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चौथे चरण की बिछी चौसर, 'राजा' के कुंडा में नारा- आरी सब पर भारी

सुधाकर सिंह | Updated on: 21 February 2017, 16:12 IST

यूपी में चौथे चरण के विधानसभा चुनाव की चौसर बिछ चुकी है. इस चरण में 12 जिले की 53 सीटें आती हैं, जिनमें प्रतापगढ़ की 7, कौशांबी की 3, इलाहाबाद की 12, फतेहपुर की 6 और रायबबरेली की 6 सीटें हैं. इसके अलावा सूखे और जलसंकट से जूझते बुंदेलखंड इलाके में भी इसी चरण में मतदान है. बुंदेलखंड का ज्यादा इलाक़ा तो मध्य प्रदेश में है, लेकिन इसमें यूपी के सात जिले भी शामिल हैं. बुंदेलखंड की 19 विधानसभा सीटों पर इसी चरण में वोटिंग है, जिनमें जालौन में 3, झांसी में 4, ललितपुर में 2, महोबा में 2, हमीरपुर में 2, बांदा में 4 और चित्रकूट में 2 सीटें हैं. एक नज़र चौथे चरण के कुछ दिलचस्प मुक़ाबलों पर:   

रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया- कुंडा सीट

फाइल फोटो

गुंडा विहीन कुंडा करौं, ध्वज उठाय दोउ हाथ. आज से 21 साल पहले साल 1996 में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का ये जुमला काफी चर्चित हुआ था. इलाहाबाद से सटे प्रतापगढ़ ज़िले के कुंडा कस्बे में कल्याण सिंह ने एक जनसभा के दौरान यह एलान किया था. हालांकि ये भी हक़ीक़त है कि पिछले 24 साल से कुंडा के 'राजा' का विजय रथ रुका नहीं है. 

1993 में 26 साल की उम्र में कुंडा से पहली बार निर्दलीय विधायक निर्वाचित हुए रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया को कल्याण सिंह से लेकर मुलायम सिंह ने मंत्री की कुर्सी से नवाज़ा. अखिलेश यादव ने भी राजा भैया को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी. यूपी में सरकारें बदलीं, लेकिन कुंडा के 'राजा' का रसूख कायम रहा, केवल एक बसपा सरकार को छोड़कर. 2002 में मायावती की सरकार में राजा भैया को जेल की हवा तक खानी पड़ी, पोटा (आतंकवाद निरोधक कानून) का केस भी चला. 

2 मार्च 2013 को कुंडा के डीएसपी जियाउल हक हत्याकांड में आरोपों के बाद राजा भैया को अखिलेश सरकार में जेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. हालांकि सीबीआई जांच में क्लीन चिट मिलने के बाद सीएम अखिलेश ने उन्हें फिर स्टांप एवं रजिस्ट्री मंत्री बना दिया. प्रतापगढ़ की भदरी रियासत के पूर्व राजा उदय प्रताप सिंह के पुत्र राजा भैया के बाबा बजरंग बहादुर सिंह हिमाचल प्रदेश के पहले राज्यपाल थे.  

कुंडा सीट पर कभी कांग्रेस का डंका बजता था. 1962 से 1989 तक कांग्रेस के नियाज हसन इस सीट से पांच बार विधायक चुने गए. पांच बार से लगातार निर्दलीय विधायक राजा भैया को 2002, 2007 और 2012 में सपा ने अपना समर्थन दिया था. 2012 के विधानसभा चुनाव में राजा भैया ने 88000 से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की थी, जो इस चुनाव में सबसे बड़ा अंतर था.

इस बार भी सपा ने राजा के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा है. वहीं गठबंधन की वजह से कांग्रेस से भी वॉक ओवर है. केवल पांच उम्मीदवार मैदान में हैं. बसपा से परवेज़ अख़्तर और बीजेपी से जानकी शरण पांडे चुनाव लड़ रहे हैं. आरी चुनाव निशान से मैदान में उतरे राजा भैया के समर्थन में एक नारा ज़ोर पकड़ रहा है- आरी सब पर भारी.

अदिति सिंह- रायबरेली सदर

पत्रिका

28 साल की अदिति सिंह रायबरेली सदर सीट से कांग्रेस की उम्मीदवार हैं. अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी से एमबीए करने वाली अदिति ने कुछ कंपनियों में भी इंटर्नशिप की, लेकिन सियासत की विरासत उन्हें अपने देश और शहर खींच लाई. 2013 में रायबरेली लौटने के बाद एक एनजीओ खोला. लेकिन अदिति की इस पहचान के इतर उनकी एक और पहचान है. जी हां वह बाहुबली नेता अखिलेश सिंह की बेटी हैं.

