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बनारस: इस बार भी भाजपा को मोदी मैजिक का आसरा

भारत भूषण | Updated on: 3 March 2017, 19:03 IST

वाराणसी में चुनाव का आलम कुछ ऐसा है मानो यहां दोबारा किसी को कोई मौका मिलेगा ही नहीं. ऐसा लग रहा है जैसे कोई युद्ध हो रहा हो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव डाला जा रहा है कि वे इस युद्ध में भाजपा के सेनापति बनें.
वाराणसी संसदीय सीट पिछले चुनावों में करिश्माई सीट साबित हुई. यहां से सांसद बन कर लोकसभा पहुंचे नरेंद्र मोदी आज देश के प्रधानमंत्री हैं.

दरअसल पूर्वांचल की चुनावी लहर की दिशा वाराणसी से ही तय होती है. इसीलिए करीब-करीब सारे केंद्रीय मंत्री कम से कम एक बार यहां अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं. पिछले ढाई सालों में यहां 210 वीआईपी दौरे हो चुके हैं. कई केंद्रीय मंत्री और सरकारी विभागों के अधिकारी विकास परियोजनाओं की संभावनाएं तलाशने के लिए वाराणसी का दौरा कर चुके हैं. हर कोई यह जताना चाहता हो कि वह प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में काफी कुछ करना चाहते या चाहती हैं.

मई 2014 के बाद से वाराणसी में केंद्रीय मंत्रियों के करीब 210 दौरे हो चुके हैं.

बनारस के सामाजिक कार्यकर्ता शिव कुमार के अनुसार, ‘जितना पैसा उन वीआईपी दौरों पर खर्च किया गया उतने में तो इस जिले की सारी सड़कें दोबारा बन जाती.’ ...और इसी के बल पर वे वाराणसी की सारी 8 विधानसभा सीटें जीत सकते थे. इनमें 5 सीटें प्रधानमंत्री के अपने लोकसभा क्षेत्र में हैं व तीन अन्य सीटें हैं. अभी यह हाल है कि मतदान होने में एक सप्ताह से कम का समय बाकी है और भाजपा एक भी सीट जीत पाने का दावा नहीं कर पा रही.’

कड़ा है मुकाबला

मोदी के संसदीय क्षेत्र में तीन सीटें वाराणसी (कैंट), वाराणसी (उत्तर) व वाराणसी (दक्षिण) के अलावा दो सीटें देहात की सेवापुरी और रोहानिया की हैं. वाराणसी जिले में तीन अतिरिक्त विधानसभा क्षेत्र हैं-पिंडरा, अजगरा (सुरक्षित) और शिवपुर.

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने वाराणसी की तीनों सीटें वाराणसी (उत्तर), वाराणसी (दक्षिण) व वाराणसी (कैंट) जीती थी. रोहानिया और सेवापुरी सीट सपा ने और अजगरा व शिवपुर सीट बसपा ने जीती थी जबकि पिंडरा सीट कांग्रेस को मिली.

इस बार इन सीटों पर भाजपा की जीत के क्या आसार हैं? पार्टी के लिए वाराणसी की इन सीटों पर मुकाबला कड़ा साबित होने वाला है. पार्टी के बागी भी उसकी जीत की संभावनाएं धूमिल करने को तैयार बैठे हैं. इसीलिए भाजपा हमेशा की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद की आस लगाए बैठी है.

माना जा रहा है कि मोदी 4, 5 व 6 मार्च को लगातार तीन दिन वाराणसी के तूफानी दौरे पर रहेंगे. वे तीन सभाएं संबोधित करेंगे और पूरे वाराणसी क्षेत्र का दौरा करेंगे. पार्टी को उम्मीद है कि इससे प्रभावित होकर मतदाता मोदी लहर के बहाव में वोट भाजपा को दे देंगे और पार्टी मुश्किल लग रही सीटों पर भी जीत जाएगी. हालांकि अभी तक सारी विधानसभा सीटों पर मुकाबला कड़ा दिखाई दे रहा है लेकिन भाजपा को उम्मीद है कि अंतिम समय में मोदी की धुंआधार रैलियों से यहां का परिदृश्य बदल सकता है.

वाराणसी कैंट

वाराणसी कैंट से सौरभ श्रीवास्तव भाजपा के उम्मीदवार हैं. उन्हें अंदरूनी मतभेद का सामना करना पड़ रहा है. वे ज्योत्सना श्रीवास्तव के बेटे हैं, जो 2012 के चुनावों में यहां से जीती थीं. उनके पति स्वर्गीय हरिश्चंद्र श्रीवास्तव वाराणसी विधानसभा क्षेत्र से तीन बार यूपी विधानसभा के लिए चुने जा चुके हैं.

उनके मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस के अनिल श्रीवास्तव हैं, जो इसी विधानसभा सीट से चार बार हार चुके हैं लेकिन वे यहां लोकप्रिय हैं. इस सीट पर अल्पसंख्यकों के सारे वोट कांग्रेस को ही मिलने की संभावना है. भाजपा कार्यकर्ता मान रहे हैं कि सपा-कांग्रेस गठबंधन वाराणसी में असरदार साबित हो रहा है. इसका सीधा फायदा कांग्रेस को हो सकता है.

