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उत्तर प्रदेश महागठबंधन: अखिलेश + कांग्रेस + आरएलडी - सपा?

फ़ैसल फ़रीद | Updated on: 11 February 2017, 6:41 IST
QUICK PILL
  • हालात ऐसे हैं जिसमें बहुत संभव है कि एक बार फिर से अखिलेश-शिवपाल के बीच टिकट बंटवारे को लेकर आर-पार की जंग हो.
  • शिवपाल यादव ने अब तक जिन उम्मीदवारों की सूची जारी की है उनमें अखिलेश समर्थकों का लगभग सफाया हो गया है.
  • मौजूदा सरकार में अखिलेश सममर्थक माने जाने वाले करीब 80 फीसदी लोगों के टिकट कट चुके हैं या कटने की आशंका है.
  • इनमें कई वर्तमान विधायक और मंत्री भी हैं, जैसे रामगोविंद चौधरी, ललई यादव आदि के टिकट भी कटने की अटकले हैं.

हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी के भीतर घटे घटनाक्रम से एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है. उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष शिवपाल यादव ने अब तक जिन उम्मीदवारों की सूची जारी की है उनमें अखिलेश समर्थकों का लगभग सफाया हो गया है. मौजूदा सरकार में अखिलेश सममर्थक माने जाने वाले करीब 80 फीसदी लोगों के टिकट कट चुके हैं या कटने की आशंका है. इनमें कई वर्तमान विधायक और मंत्री भी हैं, जैसे रामगोविंद चौधरी, ललई यादव आदि के टिकट भी कटने की अटकले हैं. कमोबेश पार्टी संगठन में भी यही हाल है. यहां भी अखिलेश समर्थकों को शिवपाल यादव ने एक सिरे से बाहर कर दिया है. ले-देकर अखिलेश यादव के युवा समर्थक किसी तरह सरकार के दम पर खुद को प्रासंगिक बनाए हुए हैं.

हालात ऐसे हैं जिसमें बहुत संभव है कि एक बार फिर से चाचा और भतीजे के बीच टिकट बंटवारे को लेकर आर-पार की जंग हो. अखिलेश यादव के लिए परिस्थितियां ऐसी हो गई हैं कि उन्हें खुद को ताकतवर बनाए रखने के लिए कोई न कोई कदम उठाना मजबूरी हो गई है. अखिलेश यादव के एक करीबी साथी के मुताबिक बहुत संभव है कि कांग्रेस और आरएलडी से अखिलेश यादव महागठबंधन बनाए लेकिन इसमें सपा (शिवपाल धड़ा) शामिल नहीं हो.

अखिलेश के पास सिर्फ दो विकल्प हैं- या तो वो बेमन से चुनाव में जाएं या अपना रास्ता खुद बना लें

यह कोई नई बात नहीं है न ही यह असंभव हैं. क्योंकि अक्टूबर में ही शिवपाल यादव ने सपा कार्यालय में मुलायम के सामने अखिलेश यादव के ऊपर यह आरोप लगा दिया था की वे किसी भी दल से मिल कर चुनाव लड़ सकते हैं. हालांकि अखिलेश ने इस आरोप का कोई जवाब नहीं दिया था जिससे इन अटकलों को बल मिला कि शिवपाल के आरोप में कुछ न कुछ सच्चाई है.

अटकलें अखिलेश यादव के नई पार्टी बनाने को लेकर भी थी लेकिन मुलायम सिंह के बीच-बचाव के बाद वो बात खत्म हो गई थी. खुद अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से यह कहकर बात को विराम दिया था कि वे कभी भी सपा को नहीं तोड़ेंगे. लेकिन उन्हीं दिनों दिल्ली में इस बात की चर्चा थी कि अखिलेश ने अपने कुछ बेहद करीबी लोगों को चुनाव आयोग में सपा के चुनाव चिन्ह साइकिल से मिलते-जुलते निशान मोटरसाइकिल की संभावना तलाशने के लिए लगाया था.

आज की तारीख में अगर सपा गठबंधन से दूरी बनाती है तो ऐसे हालात में अखिलेश के पास सिर्फ दो विकल्प हैं- या तो वो बेमन से चुनाव में जाएं और ऐसे लोगों का प्रचार करें जिनको टिकट उनकी नापसंद के बावजूद मिला है, या फिर वो अपना रास्ता खुद बना लें. यहां इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि अखिलेश यादव सपा की पिछली दोनों चुनावी रैलियों (गाजीपुर और बरेली) में नामौजूद रहे हैं और कमान शिवपाल यादव के हाथ में रही हैं. गाजीपुर की रैली में तो शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव ने भी जनता को मंच से संबोधित किया.

अखिलेश ने की विधायकों संग बैठक

लिहाजा शुक्रवार को लखनऊ में जब अखिलेश यादव ने करीब 45 विधायकों और मंत्रियों के साथ बैठक की तो इस बात की सुगबुगाहट तेज हो गई कि वे अपने स्तर पर किसी गठबंधन की संभावना तलाश रहे हैं. उनके एक करीबी नेता ने भी इसकी पुष्टि की है कि अखिलेश यादव इस दिशा में सोच रहे हैं. जो स्थितियां सपा में बन गई हैं उनमें अखिलेश के लिए गठबंधन बहुत ज़रूरी हैं चाहे है वो सपा के रूप में हो या किसी नए दल के रूप में.

