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पूर्वांचल के डॉन रिज़वान क्या अपनी बेटी ज़ेबा को जिता पाएंगे?

सुधाकर सिंह | Updated on: 10 February 2017, 7:56 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

'बिल्ली नहीं बलवान चाहिए, उमर नहीं रिज़वान चाहिए'...पूर्वी उत्तर प्रदेश के अवध इलाक़े के छोटे से क़स्बे बलरामपुर में यह नारे 13 साल पहले यानी 2004 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान लगे थे. वजह भी साफ़ थी. इस चुनाव में दबंग छवि वाले रिज़वान ज़हीर का मुक़ाबला एक दूसरे बाहुबली बीजेपी के बृजभूषण शरण सिंह से था. नारे में जिसको बिल्ली कहा गया वो सपा के उम्मीदवार डॉक्टर मोहम्मद उमर थे. 

इस चुनाव में रिज़वान ज़हीर 57 हज़ार से ज़्यादा वोटों से बीजेपी के बृजभूषण शरण सिंह से हार गए थे. शिकस्त के बाद डॉन रिज़वान के सितारे गर्दिश में चले गए और अगले दो लोकसभा चुनाव यानी 2009 और 2014 में श्रावस्ती लोकसभा सीट से उन्हें हार ही नसीब हुई. 2009 में बतौर बसपा उम्मीदवार और 2014 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में.   

13 साल में रिज़वान जहीर ने कई पार्टियां बदलीं, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई. पिछले साल कांग्रेस के यूपी प्रभारी ग़ुलाम नबी आज़ाद और प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर की मौजूदगी में रिज़वान ज़हीर ने तुलसीपुर क़स्बे में बड़ी जनसभा के ज़रिए अपना शक्ति प्रदर्शन किया और हाथ का साथ थाम लिया. 

लेकिन यूपी के इस बार के विधानसभा चुनाव में रिज़वान नहीं उनकी बेटी ज़ेबा रिज़वान इलाक़े में चर्चा का विषय बनी हैं. वजह है पिता की पुश्तैनी सीट तुलसीपुर, जिस पर अब बेटी ने पिता की राजनीतिक विरासत को बचाने के लिए ताल ठोकी है. पांचवें चरण में 27 फरवरी को यहां मतदान होना है.

अपने पिता रिज़वान ज़हीर की मौजूदगी में तुलसीपुर सीट से नामांकन दाखिल करतीं ज़ेबा रिज़वान. (फेसबुक)

तुलसीपुर सीट से भरा पर्चा

समाजवादी पार्टी ने पहले इस सीट से वर्तमान विधायक मशहूद खां को अपना उम्मीदवार बनाया था, लेकिन कांग्रेस के साथ सपा का चुनावी गठबंधन हो गया. ज़ेबा बतौर कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. 

उनको सिंबल मिलने की पुष्टि कांग्रेस के ज़िलाध्यक्ष अनुज कुमार सिंह ने भी की है. अब जिले में बलरामपुर सदर (सुरक्षित) सीट से शिवलाल के अलावा तुलसीपुर सीट भी कांग्रेस के खाते में गई है. तुलसीपुर सीट से ज़ेबा के ख़िलाफ़ बीजेपी से कैलाश नाथ शुक्ला और बीएसपी से केके सचान भी चुनावी समर में हैं. 

पत्रकारिता में पीजी हैं जेबा  

रिज़वान के समर्थक हसीब अहमद ख़ान ने सोशल मीडिया पर ज़ेबा के पर्चा भरने की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है, "ज़ेबा रिज़वान का निशान हाथ का पंजा." कांग्रेस ज़िलाध्यक्ष अनुज कुमार सिंह ने कैच को बताया कि ज़ेबा ने विदेश से मास कम्युनिकेशन (पत्रकारिता एवं जनसंचार) की पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री हासिल की है. पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद अब सियासत की सीढ़ी चढ़ने को जेबा तैयार दिखती हैं.  

नए ज़माने की पीढ़ी की सोच से वाकिफ़ ज़ेबा का प्रचार अभियान सोशल मीडिया पर भी ख़ूब परवान चढ़ रहा है. मसलन तुलसीपुर विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में जनसंपर्क अभियान की तस्वीर पोस्ट करने के साथ कमेंट में लिखा है, "सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो, सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो."  

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ज़िले में बदलेंगे सियासी समीकरण!

इसी तरह एक और कमेंट में लिखा है, "हम तो निकले थे अकेले ही मंज़िल की तरफ़, राहों में लोग मिलते रहे और कारवां बनता गया." ज़ेबा रिज़वान को इलाक़े में अपने पिता की पकड़ का फ़ायदा भी मिल रहा है और प्रचार अभियान में लोगों पर उनका असर नज़र आ रहा है. 

जिले की सियासत को क़रीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर मधुकर सिंह कहते हैं, "ज़ेबा रिज़वान के चुनाव मैदान में उतरने से युवा पीढ़ी भी काफ़ी उत्साहित है. इसका असर ज़िले की बाक़ी तीन विधानसभा सीटों गैंसड़ी, बलरामपुर (सुरक्षित) और उतरौला पर भी पड़ना तय है." 

ज़ेबा को युवा वर्ग और कांग्रेस के कोर वोट के साथ ही मुस्लिम वोटों का भी अच्छा ख़ासा हिस्सा मिलने की उम्मीद है. उनके पिता रिज़वान ज़हीर की ज़िले के मुस्लिम वोटबैंक पर पकड़ रही है. जिसकी बदौलत वह पहली बार तुलसीपुर सीट से विधायक बने. इसके अलावा 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में बलरामपुर से सांसद बनने में भी कामयाबी हासिल की. ऐसे में इस बार देखना दिलचस्प होगा कि रिज़वान ज़हीर अपनी बेटी की सियासी किस्मत का सितारा चमकाने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं.

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First published: 10 February 2017, 7:56 IST
 
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