वाराणसी (उत्तर)

यहां बसपा के सुजित मौर्या और भाजपा के रवीन्द्र जायसवाल के बीच सीधी टक्कर है. मौर्या साफ छवि के आकर्षक व्यक्तित्व वाले नेता हैं और जायसवाल निवर्तमान विधायक. कांग्रेस ने इस सीट से समद अंसारी को टिकट दिया है, जो मूलतः सपा नेता हैं लेकिन कांग्रेस के बैनर तले मैदान में उतरे हैं.

भाजपा उम्मीदवार को एंटी इनकम्बेंसी का सामना करना पड़ सकता है और साथ ही पार्टी के बागी सुजित सिंह टिक्का उनके लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं. टिक्का को कृष्णा पटेल का अपना दल समर्थन दे रहा है. वे भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष थे और युवाओं पर उनका खासा प्रभाव था. यहां सीधा-सीधा फायदा बसपा को हो सकता है.

वाराणसी (दक्षिण)

इस विधानसभा सीट पर मुख्य उम्मीदवार कांग्रेस के राजेश मिश्रा हैं. मिश्रा वाराणसी से सांसद रह चुके हैं और बेहद लोकप्रिय नेता हैं. वे भाजपा के नीलकंठ तिवारी के खिलाफ लड़ रहे हैं. यहां भाजपा समर्थक पार्टी से इस बात पर नाराज हैं कि उन्होंने सात बार विधायक रह चुके श्यामदेव राय चौधरी को छोड़ कर तिवारी को पार्टी का टिकट दिया.

इस विधानसभा क्षेत्र के बंगाली मतदाता कहते हैं कि भाजपा को एक लोकप्रिय नेता को टिकट न देने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. एक शिक्षाविद अशोक कांति चक्रवर्ती ने कहा, 'कुछ मतदाता कहते हैं कि भाजपा को पता होना चाहिए कि वह मनमानी नहीं कर सकती.’ इस सीट पर कांग्रेस को बढ़त के आसार हैं.

सेवापुरी

इस विधानसभा सीट पर भी भाजपा को बगावत का सामना करना पड़ सकता है. पार्टी अपने गठबंधन सहयोगी अनुप्रिया पटेल के अपना दल (सोनेलाल) के उम्मीदवार नीलरतन पटेल का समर्थन कर रही है. उनका मुख्य मुकाबला सपा के सुरेन्द्र पटेल से है. सुरेंद्र रोहानिया से चुनाव लड़ रहे महेंद्र पटेल के भाई हैं.

इस क्षेत्र में भाजपा के लिए कृष्णा पटेल का अपना दल मुश्किल खड़ी कर सकता है, जिसने यहां विभूति नारायण राय को उम्मीदवार बनाया है. वे भी भाजपा के बागी हैं. भाजपा ने राय को टिकट देने से इनकार कर दिया था. राय नीलरतन पटेल के वोट काट सकते हैं. यहां के समीकरण सपा के पक्ष में जा सकते हैं.

रोहनिया

इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है. भाजपा के सुरेंन्द्र नारायण औदे, अपना दल की कृष्णा पटेल और सपा के निवर्तमान विधायक व मंत्री महेंद्र पटेल के बीच सीधी टक्कर है. लोकसभा चुनाव के ठीक तीन महीने बाद हुए उपचुनाव में मोदी लहर के चलते महेंद्र पटेल ने कृष्णा पटेल को हराया था. फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि यहां भाजपा मुकाबले में आगे रहेगी या नहीं. इस त्रिकोणीय मुकाबले में सपा को फायदा मिल सकता है.

अन्य सीट

अब रह जाते हैं वाराणसी के बाकी विधानसभा क्षेत्र (जो मोदी के लोकसभा क्षेत्र में नहीं आते). पिं[रा में तीन बार विधायक रह चुके कांग्रेस के अजय राय का मुकाबला भाजपा के अवधेश सिंह और बसपा के बाबूलाल पटेल से है. माना जा रहा है राय ही इस दौड़ में आगे रहेंगे.

अजगरा (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र में बसपा के त्रिभुवन राम, भाजपा समर्थित सुहेलदेव, भारतीय समाज पार्टी के कैलाश सोनकर को कड़ी टक्कर दे सकते हैं. भाजपा समर्थक सोनकर को टिकट दिए जाने से नाखुश हैं और हो सकता है वे बसपा के त्रिभुवन राम को वोट दे दें. शिवपुर में मुख्य मुकाबला बसपा के वीरेंद्र सिंह और कांग्रेस-सपा गठबंधन उम्मीदवार आनंद मोहन गुड्डू के बीच है. भाजपा उम्मीदवार अनिल राजभर को तो पार्टी के भीतर ही मजबूत दावेदार नहीं माना जा रहा.

इस पूरे परिदृश्य में भाजपा को वाराणसी में अपना स्पष्ट जनाधार दिखाई नहीं दे रहा और यही उसकी चिंता का कारण है. पार्टी को यहां आज भी मोदी मैजिक का ही सहारा है, जो बदलाव के दूत माने जाते हैं. मोदी का जुमला ‘एक चाय वाला प्रधानमंत्री बन गया’ आज भी जनता को प्रभावित करता है. यही वजह कि पार्टी कार्यकर्ताओं को लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की अंतिम समय पर की जाने वाली रैलियां चुनावी हवाओं का रुख पार्टी के पक्ष में कर सकती हैं.

First published: 4 March 2017, 8:09 IST
 
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