आने वाले कुछ दिनों में स्थिति साफ़ हो सकती हैं. सपा के बेहद करीबी लोगों की बात पर कान धरें तो ताज्जुब मत समझिएगा अगर नए गठबंधन में अखिलेश हों और सपा न हो. क्योंकि राजनीति में नेता जिस बात को हंस कर टाल देते हैं वो अक्सर सच्चाई में तब्दील हो जाती है.

जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश के चुनाव करीब आ रहे हैं वैसे-वैसे सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की सम्भावनाएं प्रबल होती जा रही हैं. अभी कोई अधिकारिक ऐलान नहीं हुआ हैं लेकिन यह कहा जा सकता है कि दोनों तरफ से बर्फ पिघल चुकी हैं.

शुक्रवार को दिल्ली में जदयू के नेता शरद यादव के घर पर हुई लंच डिप्लोमेसी के तहत कुछ बात आगे बढ़ने की उम्मीद थी. मौका पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के ऊपर लिखी पुस्तक के विमोचन समारोह का था. लेकिन इस मौके से नितीश कुमार, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने दूरी बनाए रखी.

गठबंधन का गणित

लखनऊ से जो खबरें आ रही हैं उसके हिसाब से सपा और कांग्रेस का गठबंधन होना अंतिम चरण में है. सूत्रों के अनुसार सपा 110सीटें देने को तैयार हैं. जिसमे 72 सीटें कांग्रेस और 38 सीटो पर अजित सिंह के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय लोक दल लड़ सकता हैं. सीटों की संख्या आखिरी समय में थोड़ी घट-बढ़ सकती हैं.

अब गठबंधन पर हो रही कवायद में देखा जाय तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई बार एलान कर चुके हैं की अगर मिल कर लड़े तो 300 सीटें जीत लेंगे. वो कांग्रेस से गठबंधन के पक्ष में हैं. अखिलेश के पास गठबंधन करना राजनितिक और समय की मजबूरी बनता जा रहा हैं. पहला वो चुनाव में ऐसा कोई दूसरा गठबंधन नहीं चाहते हैं जो गैर भाजपाई विकल्प के रूप में उभरे.

इसके अलावा अखिलेश की रणनीति इस गठबंधन के जरिये सपा की अंदरूनी उठा-पटक से निजात पाने की भी है. गठबंधन में मुख्यमंत्री पद पर केवल उनका चेहरा रहेगा. टिकट बंटवारा नए सिरे से होगा और गठबंधन की धुरी होने के कारण वो उसमे हस्तक्षेप कर सकते हैं. अभी टिकट बंटवारे में उनकी बात बिल्कुल नहीं सुनी जा रही है.

अपनी बात पर कायम रहना मुलायम सिंह की फितरत नहीं है लिहाजा दलों के नेता अखिलेश को बातचीत में तरजीह दे रहे हैं

गठबंधन सपा के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव भी चाहते हैं. सूत्रों की माने तो उनकी बात कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद से हो रही है. उनका सारा ध्यान सिर्फ इस पर है कि टिकट उनकी पसंद के लोगों को मिले. इसमें वो अखिलेश समर्थको के टिकट काट रहे हैं और आगे भी काट सकते हैं.

दूसरी और रामगोपाल यादव हैं जिनकी दुबारा सपा में वापसी हुई है और वो इस समय किसी अन्य विवाद में नहीं पड़ना चाहते. ज़ाहिर हैं उनके सामने अपना कैरियर हैं.

लखनऊ में सपा के बड़े नेताओं की माने तो गठबंधन के खिलाफ सिर्फ अमर सिंह और मुलायम सिंह ही हैं. मुलायम सिंह सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि किसी को विलय करना हो तो कर लें लेकिन गठबंधन नहीं करेंगे. हालंकि अपनी बात पर कायम रहना मुलायम सिंह की फितरत नहीं रही है. इसी के मद्देनजर तमाम दलों के नेता भी अखिलेश को बातचीत में ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. मुलायम सिंह की गंभीरता बिहार चुनाव में महागठबंधन के समय दिए गए झटके के कारण बहुत कम हो गई है.

जहां तक कांग्रेस की बात है तो उसके लिए गठबंधन ज़रूरी है. प्रशांत किशोर और अन्य तमाम तामझाम के बाद भी कांग्रेस प्रदेश में कही खड़ी होती नहीं दिखती. कांग्रेस की नज़र 2019 के लोकसभा चुनाव पर हैं. अकेले चुनाव लड़ कर वो फिर अपनी भद नहीं पिटवाना चाहते. उसका कहीं कोई जनाधार नहीं दिखता. वो किसी तरह सम्मानजनक चुनाव लड़ना चाहती हैं.

दूसरी ओर छोटे दल जैसे आरएलडी और जदयू के पास खोने को कुछ नहीं हैं. उनकी रणनीति जो मिले उसे लपक कर अपना वजूद बचाए रखने की है.

First published: 24 December 2016, 3:24 IST
 
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