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जयंत चौधरी: नोटबंदी का जवाब उत्तर प्रदेश के किसान भाजपा को इस चुनाव में देंगे

सादिक़ नक़वी | Updated on: 14 February 2017, 5:25 IST

‘चुनाव में मजा आ रहा है. हमने सबकी खाट कर दी है.’ यह बात आरएलडी के युवा महासचिव जयंत चौधरी ने कैच से कही. वे बिजनौर के चांदपुर इलाके में भारी भीड़ को संबोधित करने जा रहे थे. यह निर्वाचन क्षेत्र पश्चिम यूपी के गन्ने वाले बेल्ट में पड़ता है. इस क्षेत्र में जाटों की काफी अच्छी संख्या है, जो आरएलडी का ठोस वोट बैंक है. 

यहां पार्टी को हमेशा कुछ सीटें मिलती रही हैं, पर 2014 के लोकसभा चुनावों में सारी सीटें भाजपा के खाते में चली गईं. खासकर मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद. इससे इस इलाके के परपंरागत वोट बैंक कम हो गए. अब मोदी लहर में पहले वाला जोश नहीं है, इसलिए जयंत को पूरा भरोसा है कि उनका परंपरागत मतदाता वापस आरएलडी की ओर रुख करेगा.

कैच ने 11 फरवरी को जयंत की बरेली, पीलीभीत और बिजनौर में चुनावी रैलियों का मुआयना उनके साथ रहकर किया. यह उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले चरण का दिन था. पहले दो जिले आरएलडी की पर्याप्त मौजूदगी के लिए नहीं जाने जाते, फिर भी पार्टी ने यहां और अन्य कई निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार खड़े किए हैं. जयंत कहते हैं, ‘इससे हमारे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा.’ वे दावा करते हैं कि पहले चरण के नतीजे आश्चर्यजनक रहेंगे, खासतौर से उनके लिए जिन्होंने आरएलडी को नकारा है. पेश है उनसे बातचीत के महत्वपूर्ण अंश:

सवाल-जवाब

यह चुनाव आपके लिए काफी चुनौतीपूर्ण है. आप किस तरह पार पाएंगे?

यह चुनाव राज्य के लिए काफी अहमियत रखता है. हमें इसे नई दिशा देनी है. राज्य में सभी क्षेत्रों में विकास की गति मंद है. सामाजिक विकास के कोई भी आंकड़े देखें, यूपी का स्थान देश के अंतिम 3 या 4 राज्यों में है. इसलिए यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पिछले लोकसभा चुनावों में हमारे लोगों में सांप्रदायिक नफरत भरी गई थी. देखना है कि लोग इससे कितने बाहर निकले हैं. मैं समझता हूं कि लोग सब कुछ भूल जाने को तैयार हैं और आगे बढऩा चाहते हैं, और यह सब नतीजे बताएंगे.  

समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के गठबंधन ने आपको छोड़ा. उसके बाद चर्चा हुई कि भाजपा ने भी यही किया?

पहली बात तो यह कि हमने गठबंधन के लिए भाजपा से कभी संपर्क नहीं किया. हम भाजपा की किसान-विरोधी नीतियों और उसके सांप्रदायिक एजेंडे के सबसे मुखर आलोचक रहे हैं. दरअसल सपा और बसपा दोनों ही हमारी तरह मुद्दों पर ईमानदारी और साहस से नहीं बोल पाएंगे. और वजह शायद यादव सिंह हैं. केंद्रीय एजेंसियों के पास इन दोनों पार्टियों के खिलाफ कई फाइल्स और मामले लंबित हैं और पार्टियों के नेता भ्रष्ट हैं. दूसरी ओर हम पर कोई आरोप नहीं है और इन मुद्दों पर खुल कर बात करते रहे हैं.

भाजपा का तो सवाल ही नहीं है. हां, हम केंद्र सरकार की गतिविधियों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष में एकता बनाने के प्रयास कर रहे थे. हमने लोगों को कई मंच पर एक किया. मीडिया ने सोचा कि हम सपा-कांग्रेस गठबंधन समझौते का हिस्सा हैं. 

