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गगन बिहारी उम्मीदवारों पर भारी पड़ेगी इलाहाबाद की जंग

आवेश तिवारी | Updated on: 18 February 2017, 9:19 IST
कैच न्यूज़

इलाहाबाद में माघ मेला ख़त्म होने को है, नतीजतन शहर से निकलने वाली भीड़ बढ़ गई है. पिछले कुछ वर्षों में चौड़ी सड़कें थोड़ी और चौड़ी हो गई हैं, बिजली पहले की तुलना में थोडा ज्यादा रहती है, नक्काशीदार इलाहाबादी रिक्शे और तांगे अब भी वैसे ही है जैसे एक दशक पहले थे.

हांलाकि कभी पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले शहर के इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अब छात्रों को नौकरशाह बनाने की कूबत पहले से कम हो गई है. इसके कारण नौकरी की तलाश में तैयारी करने वाले छात्रों की भीड़ भी पहले की अपेक्षा इलाहाबाद में कम हो गई है. ज्यादातर लोग अब दिल्ली-बंगलोर जैसे शहरों की तरफ रुख करने लगे हैं.

इस चुनावी मौसम में चौक-चौराहों पर चुनावी पोस्टर-बैनर या लाउडस्पीकरों की आवाज देखने-सुनने को नहीं मिल रही. चुनाव आयोग के मतदान की अपील वाले बैनर पार्टियों के बैनर-पोस्टर से अधिक हैं. हां, भाजपा का एक आदमकद बैनर सिविल लाइन चौराहे पर जरूर दिखा.

इलाहाबाद शहर में तीन विधानसभाएं है जबकि पूरे जिले में कुल 12 विधानसभा सीटें हैं. पं नेहरु, इंदिरा गांधी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेताओं की सीट रहे इस जिले की कुछ विधानसभा सीटें इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि भाजपा ने न केवल अपना प्रदेश अध्यक्ष इलाहाबाद से बनाया बल्कि अपना राष्ट्रीय अधिवेशन भी पिछले साल यहीं पर किया.

बाबुओं की गलियों में वोटर

इलाहाबाद की शहर उत्तरी विधानसभा सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती है. पिछले तीन बार से अनुग्रह नारायण सिंह यहां कांग्रेस से विधायक है. यह इलाका बाबुओं का इलाका कहा जाता है क्योंकि तमाम सरकारी दफ्तर इसी इलाके में हैं. चाय-पान, भोजन की सड़क किनारे बनी दुकानें छायादार पेड़ और उनके नीचे लगने वाली अड्डेबाजी का अपना आकर्षण है.

कांग्रेस-सपा गठबंधन ने यहां से अनुग्रह नारायण सिंह को फिर से उतारा है इनके मुकाबले में दो बार बसपा से लड़ चुके और इस बार भाजपा से लड़ने वाले हर्षवर्धन वाजपेयी है. अनुग्रह की खासियत उनकी विनम्रता है. कभी किसी की मोटरसाइकल तो कभी रिक्शे पर शहर में घूमने वाले अनुग्रह की स्वीकार्यता ज्यादा दिखी.

शिक्षा विभाग के दफ्तर के बाहर चाय पान की दुकान चलाने वाले पवन कुमार पांडे बताते हैं कि इस बार हर्षवर्धन वाजपेयी भी मजबूत टक्कर दे रहे हैं लेकिन अनुग्रह द्वारा किये गए विकास को नकारा नहीं जा सकता. यह पूछने पर कि हर्षवर्धन वाजपेयी के आगे बढ़ने की वजह क्या है? तो उनका तपाक से जवाब होता है मोदी. वो कहते हैं इसमें स्थानीय भाजपा नेताओं का कोई प्रभाव नहीं है.

नाराजगी इसलिए भी है

एक पेड़ के नीचे ऑडिटर जनरल आफिस के कुछ कर्मचारी बैठे हुए मिले. ज्यादातर कर्मचारी पदोन्नति में आरक्षण खत्म करने के कारण अखिलेश सरकार से नाराज हैं. बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश में 13 हजार अधिकारी पदावनत हुए हैं जो अखिलेश के खिलाफ एक माहौल बना रहे हैं.

