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अखिलेश की बड़ी मुश्किल: शिवपाल या गठबंधन?

अतुल चंद्रा | Updated on: 6 February 2017, 7:47 IST
(शिवपाल यादव डॉट कॉम )

क्या शिवपाल यादव को अखिलेश यादव के डर से पार्टी के साथ बने हुए हैं? या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के चाचा नतीजों की परवाह किए बगैर उनकी चुनावी संभावनाओं को ग्रहण लगाने की कोशिश में लगे हैं? समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव इटावा की जसवंत नगर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. यहां से वे साइकिल चुनाव चिन्ह पहली बार 1996 में चुनाव जीते थे.

पिछले साल लखनऊ की एक सभा में आरोप-प्रत्यारोप और माइक की छीना-झपटी की घटना के बाद अखिलेश यादव ने शिवपाल को बर्खास्त कर उनकी जगह नरेश उत्त्म को पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष नियुक्त कर दिया था. इन सबके बावजूद शिवपाल सपा के वफादार सिपाही नजर आते हैं. 

शिवपाल के लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ने की अफवाहों के बीच मुख्यमंत्री ने उन्हें उनकी पारम्परिक सीट से चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया है. शिवपाल यादव ने अखिलेश की ‘आज्ञा’ मानते हुए कहा कि ‘‘जो पार्टी कहेगी, उसी सीट से चुनाव लड़ने को तैयार हैं. हालांकि अखिलेश के प्रति वे कितने वफादार है; यह कहा नहीं जा सकता. 

शिवपाल यादव को राज्य के सार्वजनिक निर्माण मंत्री पद से बिना वजह बर्खास्त कर दिया गया था. वे अखिलेश से कोई स्नेह नहीं करते क्योंकि यादव परिवार में हुए कलह में वे ही थे, जिन्हें अमर सिंह के साथ नजदीकियों के चलते गलत ठहराया गया. 

यहां तक कि अखिलेश द्वारा गठित कांग्रेस-सपा गठबंधन के लिए प्रचार करने की बात पर सपा के जनक मुलायम सिंह ने जो पलटी मारी थी; वह भी असल में अपने पुत्र अखिलेश के पक्ष में ही उठाया गया कदम था. अब देखना यह है कि मुलायम सिंह अपनी उस बात पर कायम रहते हैं कि नहीं कि वे चुनाव प्रचार की शुरुआत शिवपाल के पक्ष में वोट मांग कर करेंगे न कि अखिलेश के.’’

विरोधी ही रहेंगे शिवपाल

मगर शिवपाल यादव अपने भतीजे के खिलाफ ही रहेंगे; इसमें कोई दो राय नहीं है. शिवपाल यादव ने जसवंतनगर में अखिलेश पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा था कि युवाओं को जब विरासत में हर चीज मिल जाती है तो वे अपने बड़ों की इज्जत नहीं करते. एक और मौके पर शिवपाल ने कहा था कि अखिलेश को बैठे-बिठाए बिना किसी मेहनत के सत्ता मिल गई. 

31 जनवरी को शिवपाल यादव ने यह भी धमकी दी थी कि वे चुनाव बाद एक नई पार्टी गठित करेंगे. शिवपाल ने कहा था ‘‘तुम सरकार बनाओ, 11 मार्च के बाद हम नई पार्टी बनाएंगे.’’ उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी के बागियों के पक्ष में प्रचार भी करेंगे, जिन्हें पार्टी का टिकट नहीं मिला और वे आधिकारिक प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे. मुलायम के नई दिल्ली में कांग्रेस-सपा गठबंधन पर नाराजगी जताने के एक दिन बाद शिवपाल ने यह बात कही. 

अखिलेश की चेतावनी

अगर मुलायम पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार नहीं करेंगे और शिवपाल यादव आधिकारिक प्रत्रूाशियों के खिलाफ लड़ने वाले बागियों का प्रचार करेंगे तो इससे अखिलेश-राहुल गठबंधन की जीत की संभावनाएं तो धूमिल होती नजर आ ही रही हैं बल्कि एक तरह से भाजपा के लिए रास्ता साफ कर रही हैं. हालांकि अखिलेश ने अपने चाचा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन एटा में उन्होंने चेतावनी दी कि ‘‘पार्टी के खिलाफ काम करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.’’

शिवपाल ने कहा कि वे चुनाव के बाद ही अपना अगला कदम तय करेंगे लेकिन अखिलेश ने सहारनपुर से उम्मीदवार पार्टी के बागी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. मुलायम सिंह की तरह ही शिवपाल यादव की भी यही शिकायत है कि जिन लोगों ने अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में अच्छा काम किया पार्टी ने उन्हें बिसरा दिया. 

शिवपाल के वफादार माने जाने वाले 35 विधायकों को अखिलेश ने अपने प्रत्याशियों की सूची में शामिल नहीं किया है. और इनके अलावा कई अन्य सपा-कांग्रेस गठबंधन के सीटों के बंटवारे के शिकार हो गए. इनमें से कुछ अब निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं. 

राज्य के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में मुस्लिम वोटों का बंटना तय है. मुसलमान वोट अब बहुजन समाज पार्टी और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच बंट जाएंगे और बागी उम्मीदवार एक तरह से भाजपा की राह आसान बनाने में लगे हैं. आशंका तो यह भी है कि यादवों का एक खेमा बागियों के साथ हो जाए और अखिलेश के लिए मुश्किलें खड़ी कर दें. 

सवाल उठ रहे हैं कि शिवपाल ने अम्बिका चौधरी और नारद राय की तरह पार्टी से इस्तीफा देकर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला क्यों नहीं किया? सपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अगर सपा के 30-40 बागी जीत गए तो अखिलेश की पार्टी का खेल बिगाड़ सकते हैं. यह और भी मुश्किल हो सकता है अगर त्रिशंकु विधानसभा हो.

First published: 6 February 2017, 7:47 IST
 
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