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पश्चिमी यूपी के पांच विवादित नेता जिन्होंने बदल दिए सियासी समीकरण

सुधाकर सिंह | Updated on: 11 February 2017, 5:39 IST
(प्रियता ब्रजबासी/कैच न्यूज़)

यूपी के चुनावी दंगल में पहले चरण के लिए सियासी बिसात बिछ चुकी है. पश्चिमी यूपी में 15 जिलों की 73 विधानसभा सीटों पर 11 फरवरी को मतदान होना है.  

इस चरण में तकरीबन साढ़े तीन साल पहले सांप्रदायिक दंगों का दंश झेल चुके मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़िले भी शामिल हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ध्रुवीकरकण के माहौल में हुए चुनाव में बीजेपी ने इलाक़े की सभी सीटें जीती थीं. इस बार के चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन, बीएसपी, बीजेपी के साथ ही चौधरी अजित सिंह की अगुवाई वाली राष्ट्रीय लोकदल के लिए भी परीक्षा की घड़ी है. 

ध्रुवीकरण की बिसात बिछाने में नेताओं के विवादित बयानों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. इस बार भी चुनाव प्रचार के दौरान आपत्तिजनक शब्दावली और बयानों का जमकर इस्तेमाल हुआ है. एक नज़र पश्चिमी यूपी के पांच विवादित नेताओं पर:

आज़म ख़ान

फाइल फोटो

आज़म ख़ान समाजवादी पार्टी का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा हैं. 1980 में पहली बार रामपुर से विधायक बने. आठ बार रामपुर से विधायक रह चुके आज़म केवल एक बार 1996 के विधानसभा चुनाव में हारे हैं. सूबे के लोक निर्माण और संसदीय कार्यमंत्री का ओहदा उनके पास है. रामपुर की स्वारटांडा सीट से इस बार उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म भी सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. 

हालांकि आज़म ख़ान अपने विवादित बयान और तंज कसने के लिए भी जाने जाते हैं. मुज़फ़्फ़रनगर में सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि को लेकर बीजेपी ने आरोप लगाए कि आज़म के दबाव की वजह से पुलिस ने एकतरफ़ा कार्रवाई की, जिससे वहां दंगे भड़के. वहीं आज़म इसके लिए आरएसएस और बीजेपी को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं. एक टीवी चैनल के स्टिंग में भी आज़म को कठघरे में खड़ा किया गया. हालांकि इसकी सत्यता प्रमाणित नहीं हो सकी. 

इस बार के चुनाव में आज़म ख़ान का एक बयान काफ़ी चर्चित रहा है. रामपुर की चुनावी सभा में आज़म ने कहा कि 131 करोड़ लोगों का बादशाह लखनऊ के रामलीला मैदान में रावण का पुतला फूंकता है, लेकिन वह ये भूल जाता है कि सबसे बड़ा रावण दिल्ली में रहता है, लखनऊ में नहीं. आज़म के इस बयान को पीएम मोदी पर तंज माना गया. 

संगीत सोम

फेसबुक

संगीत सोम को अगर पश्चिमी यूपी का सबसे विवादित चेहरा कहा जाए, तो शायद ग़लत नहीं होगा. मेरठ की सरधना सीट से संगीत सोम भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं. उनके ख़िलाफ समाजवादी पार्टी ने अतुल प्रधान को उतारा है. 2009 में संगीत सोम मुज़फ़्फ़रनगर सीट से ही लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं.

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में अभियुक्त संगीत सोम पर सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल करके समुदाय विशेष के लोगों को भड़काने का आरोप लगा. 2013 में हुए दंगों के बाद उनके भड़काऊ भाषण का वीडियो भी सामने आया था. संगीत सोम लगातार वेस्ट यूपी की सियासत को गरमाते रहते हैं. 

मुजफ्फरनर दंगों में संगीत सोम की भूमिका कठघरे में है. उन्हें कवाल कांड का फर्जी वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के मामले में गिरफ्तार भी किया गया था. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों की कथित पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म शोरगुल को वेस्ट यूपी में रिलीज न होने देने की धमकी दी थी. इस वजह से फिल्म वेस्ट यूपी में नहीं प्रदर्शित हो सकी. फिल्म में जिमी शेरगिल का रोल संगीत सोम से प्रेरित बताया जा रहा था. 

पिछले साल 17 जून को संगीत सोम ने शामली जिले के कैराना में कथित पलायन को लेकर निर्भय यात्रा निकालने का एलान किया था, जिससे इलाक़े में सांप्रदायिक तनाव का ख़तरा बढ़ गया था. पुलिस की सख्ती के चलते सोम को निर्भय यात्रा स्थगित करनी पड़ी थी.   

सुरेश राणा

फाइल फोटो

पश्चिमी यूपी की राजनीति में एक और विवादित चेहरा है सुरेश राणा का. राणा मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले से सटे शामली जिले की थाना भवन सीट से बीजेपी विधायक हैं. इस बार भी पार्टी ने उनके चेहरे पर ही भरोसा जताया है. 