आरोप है कि अखिलेश, भाजपा के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे है. रामअवतार कहते हैं, 'जब अखिलेश मुख्यमंत्री होंगे तो कांग्रेस के पास बोलने का साहस नहीं होगा, इसलिए हम गठबंधन के खिलाफ है.' वो आगे बताते हैं, 'भाजपा कहती है कि हम आंबेडकर के मिशन को आगे बढ़ाएंगे, उदितराज और विनोद सोनकर कैसे इस मिशन पूरा कर लेंगे जब कांशीराम, मायावती नहीं कर पाए? हम खामोश हैं.'

वहां मौजूद बाकी लोग भी अपनी राय देने लगते हैं. किसी का मानना है कि केवल यादव और मौर्या का वोट हासिल करके बीजेपी जीत नहीं सकती. पर भाजपा तो उन्हीं को साधने में लगी हुई है. संगीत श्याम कहते के मुताबिक पिछली बार इलाहाबाद जिले की विधानसभा सीटों पर पासी और सोनकर बिरादरी का वोट भी सपा को मिला था. इस बार मुश्किल है. श्याम आगे कहते हैं, 'इस बार बकैतों (बकवास करने वाले) और बड़बोलों को इलाहाबादी वोट नहीं डालने वाले.'

सियासी जंग में मुस्लिमों का मुस्तकबिल

शहर दक्षिणी में हाजी परवेज टंकी सपा से विधायक भी है और इस बार फिर से उम्मीदवार हैं. बसपा और अपना दल ने भी इस विधानसभा सीट से मुस्लिम उम्मीदवार उतारा है तो भाजपा ने बसपा सरकार में पूर्व मंत्री रहे नंदगोपाल नंदी को टिकट दिया है.

इलाहाबाद की इस सीट पर नंदी को टिकट दिए जाने से विनय मिश्र सरीखे पुराने भाजपा के नेता असंतुष्ट हैं. इनका अपने इलाके में दबदबा है. चौक में अपनी दुकान पर बैठे माशूक अली जो कि विवाह के साफे बेचते हैं, कहते हैं, 'इस बार मुस्लिमों के वोट बटेंगे, ऐसा लग रहा है. अब इसका कितना फायदा भाजपा को मिलेगा, कह नहीं सकते.'

टायर की दुकान चलाने वाले परवेज अहमद अपने दोस्तों के साथ गुड़िया तालाब के पास बैठे मिले. उन्होंने बताया कि पिछली बार केशरीनाथ त्रिपाठी (फिलहाल बंगाल के राज्यपाल) और नंदी की लड़ाई में टंकी जीत गए थे. उनका कहना है कि हिन्दुस्तान जबसे आजाद हुआ है पहली बार कोई मुसलमान यहां से विजयी हुआ था.

मोहम्मद असलम इस सवाल पर कि कैसा विधायक चाहिए, तपाक से जवाब देते हैं, 'जो वादा पूरा करे, पब्लिक के लिए आसानी हो, लड़ाई-झगड़ा न होने दे, बस इतना ही चाहिए.' गठबंधन से पहले मुलायम परिवार में छिड़े विवाद को यहां के मुस्लिम नौटंकी मानते हैं लेकिन यह भी कहते हैं इससे सपा को फायदा हुआ.

बाहुबली अतीक अहमद का भी इस इलाके पर प्रभाव है लेकिन अखिलेश द्वारा उनका टिकट काटे जाने से कोई खास नाराजगी देखने को नहीं मिली.

सोये हुए शहर में जाग रहा मतदाता

इलाहाबाद को सोता हुआ शहर भी कहा जाता है लेकिन यहां का मतदाता जागा हुआ है. कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हॉलैंड हॉल हास्टल में कैंटीन चलाने वाले शोभनाथ पांडे कहते हैं, 'भाजपा से नाराजगी की मेरी अपनी वजहें हैं. किसी ब्राहमण का नाम बता दीजिये जिसे इलाहाबाद में भाजपा ने टिकट दिया हो. पहले नरेन्द्र सिंह गौर मंत्री थे, उनका भी टिकट काट दिया. क्या केशव प्रसाद मौर्या के अलावा कोई अध्यक्ष बनाने लायक नहीं था?'

