बंद हो गई होतीं. लोगों की भीड़ आप देख ही रहे हैं (उनका इंतजार करती भीड़ की तरफ इशारा करते हुए). इससे यही झलकता है कि मोदी के शासन काल में कई सारे काम हुए हैं. 

आप उप्र चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को किस नजरिए से आंकते हैं. इस गठबंधन के लोगों का कहना है कि वे आसानी से अगली सरकार बना ले जाएंगे?

गठबंधन तो सालों से है. यूपीए-2 के शासनकाल में मूल्यवृद्धि पर समाजवादी पार्टी ने संसद में कांग्रेस का समर्थन किया था.  भूमि अधिग्रहण मुद्दा, आतंकियों को समर्थन, दोनों दलों के बयान एक जैसे ही हैं. ऐसे में यह गठबंधन नया नहीं है. उप्र में दोनों दल डरे हुए हैं. मायावती, राहुल गांधी और अखिलेश यादव सभी विपक्षी नेता भाजपा को रोकने की बात कर रहे हैं. 

अगर वे पहले से ही इस तरह की बातें कर रहे हैं तो यह दिखाई पड़ता है कि वे यह मानकर चल रहे हैं कि भाजपा राज्य में अगली सरकार बनाने जा रही है. और अगर ये तीनों दल भी एकसाथ आ जाएं तो वे भी भाजपा को रोकने में सफल नहीं हो सकेंगे.

First published: 8 February 2017, 7:41 IST
 
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