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मानिकपुर, बुंदेलखंड: गुलाबी गैंग की मुखिया संपत पाल सियासी गैंग से जीत पाएंगी?

सादिक़ नक़वी | Updated on: 21 February 2017, 9:00 IST


बंजर विंध्याचल पर्वतों से घिरी एक संकड़ी सडक़ पर कार जैसे ही तेजी से आगे बढ़ी, ड्राइवर ने कहा, ‘अब हम मानिकपुर घाटी में घुस रहे हैं.’ दूर खेतों में छिटपुट वनस्पति और झाडिय़ों के सिवा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. कार जैसे ही मानिकपुर कस्बे में घुसी, ड्राइवर ने आगे कहा, ‘यह बुंदेलखंड का सबसे पिछड़ा इलाका है.’


बुंदेलखंड के अन्य निर्वाचन क्षेत्रों सहित मानिकपुर (चित्रकूट जिला) में 23 फरवरी को वोट पड़ेंगे. यूपी चुनाव के चौथे चरण में.
कस्बे में घुसते ही, सडक़ पर कुछ महिलाएं कैंपेन करती नजर आती हैं, एक दूकान से दूसरी दूकान, सडक़ पर बने घरों पर रुकते हुए. उनके नारे गूंज रहे थे- ‘मोहर लगेगी पंजे पर.’


महिलाओं के हमारे करीब आने तक जैसे ही हम रुके, ड्राइवर ने बताया, ‘यह संपत पाल की गुलाबी गैंग है.’ पाल सहित ज्यादातर महिलाएं गुलाबी साड़ी में नहीं थीं, जो गैंग की ड्रेस है और जिसके लिए वे दूनियाभर में जानी जाती हैं. गुलाबी गैंग महिलाओं की हिंसा के विरुद्ध अपने आक्रामक रवैये के लिए मशहूर है. यहां औरतों पर हिंसा बेकाबू है. यह वह इलाका है, जहां गरीबी इतनी ज्यादा है कि देखकर तकलीफ होती है.


डकैत अब भी हैं, हालांकि कुछ साल पहले जब से कुख्यात डाकू ‘दस्यु सम्राट’ दुदवा मारा गया, उनका प्रभाव फीका पड़ गया. अब इस इलाके में स्थानीय कबायली बबली कोल सबसे खतरानाक डकैत है. दुदवा से उलट, स्थानीय रोबिनहुड. बबली कोल का ज्यादा नाम नहीं है.


एक स्थानीय एक्टिविस्ट ने बताया, ‘वह गरीब कोल कबायलियों... अपने खुद के समुदाय तक के लिए समस्याएं पैदा कर रहा है.’ ज्यादातर कोल लकडिय़ां इकट्ठी करते हैं और पास के कस्बे में बेचते हैं. इसी से उनका गुजारा चलता है. पाल ने कहा, ‘मैं उन्हें डकैत नहीं कहती.’ पाल ने आगे कहा, उन्हें डाकू बनने के लिए मजबूर किया गया है क्योंकि गरीबों को प्रशासन से न्याय नहीं मिलता. बबली कोल भी डकैत नहीं हैं, हालांकि लोग उन्हें ऐसा कहते हैं.


पाल ने पहला विधानसभा चुनाव डाकू थोकिया की मां के खिलाफ लड़ा था. ‘मैं उसके बाद खड़ी हुई थी, जब मुझे पता चला कि वे लोगों को धमकाकर वोट मांग रहे हैं.’ पाल ने बताया कि किस तरह उन्हें छड़ी चुनाव चिह्न मिला और किस तरह उन्होंने नारा दिया- ‘अगर थोकिया करेगा गड़बड़ी, तो उसको पड़ेगी छड़ी’. इस बार स्थानीय लोगों ने कहा कि किस को वोट करना है, इसका अभी किसी गैंग से ‘फरमान’ नहीं आया है.

 

वादे


एक दिन पहले पाल गुलाबी साड़ी में थीं. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ मंच पर थीं. सीएम रैली को संबोधित करने कर्वी में थे. सीएम यादव के आने से पहले पाल प्रेस से बातचीत करने बैरिकेड से कूद कर आ गईं. सुरक्षाकर्मियों को सीएम के हैलिकॉप्टर के आने का संकेत मिल चुका था. इससे पहले कि वे पाल को वापस जाने को कहते, उन्होंने मीडियाकर्मी से कहा, ‘मैं मानिकपुर में फिल्म सिटी बनाऊंगी.’


बतौर एक्टिविस्ट पाल पर माधुरी दीक्षित अभिनीत ‘गुलाब गैंग’ सहित कई फिल्में बन चुकी हैं. पर वे इस फिल्म से जुडऩा पसंद नहीं करतीं. उन्होंने कहा, ‘उसके विरोध में मैं कोर्ट गई थी.’


2007 के बाद पाल तीसरी बार विधानसभा चुनाव लड़ रही हैं. तब वे स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर खड़ी हुई थीं, पर बुरी तरह हार गई थीं. वे फिर 2012 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर खड़ी हुईं और 23 हजार वोट पाने में सफल रहीं. इस बार वे भाजपा के आरके पटेल और बसपा के चंद्रभान पटेल के खिलाफ खड़ी की गई हैं. आरके पटेल पहले सपा के सांसद थे, जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए, जबकि चंद्रभान पटेल इस निर्वाचन क्षेत्र से मौजूदा विधायक हैं.

 

समर्थन


स्थानीय लोगों का कहना है कि पाल एक सशक्त उम्मीदवार हैं और उन्हें मौका दिया जाना चाहिए. केकरामर गांव के एक किसान शिवनारायण यादव ने कहा, ‘वे पहले दो बार नहीं जीत सकीं. इस निर्वाचन क्षेत्र में सबसे लंबे समय तक बसपा विधायक रहे हैं. इस बार हम उन्हें चुनेंगे.’ उन्होंने आगे कहा, ‘वे औरतों का साथ देती हैं. उनके मुद्दों के लिए डीएम तक जाती हैं.’


ऊंछड़ी गांव के दुर्गा प्रसाद पाल ने कहा, ‘इस बार हम उन्हें वोट देने का सोच रहे हैं.’ वे दो बैलों के साथ अपने छोटे खेत की ओर जा रहे थे. उन्होंने आगे कहा, ‘पानी नहीं है, अनाज नहीं है. दस सालों में केवल दो बार बरसात हुई है. बाकी समय भयंकर सूखा रहा.’ पिछले साल जरूर ठीक बरसात हुई. इससे स्थानीय लोगों को राहत मिली है.

 

सबकुछ ठीक नहीं


पर अमरपुर गांव की कोल महिला शांति संपत पाल से ज्यादा खुश नहीं हैं. वे अपने घर के बाहर बैठते हुए कहती हैं, ‘उन्होंने यहां कुछ काम नहीं किया है.’ गांव में कुछ ही घर ईंट-गारे से बने हैं, जिनमें एक शांति का है, हालांकि उस पर पलस्तर नहीं है. ज्यादातर लोग झोपड़ियों में रहते हैं. उन्होंने आगे कहा, ‘मायावती की सरकार ने यह घर बनवाया था.’


एक महिला एक्टिविस्ट ने बताया कि ‘संपत पाल ज्यादातर साडिय़ां बांटती हैं और कुछ नहीं करतीं. ’ उन्होंने बताया कि वेजिन महिलाओं से भी मिली हैं, उन्हें गुलाबी गैंग के बारे में कुछ नहीं मालूम, सिवाय इसके कि उन्हें साडिय़ां मिली हैं. उन्होंने आगे कहा, ‘उसके साथ उनका जुड़ाव तब तक है जब तक कि उनकी साड़ी ठीक है.’ एक सहयोगी ने कहा, ‘यह सही है कि पाल चुनाव के लिए मानिकपुर आ गई हैं, बांदा नहीं हैं, जहां वे रहती हैं. वहां के लोग उनके बारे में सबकुछ जानते हैं.’ उन्होंने आगे कहा, ‘वे पीपल का पेड़ जैसी हैं. अपने नीचे किसी को बढऩे नहीं देतीं.’


एक अन्य वरिष्ठ एक्टिविस्ट जो कि दशकों से इलाके में काम कर रहे हैं, उनमें आत्मविश्वास कम नजर आया. उन्होंने कहा, ‘वे पूरी मेहनत नहीं कर रहीं. उन्हें खुद पर जरूरत से ज्यादा भरोसा हो गया है, जीवन से बड़ी छवि की गुलाम हो गई हैं.’


दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की स्थानीय इकाई की अलग लड़ाई है. स्थानीय इकाई नाखुश है कि सीट कांग्रेस के पास कैसे चली गई. एक स्थानीय सपा नेता ने शिकायत की, ‘वे सीधा 10 जनपथ से टिकट लेने में सफल हो जाती हैं. हाइ-टेक हो गई हैं.’ सपा ने 2012 के चुनावों में निर्भय पटेल को खड़ा किया था. इस बार दो पटेल-भाजपा और बसपा से खड़े होने से जिला इकाई को डर है कि वर्चस्व वाले इस समुदाय के वोट पाल की जगह इन उम्मीदवारों को नहीं चले जाएं.


निर्भय पटेल को पाल के जीतने में दिलचस्पी नहीं है क्योंकि वे पार्टी से नहीं, दूसरे समुदाय से हैं. कर्वी में अपनी रैली के दौरान सीएम यादव ने पटेल से पाल को जिताने को कहा था. फिर भी स्थानीय इकाई को भरोसा नहीं है. एक स्थानीय सपा नेता को डर था कि ‘हो सकता है, वे ‘विश्वासघात’ की शिकार हो जाएं.’ उन्होंने आगे कहा कि पटेल उन्हें चुनाव में जिता सकते हैं और हरा भी सकते हैं.

First published: 21 February 2017, 9:00 IST
 
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