आप क्या कहना चाहते हैं?

गठबंधन के लिए वैचारिक बैठक होनी चाहिए, मुद्दों पर बात करने के लिए. ना कि महज सीटों के लिए. हम चुनावी तालमेल नहीं चाहते थे. फिलहाल सपा-कांग्रेस, गठबंधन से ज्यादा चुनावी सीटों का सामंजस्य चाहती हैं. सपा और हमारे बीच उस स्तर पर बात आगे नहीं बढ़ी, इसलिए साथ चुनाव लडऩे की संभावना नहीं थी. 

क्या इसके लिए सीएम अखिलेश यादव ज़िम्मेदार हैं?

कभी उस स्तर पर बात नहीं हुई.

क्या जाटों की आरएलडी की ओर वापसी हो रही हैं?

मैं जाट का प्रतिनिधि नहीं हूं, पर मुझे लगता है कि पूरा किसान समुदाय भाजपा से नाराज है. 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को युवाओं के, महिलाओं के, किसानों के वोट मिले, हर राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र उजड़ गया था. परंपरागत वोट बैंक कम हो गए थे. इस बार आप देखेंगे कि परंपरागत वोट बैंकों की काफी संख्या में वापसी हुई है. 

इस नाराजगी के लिए नोटबंदी कितनी जिम्मेदार है? 

लोग प्रत्यक्ष राहत की उम्मीद कर रहे थे. सब कुछ खत्म होने के बाद भी लोगों ने दो महीने तक धीरज रखा, खासकर छोटे किसानों ने, जो बागबानी कर रहे थे. आप उन्हें एक भी फसल छोड़ने के लिए नहीं कह सकते. कई परिवारों का काम का पूरा साल खराब हो गया.  

कैश की कमी ने छोटे कारोबारी, उद्यमियों, छोटे व्यवसायों को प्रभावित किया, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं. इसलिए लोग सोच रहे थे कि इस क्रांतिकारी कदम के बाद उन्हें कुछ प्रत्यक्ष राहत मिलेगी. उस वादे को बजट में नहीं निभाया. 

पीएम ने कहा था कि 50 दिन के बाद स्थितियां सामान्य हो जाएंगी. अब तो करीब 100 दिन हो गए, अब भी कैश की आमद-रफ्त नहीं बनी है. 

प्रत्यक्ष राहत से आपका मतलब कृषि ऋण में माफी से है?

हम चाह रहे थे कि नोटबंदी के बाद किसानों के लिए ऋण माफी की कोई योजना आए. दिसंबर में हमने विपक्ष की सभी पार्टियों को एक किया और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किए. यहां किसानों ने ऋण में छूट की मांग की. केंद्र सरकार ने उसे गंभीरता से नहीं लिया.  

चौधरी चरण सिंह गन्ना किसान भुगतान योजना के भाजपा के वादे पर आप क्या कहेंगे?

यह हास्यास्पद योजना है. इससे लगता है कि इन मुद्दों पर बिल्कुल ठीक से नहीं सोचा गया, भाजपा असलियत से कितनी दूर है, कितना कम समझती है किसानों को. इसका प्रस्ताव है कि यदि गन्ना मिल के मालिकों से भुगतान में देरी होती है, तो राज्य सरकार ब्याज वहन करेगी. 

पहले से ही कानून है कि यदि मिल भुगतान नहीं कर पाती है, तो 14 दिनों के बाद, ब्याज किसानों की वजह से है. इसलिए जब भाजपा यह कह रही है कि राज्य सरकार सरकारी खजाने से ब्याज का भुगतान करेगी, तो कुछ नया नहीं कह रही. वह मिल मालिकों को राहत देने की योजना बना रही है, किसानों को नहीं. इससे मिल मालिकों को 14 दिनों के तय समय में भुगतान नहीं करने की प्रेरणा मिलेगी.

First published: 14 February 2017, 5:25 IST
 
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