Home » उत्तर प्रदेश चुनाव » Two-thirds of UP has voted. Who is ahead at this stage?
 

दो तिहाई वोटिंग हो चुकी, अभी तक किसने मारी बाज़ी

अतुल चंद्रा | Updated on: 27 February 2017, 9:52 IST


उत्तर प्रदेश में अगली सरकार कौन बना रहा है यह सवाल हर बैठक, नुक्कड़, चाय और पान की दुकान पर लोगों की चर्चा का विषय बना हुआ है. इस सवाल के कई प्रकार जवाब यहां पर सुने जा सकते हैं जो कि जाति और सांप्रदायिक फैक्टर्स या चुनाव क्षेत्र के लोगों से चर्चा या फिर व्यक्ति के राजनीतिक रुझान पर आधारित होते हैं. इन जवाबों में कहीं कोई एक पार्टी जीत रही होती है तो किसी के जवाब में कोई दूसरी और अन्य के जवाब में कोई और.

चार चरणों के चुनाव के बाद मतदाता अब तक 262 विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला कर चुके हैं, जो कि राज्य की कुल विधायक संख्या का लगभग दो—तिहाई है. चार चरणों के बाद हर राजनीतिक दल जीत का दावा कर रहा है और अगली सरकार का गठन करने के लिए आश्वस्त है.

भारतीय जनता पार्टी 262 सीटों में से 150 सीटें जीतने का दावा कर रहा है, सपा और कांग्रेस पार्टी का गठबंधन 55 से 60 प्रतिशत सीटें यानी 157 सीटें जीतने का दावा कर रहा है. बहुजन समाज पार्टी इस मामले में अलग रही कि उसकी तरफ से सिर्फ यही दावा किया गया कि वह फिर से सत्ता में आएगी पर उसकी तरफ से यह नहीं बताया गया कि वह कितनी सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है.


राजनीतिक दलों के इन दावों पर इसका कोई असर नहीं है कि नोटबंदी का क्या असर हुआ और इसके कारण एटीएम और बैंकों के बाहर पैसे निकालने के लिए कितनी लंबी लाइन लगी रही. समाजवादी पार्टी के प्रथम परिवार में चली भद्दी अंदरुनी कलह पर भी वे कोई ध्यान नहीं देना चाहते या फिर राज्य की राजनीति में कांग्रेस की हाशिये पर उपस्थिति या लॉ एंड ऑर्डर के मुद्दे को भी भूल जाइए. राज्य की राजनीति के ये तीन प्रमुख राजनीतिक किरदार अपने इन महत्वाकांक्षी दावों में कोई कमी नहीं करना चाहते और वे अपनी जीत के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हैं.

 

भाजपा अतिउत्साहित


सबसे पहले भाजपा. इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का दावा है कि पार्टी को राज्य में 265 या उससे अधिक सीटें मिलेंगी. पार्टी के राज्य महासचिव विजय बहादुर पाठक तो एक क्षण भी सोचे बिना कहते हैं कि हम एक बिल्कुल स्पष्ट बढ़त की स्थिति में हैं और बेशक सरकार बनाने जा रहे हैं क्योंकि लोगों ने बदलाव के लिए वोट दिया है. पाठक के अनुसार नोट बैन कहीं कोई मुद्दा ही नहीं था.

पार्टी के एक और पदाधिकारी का दावा है कि भाजपा को प्रथम चार चरणों में 150 सीटें मिलने जा रही हैं और उन्होंने दावा किया कि वे इसका विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से ब्योरा भी दे सकते हैं. इस तरह से अमित शाह के 265 सीटों के आंकड़े तक पहुंचने के लिए भाजपा को बची हुई 141 सीटों में से 115 सीटों पर जीत हासिल करनी होगी, जिसकी संभावना बहुत कम लगती है.

जाटों की नाराजगी कोई मुद्दा था क्या? यह पूछे जाने पर इस पदाधिकारी ने दावा किया कि जो भी मतभेद थे वे चुनाव शुरू होने के पहले सुलझा लिए गए थे और उन्होंने दावा कि हमारा ओबीसी वोट पूरी तरह से हमारे साथ है तथा दलित भी हमसे नाराज नहीं हैं. जीत के प्रति हमारे भरोसे का कारण यही है.