सुरेश राणा 2013 से ही विवादों में घिरे रहे हैं. मुज़फ्फ़रनगर ज़िले के मंगला मंदौड़ में हुई महापंचायत में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया था. उनका नाम मुजफ्फरनगर दंगों के मुख्य अभियुक्तों में से एक था. तभी से उनकी छवि एक स्थानीय कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की बन गई है जो बढ़ती ही जा रही है.

सुरेश राणा जब भी चुनावी सभाओं को संबोधित करते हैं, तो ज़हरीली बयानबाज़ी उनकी प्राथमिकता में होती है. पश्चिमी यूपी के चुनावी माहौल में भावनाएं भड़काने वाले नेताओं में राणा की गिनती होती है. यकीन न हो तो उनका हाल का ये बयान देखिए. 

एक चुनावी सभा में सुरेश राणा ने कहा, "यदि मैदान मार दिया तो कैराना में, देवबंद में, मुरादाबाद में कर्फ्यू लग जाएगा मित्रों. भारत माता की जय लगाते हुए शामली से थाना भवन तक जुलूस होगा. सारे भाई-बहनों का आदर करते हुए और हर-हर महादेव का नारा लगाते हुए भगवा लहराएंगे. बोलो भारत माता की जय."

इमरान मसूद

फेसबुक

इमरान मसूद 2014 के लोकसभा चुनाव में उस वक़्त चर्चा में आए, जब उन्होंने बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी की. इमरान मसूद का यह विवादित वीडियो चुनाव के दौरान जमकर वायरल हुआ था. हालांकि उनकी तरफ़ से सफ़ाई देते हुए इसे काफ़ी पहले का वीडिया बताया गया था. 

इमरान मसूद 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर सहारनपुर सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे. हालांकि बीजेपी के राघव लखनपाल ने उनको चुनाव में मात दे दी थी. लोकसभा चुनाव के बाद जुलाई 2014 में सहारनपुर में सांप्रदायिक दंगे में इमरान मसूद की कथित भूमिका पर सवाल उठे थे. 

हाल ही में जब निर्मल खत्री की जगह राज बब्बर को यूपी कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, तो इमरान मसूद को प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई. सहारनपुर की नकुड़ विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर इस बार वह चुनाव मैदान में हैं. इमरान मसूद पूर्व केंद्रीय मंत्री रशीद मसूद के भतीजे हैं. सहारनपुर लोकसभा चुनाव में रशीद मसूद ने अपने बेटे शाजान मसूद को सपा से टिकट दिलवाया था, इसी वजह से इमरान ने सपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था.

कादिर राणा

पत्रिका

वेस्ट यूपी की एक और विवादित सियासी शख़्सियत हैं कादिर राणा. बहुजन समाज पार्टी से ताल्लुक रखते हैं. मुज़फ़्फ़रनगर से पूर्व बसपा सांसद कादिर राणा का नाम भी मुज़फ़्फ़रनगर सांप्रदायिक दंगों में सामने आया था. 

उनका एक विवादित वीडियो भी सोशल मीडिया पर पोस्ट हुआ था. इस वीडियो में कथित रूप से कादिर राणा एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ टिप्पणी करते नज़र आ रहे थे. तीन महीने तक गिरफ़्तारी से बचने के बाद कादिर राणा ने 17 दिसंबर 2013 को एक स्थानीय अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों की पृष्ठभूमि में हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में कादिर को बीजेपी के संजीव बालियान ने शिकस्त दी थी. 

इस बार के विधानसभा चुनाव में कादिर राणा की पत्नी सैयदा बेगम मुज़फ़्फ़रनगर की बुढ़ाना सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. इसी सीट से कादिर ने पहले बतौर निर्दलीय उम्मीदवार पर्चा भरा था, लेकिन बाद में उन्होंने नाम वापस ले लिया.  

इस साल जनवरी में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल करते हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के आरोपियों के विधानसभा चुनाव लड़ने पर रोक की मांग की गई थी. इसमें कादिर राणा का नाम भी शामिल था. हालांकि जस्टिस डीबी भोंसले और जस्टिस यशवंत वर्मा की बेंच ने 23 जनवरी को ये जनहित याचिका ख़ारिज कर दी थी.  

कादिर राणा 2007 में समाजवादी पार्टी छोड़कर राष्ट्रीय लोकदल और 2009 में बसपा में शामिल हुए थे. उनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और लूटपाट सहित कई आपराधिक मामले दर्ज हैं. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में 60 से ज्यादा लोग मारे गए थे, जबकि 40 हजार से ज़्यादा आबादी विस्थापित होकर राहत कैंपों में रहने को मजबूर हो गई थी.

First published: 9 February 2017, 2:23 IST
 
सुधाकर सिंह @sudhakarsingh10

कैच हिंदी, अवध के बलरामपुर से ज़िंदगी के सफ़र की शुरुआत. पत्रकारिता की यात्रा दिल्ली में जारी.

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