पत्रकार हिमांशु पांडे बताते हैं कि नन्द गोपाल नंदी के रास्ते में ब्राह्मण मतदाता भी रोड़ा अटकाएगा. नंदी जब बसपा सरकार में मंत्री थे तब उनका सारा विरोध ब्राह्मणों और व्यापारी वर्ग के लोग ही करते थे. उन पर हमला हुआ, जिनके खिलाफ मुक़दमे कराये गए वो सब भी ब्राह्मण ही थे. अब वो भाजपा के उम्मीदवार है तो जाहिर है जनता उनका अतीत इतनी आसानी से नहीं भलने वाली.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक पूर्व छात्र नेता कहते हैं कि अगर नंदी की जगह उनकी पत्नी अभिलाषा को टिकट दिया जाता जो ब्राह्मण भी है, तो शहर दक्षिणी में भाजपा की सम्भावना बढ़ जाती.

पूजा का मुकाबला ऋचा से

इलाहाबाद शहर पश्चिमी से बसपा नेता पूजा पाल का मुकाबला इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रसंघ अध्यक्षा ऋचा सिंह से है जो सपा के टिकट पर पूजा को चुनौती दे रही हैं. ऋचा के सामने एक मुसीबत पेश आ रही है उनका बाहरी होना. पूजा पाल पर क्षेत्र में काम न करने का आरोप है लेकिन मुकाबले को भाजपा के सिद्धार्थ सिंह ने त्रिकोणीय बना दिया. सिद्धार्थ, लाल बहादुर शास्त्री के परिवार से आते हैं.

सिद्धार्थ पिछले काफी समय से दिल्ली में रहकर भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में काम करते रहे हैं और पार्टी के प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. बाहरी होना उनके लिए भी मुसीबत का सबब है.

इलाके में परचून की दुकान चलाने वाले रामगोपाल साव कहते हैं, 'ऋचा नई उमर की है. उनमें राजनैतिक समझ भी कम है. अचानक से उनको उम्मीदवार बनाना सही है.

क्या होगा इलाहाबाद में

यह जानने की कोशिश में हम सिविल लाइन पहुंचे. काफी हाउस में हमेशा की तरह नेताओं और बुद्धिजीवियों का जमावड़ा हो रखा था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता अभय अवस्थी उर्फ बाबा कहते हैं, '12 में से 11 विधानसभा सीटों पर भाजपा ने बाहरी उम्मीदवार उतारे हैं, शायद भाजपा यह भूल गई है कि 84 के चुनाव के बाद से इलाहाबाद ने गगन बिहारी (हवा में उड़ने वाले) नेताओं को तवज्जो देना बंद कर दिया है.'

गौरतलब है कि 84 में इलाहाबाद संसदीय सीट से अमिताभ बच्चन सांसद चुने गए थे. लेकिन डेढ़ साल के कार्यकाल में वो इलाहाबाद कभी नहीं दिखे. बाबा कहते हैं, 'जनता वोट देने से पहले यह देखती है कि प्रत्याशी हमारे बीच का है कि नहीं. बेटियों की शादी होगी तो दरवाजे पर खड़ा होगा कि नहीं. अपने जैसा है कि नहीं.'

बाबा के बगल में बैठे एक अन्य शख्स ने तपाक से कहा, डॉ जोशी इसी अवगुण के कारण फेल हो गए. उन्होंने इलाहाबाद की जनता को नहीं अपनाया उनके घर में जाने पर जूते खोलकर, पैर साफ़ कर जाना होता था. जब हम बाबा से इलाहाबाद की सीटों पर संभावित परिणामों की बात करते हैं तो वो कहते हैं कि शातिर बनिया से इरानी तुर्क ज्यादा बेहतर होता है. बाबा का इशारा शहर दक्षिणी के नेता की ओर है.

मिलाजुलाकर इलाहाबाद में किसी की लहर नहीं है. जनता उलझी हुई है और पत्रकार उससे ज्यादा दुविधा में हैं.

First published: 18 February 2017, 9:19 IST
 
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