जीत के प्रति इस तरह से आश्वस्त होने के बावजूद पार्टी को फिर अपने चुनावी अभियान में सांप्रदायिक मुद्दे उठाने की जरूरत क्यों पड़ी, इस बारे में इस पदाधिकारी का कहना है कि माहौल का सांप्रदायिकीकरण भाजपा ने नहीं किया बल्कि उसके लिए किसी एक समुदाय को वरीयता के आधार पर ट्रीटमेंट देने वाले दल जिम्मेदार हैं.

 

यहां तक कि इस पदाधिकारी का दावा है इटावा से जसवंतनगर को छोड़कर भाजपा सभी सीटों पर जीत दर्ज करेगी. दरअसल जसवंतनगर से शिवपाल सिंह यादव उम्मीदवार हैं जिनको अखिलेश—रामगोपाल कैंप से भितरघात का डर लगा हुआ है.

 

सपा का दावा 300

 

दूसरी तरफ सपा का दावा है कि उसके कांग्रेस के साथ गठबंधन को 300 से अधिक सीटें मिलेंगी. यह हैरान करने वाला आंकड़ा उसके बावजूद है कि पार्टी पिछले दिनों भारी आंतरिक कलह से जूझ चुकी है. कांग्रेस से गठबंधन के बिना सपा को 250 सीटें मिलतीं यह बात अखिलेश बार—बार दोहरा चुके हैं.

सपा की प्रवक्ता डॉ मधु गुप्ता का कहना है कि हमें उम्मीद है कि हम 300 से अधिक सीटें जीतेंगे पर चार चरणों के बाद पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी इसका फिलहाल कोई आंकड़ा नहीं दिया जा सकता. डॉ गुप्ता का कहना है कि डिमोनेटाइजेशन और विकास ऐसे दो मुद्दे हैं जो लोगों को सपा की ओर ला रहे हैं.


वहीं कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत का दावा है कि मतदाताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोधी और समर्थक के रूप में बांटा जा सकता है. राजपूत के अनुसार मोदी विरोधी कैंप के नेता अखिलेश हैं जिनको राहुल गांधी ने भी समर्थन दिया है. साथ ही राजपूत का दावा है कि दोनों नेताओं के युवोचित उत्साह और आकर्षण ने सारे जाति के बंधन तोड़ दिए हैं और इसने हमारी अपील 40 से 50 लाख युवाओं तक बनाई जो कि अपने को मोदी के बजाय अखिलेश और राहुल के ज्यादा करीब पाते हैं. राजपूत का कहना है कि गठबंधन को 55 से 60 प्रतिशत सीटें पहले चार चरण में मिलना चाहिए.

 

भाजपा की लड़ाई बसपा से

 

भाजपा और इन गठबंधन सहयोगियों की मानें तो बसपा तो कहीं प्रतिस्पर्धा में है ही नहीं. राजपूत का कहना है कि बसपा अपने को कहीं भी मोदी विरोधी के रूप में प्रोजेक्ट नहीं कर सकी, इसलिए वह अब तीसरे स्थान पर खिसक चुकी है.


वहीं लखनउ विवि के प्रोफसर और विवि के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष, जो कि आरएसएस के करीबी माने जाते हैं, का कहना है कि भाजपा की लड़ाई बसपा से ही है क्योंकि मुस्लिम सपा और कांग्रेस के गठबंधन को टिकाउ नहीं मानते इसलिए वे मायावती की ओर अधिक झुके हुए हैं. लेकिन उनका दावा है कि चार चरणों के चुनाव के बाद भाजपा नि:संदेह रूप से सबसे बेहतर स्थिति में है.


ध्रुवीकरण के बारे में प्रोफेसर द्विवेदी का कहना है कि ये बांटनेवाली राजनीति तो सभी पार्टियां कर रही हैं लेकिन होली, दीवाली और रमजान का मोदी द्वारा उपयोग इसलिए किया गया कि आम आदमी इन शब्दों को ज्यादा आसानी से समझता है.

 

First published: 27 February 2017, 9:52 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी