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27 सालों में पहली बार कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बदली-बदली सी लग रही है

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

जीत और हार अभी दूर का खेल है. चुनाव होने और किसी के जीतने तक अभी गंगा में काफी पानी बहना बाकी है. लेकिन मानसून सूबे के सिर पर चढ़ा हुआ है. बादलों का भी और राजनीति का भी. इस बार राजनीति के बादलों में कांग्रेस का रंग गाढ़ा नज़र आ रहा है. ऐसा लगता है कि फीकापन जा रहा है, कांग्रेस बदली बदली नज़र आ रही है.

कांग्रेस ने 27 साल, यूपी बेहाल का नारा दिया है. यह अकेले खड़े होने के आत्मविश्वास को दिखाने के लिए है जहां मोर्चा सबसे है. लड़ाई सबसे है. और लड़ाई अकेले दम पर है. शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बताकर कांग्रेस पंडित वोट को साधने में भी लग गई है और इस बहाने उसने भाजपा के अगड़े वोटबैंक पर एक मजबूत वार कर दिया है.

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लेकिन सबसे रोचक है राहुल की 29 जुलाई की लखनऊ की कार्यकर्ता बैठक. पिछले कुछ चुनावों से कार्यकर्ता बैठक इस पैमाने पर नहीं देखने को मिली थीं. बड़ी तादाद में प्रदेश भर से कार्यकर्ताओं को लखनऊ बुलाया गया. मकसद यह था कि पार्टी का नेतृत्व कार्यकर्ताओं में जान डालने का काम करे. जबतक प्रचार का सिपाही मज़बूत और आत्मविश्वास से भरा नहीं होगा, चुनाव में कुछ हासिल नहीं किया जा सकता. इस लिहाज से यह कार्यकर्ता बैठक अहम पहल थी.

मायावती को मालूम है कि दलितों में सेंधमारी का खतरा भाजपा से ज़्यादा कांग्रेस से है

यह थी तो बैठक लेकिन राहुल लगातार खड़े रहे. राहुल के मंच पर पहुंचने से पहले बादल सभा स्थल को सींच चुके थे. पंडाल चू रहा था. पानी में अफरातफरी का माहौल था. लेकिन मंच कहता रहा, राहुल जी आ रहे हैं, आप बने रहें. और लोग बने रहे. आंखों देखा हाल बताने वालों ने कहा कि बारिश ने बैठक पर पानी फेरा. लेकिन बारिश ने शायद इस बैठक को और सफल भी बनाया. भीगते हुए कार्यकर्ता सिर पर प्लास्टिक की लाल कुर्सियां उठाए खड़े थे. उन्हें राहुल का इंतज़ार था. राहुल ने भी तय किया कि कार्यकर्ता भीग रहा है तो वो क्यों नहीं. दोनों भीगे और इस भीगे संवाद ने एक नई गर्मजोशी पार्टी कार्यकर्ताओं में भर दी.

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बैठक के लिए एक रैम्प बनाया गया था. यह रैम्प कार्यकर्ताओं के बीच चारों ओर जाता था. इसके चारों ओर कार्यकर्ता थे. यानी कोई सबसे आगे और कोई सबसे पीछे नहीं, सब राहुल के करीब. सीधे आंखों में आंखें डालकर एक दूसरे को देखते हुए. हाथ मिलाते हुए. राहुल अपने गार्ड्स को इशारा करके पीछे करते रहे और सीधे कार्यकर्ताओं से बात करते रहे. प्रशांत किशोर ने जिस रणनीति के साथ चुनाव के लिए ज़मीन  तैयार की है उसमें चुनाव से पहले पार्टी को खड़ा भी करना है. ऐसा हो सके, इसके लिए कार्यकर्ता का दिल भी जीतना होगा और विश्वास भी. राहुल इस बैठक में ऐसा कर पा रहे थे.

राहुल से अलग अलग ज़िलों से आए कार्यकर्ताओं ने सवाल पूछे. राहुल पहले से अधिक आत्मविश्वास से भरे नज़र आए. पूरे जोश और ज़ोर के साथ सवालों के जवाब दे रहे थे. लेकिन जवाबों से भी ज़्यादा उनका ज़ोर इस बात पर था कि कार्यकर्ता को कैसे उत्साहित किया जाए. वो सारा ध्यान कार्यकर्ताओं के मनोबल को मज़बूत करने पर दे रहे थे. राहुल ने कार्यकर्ताओं से कहा कि जबतक कांग्रेस का राज्य में शासन रहा, राज्य विकास करता रहा और आगे की पंक्ति में रहा. यह भी, कि कांग्रेस की सोच भारत की सोच है. अगर कांग्रेस के कार्यकर्ता एकजुट होकर खड़े हो जाएं तो हमारा मुकाबला किसी से नहीं है. जीत हमारी है.

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दलितों के खिलाफ़ अत्याचार के मामलों में कांग्रेस नेतृत्व ने पिछले दो वर्षों के दौरान सक्रियता दिखाई है. हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर ऊना तक राहुल का लपककर पहुंचना उनकी अपने पारंपरिक वोटर को वापस रिझाने के प्रति गंभीरता को दर्शाता है. हालांकि यह आसान नहीं है और मायावती के पास दलित लामबंद है. लेकिन गैर-जाटव वोट पर भाजपा की भी नज़र है और कांग्रेस की. फिलहाल कांग्रेस वहां ज़्यादा प्रभावी होने की कोशिश कर रही है.

कांग्रेस ने 27 साल, यूपी बेहाल का नारा दिया है.

भाजपा के ब्राह्मण वोट पर पहले ही चोट कर चुकी कांग्रेस अब भाजपा को उसके ही दुर्गों में घेरना चाहती है. ऐसा करने से भाजपा से वोट छीनने की गुंजाइश भी बनेगी और लड़ाई में सीधे सामने आने का श्रेय भी मिलेगा. यह बेवजह नहीं है कि दो अगस्त को सोनिया गांधी बनारस में रोडशो करने जा रही हैं. वो गंगा के मुद्दे को भी उठाएंगी और बनारस के मुद्दे को भी. अगर ग़ौर किया जाए तो पाएंगे कि जिस पार्टी के लिए दहाई के अंकों में जीत पाना भी फरवरी के महीने तक मुश्किल लग रहा था, वो पार्टी अब सूबे में हलचल पैदा कर रही है.

इसका एक प्रमाण यह भी है कि राजनीतिक दलों में अब कांग्रेस पर तीखी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है. समाजवादी पार्टी ने राहुल की बैठक से पहले कठोर टिप्पणी की. उससे पहले मायावती ने ऊना के मुद्दे पर राज्यसभा में कांग्रेस की आलोचना की. मायावती को मालूम है कि दलितों में सेंधमारी का खतरा भाजपा से ज़्यादा कांग्रेस से है.

कांग्रेस को हारा हुआ प्यादा समझकर देखा जा रहा था. अभी भी अधिकतर लोग ऐसा ही सोचते हैं. लेकिन राजनीति में किसी को कमज़ोर आंकना ही उसकी ताकत बन जाता है. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस की अपनी लाचारियां कम हैं. कांग्रेस को सबकुछ नए सिरे से करना है. राज्य में पार्टी लगभग खत्म थी. लेकिन कांग्रेस ने एक ईमानदार शुरुआत की है. राहुल, सोनिया और प्रियंका अगर इसे साधे रहे तो सफलता अच्छी भी हो सकती है.

First published: 31 July 2016, 7:22 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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