रायबरेली से पांच बार विधायक रहे अखिलेश सिंह की बेटी अदिति को लोग डॉन की बेेटी के तौर पर भी देखते हैं. अखिलेश सिंह पर रायबबरेली में कई आपराधिक मामले दर्ज हैं. बताया जाता है कि गिरती सेहत की वजह से अखिलेश सिंह ने अब अपनी बेटी को राजनीतिक विरासत सौंपी है. हालांकि प्रियंका गांधी को अपना राजनीतिक गुरु मानने वाली अदिति राजनीति बदलने की चाह रखती हैं. अदिति कहती हैं कि वह बचपन से प्रियंका से प्रभावित रही हैं. अदिति के मुताबिक कुछ महीने पहले दिल्ली में मुलाकात के दौरान प्रियंका ने उनसे कांग्रेस में शामिल होने को कहा, जिसके बाद वे हाथ के साथ आ गईं.  

अदिति को डॉन की बेटी का टैग पसंद नहीं है. राजस्थान पत्रिका को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "मेरे पिता बाहुबली नेता नहीं हैं, उनकी इमेज ऐसी बना दी गई है. वे जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं. हमेशा जीतते रहे हैं. उनके विरोधी शायद यह पचा नहीं पाते. मेरा मानना अगर आप जनता के लिए काम करेंगे तो जरूर जीतेंगे."

अखिलेश सिंह पर मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी हत्याकांड में आरोप लगे थे. वहीं सपा एमएलसी अजीत सिंह की संदिग्ध मौत में उन पर सवाल उठे थे. अब अदिति कहती हैं कि चुनाव में जीती तो मैं यूपी की राजनीति बदलना चाहती हूं. सपा ने गठबंधन की वजह से यहां उम्मीदवार नहीं उतारा है. अमेठी और रायबरेली की 10 सीटों में यह इकलौती सीट है जहां कांग्रेस को सबसे ज़्यादा जीत की उम्मीद है.

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नंद गोपाल गुप्ता नंदी- इलाहाबाद दक्षिण सीट

पत्रिका

पहले बसपा फिर कांग्रेस और अब बीजेपी में शामिल सूबे के पूर्व कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता उर्फ नंदी की वजह से इलाहाबाद दक्षिण सीट पर दिलचस्प लड़ाई है. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और यूपी विधानसभा के पूर्व स्पीकर केसरी नाथ त्रिपाठी इस सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं. 2007 के विधानसभा चुनाव में कारोबार से सियासत में आए नंदी ने पंडितजी के नाम से शहर में मशहूर केसरीनाथ त्रिपाठी को पटखनी देकर चौंका दिया था. मायावती ने अपनी सरकार में नंदी को मंत्री की कुर्सी से नवाज़ा.

2012 में इस सीट से सपा के परवेज टंकी ने जीत हासिल की थी. इस सीट पर कारोबारी और मुस्लिम वोट की हार-जीत में अहम भूमिका रहती है. पौने चार लाख मतदाताओं में से मुस्लिम वोटर की तादाद सवा लाख के करीब है. बसपा ने हाजी माशूक ख़ान को टिकट देकर सपा-कांग्रेस गठबंधन के लिए मुश्किल बढ़ा दी है. सपा ने इस बार भी परवेज टंकी पर भरोसा जताया है. नंदी के लिए भी राह आसान नहीं है.

टिकट बंटवारे से महज 40 घंटे पहले नंदी बीजेपी में शामिल हुए और टिकट हासिल कर लिया. इससे बीजेपी कार्यकर्ताओं में नाराजगी है. नंदी को बीजेपी के संभावित ब्राह्मण मतदाता के विरोध से भी जूझना पड़ रहा है. बीजेपी उम्मीदवार बनने के बाद नंदी और उनकी मेयर पत्नी अभिलाषा ने इलाहाबाद आकर दीन दयाल उपाध्याय की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया था. बीजेपी कार्यकर्ताओं ने जल से प्रतिमा को शुद्ध करके अपने गुस्से का इज़हार किया था.

First published: 21 February 2017, 16:12 IST
 
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