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हवा कम, हल्ला ज्यादा: अंतिम दो चरणों में डगमगाया हुआ है भाजपा का आत्मविश्वास

भारत भूषण | Updated on: 5 March 2017, 3:10 IST

भाजपा के नेता फौरी तौर पर भले ही उत्तर प्रदेश में भाजपा की लहर होने का दावा कर रहे हैं लेकिन कहीं न कहीं उन्हें यह एहसास है कि पार्टी के लिए प्रदेश में जीत की राह उतनी आसान नहीं है, जितनी उन्हें लग रही थी. इसीलिए पार्टी की एकमात्र कोशिश यही है कि किसी भी तरह मीडिया में यह संदेश दिया जाए कि इस चुनाव में भाजपा अपने प्रतिद्वंदियों को करारी हार देने वाली है, और पार्टी की यह रणनीति शायद काम कर रही है.

कुछ ने तो मीडिया में सीधे घोषणा कर दी है कि चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में होंगे. कुछ अन्य नेताओं ने समझदारी दिखाते हुए कहा है ‘किसी को अच्छा लगे या नहीं, इन चुनावों में भाजपा को सीधा फायदा मिलता नजर आ रहा है.’ अब कोई उनसे पूछे कि उनके इन दावों में कितनी सच्चाई है? वाराणसी में डेरा डाले कितने भाजपा नेताओं को स्थानीय जनता ने यह आश्वासन दिया है कि वही जीतेगी?

भाजपा यह जताने की कोशिश कर रही है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा इकतरफा जीत दर्ज करेगी क्योंकि जातीय समीकरण भाजपा के पक्ष में हैं और मतदाता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडा पर पार्टी को वोट देंगे.

मंत्रियों की फौज

एक ओर, भाजपा के मंत्रियों का ज्यादातर समय लोगों को भाजपा के पक्ष में जातीय गणित समझाने में बीत रहा है. दूसरी ओर, पार्टी का दावा है कि इन चुनावों में मोदी के विकास मंत्र के सामने जातीय मुद्दा स्वतः ही गौण हो जाएगा (हालांकि भाजपा के रोड शो के दौरान लगाए गए ‘जय श्री राम’ के नारों और साम्प्रदायिक संदर्भों से तो ऐसा नहीं लगता).

हालात ये हैं कि पार्टी को फायदेमंद जातीय समीकरण और प्रधानमंत्री के विकास एजेंडा; अपने दोनों ही दावों पर सवालों का सामना करना पड़ रहा है. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को पत्रकारों के एक समूह के सामने पार्टी के लिए संभावित ‘फायदेमंद’ जातीय समीकरण के बारे में समझाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. उन्होंने कहा, 'स्पष्ट तौर पर भाजपा सबसे ज्यादा सीटें जीतेगी, क्योंकि जातीय समीकरण भाजपा को जिताने के लिए काफी हैं.'

उन्होंने बताया पारम्परिक रूप से उत्तर प्रदेश जातीय आधार पर 5 खंडों में बंटा हुआ है- उच्च वर्ग, यादव, गैर यादव, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), मुसलमान और दलित. इन जातीय समूहों के वोट चार बड़ी पार्टियों के बीच बंटे हुए हैं- कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी. सीधा सा गणित है कि जिस पार्टी को दो जाति वर्गों का समर्थन हासिल होगा, वही चुनाव जीत पाएगी. वे कहते हैं, ‘कम से कम कुल मतदान के 30-31 फीसदी मत उनके पक्ष में पड़ेंगे और जीतने के लिए इतना काफी है.’

भाजपा का जातीय समीकरण

हालांकि इस बार सपा-कांग्रेस गठबंधन के चलते हालात अलग हैं. अब मैदान में तीन ही राजनीतिक समूह रह गए हैं, जिनके बीच जातिगत वोटों का बंटवारा होगा. भाजपा मंत्री ने दावा किया कि विधानसभा की आधी यानी 202 सीटें जीतने के लिए किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन को मतदान प्रतिशत का 34 से 35 फीसदी मत मिलना जरूरी है.

भाजपा के मंत्री ने कहा, 'भाजपा के लिए सबसे बड़ा फायदे का सौदा यह साबित होगा कि उत्तर प्रदेश में छठें जातीय समूह के रूप में उभरे सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) व अत्यधिक पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के मतदाता गैर चमार वोटरों के साथ भाजपा के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं. अब तक यह वर्ग मायावती का पारम्परिक वोटर रहा है. इसलिए यूपी में भाजपा के पास साढ़े तीन जातीय समूहों के वोट हैं. ये हैं-उच्च जाति वाले, गैर यादव वोट, ओबीसी और ईबीसी. साथ ही गैर जाटव दलित वर्ग भी भाजपा के साथ है.

गृह मंत्री एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह इसे सरल भाषा में कुछ यूं कहते हैं, ‘हमारे परम्परागत वोटों के अलावा गैर यादव, ओबीसी और अति दलित वर्ग का मतदाता हमारे पक्ष में है.’

सपा नेताओं का मानना है कि भाजपा को जातीय समीकरणों से कोई खास फायदा नहीं होने वाला. वे कहते हैं कि भाजपा को गैर चमार या गैर यादव ओबीसी मतदाताओं का समर्थन मिलना कोई नई बात नहीं है. पहले भी भाजपा को यह वोट मिले हैं और इस आधार पर भाजपा को कोई बड़ा फायदा मिलने वाला है; ऐसा कुछ नहीं है.

आजमगढ़ में सपा के जिलाध्यक्ष हवलदार यादव कहते हैं, ‘पहले गैर यादव ओबीसी वर्ग के सारे वोट बसपा को मिलते थे. अब ये मतदाता बसपा और भाजपा के बीच बंट गए हैं. यह हमारे लिए फायदे की ही बात है क्योंकि इससे बसपा के साथ हमारा मुकाबला आसान हो जाता है. साथ ही वे कहते हैं कि ‘अगर विधानसभा क्षेत्र यादव बहुल है या सपा का प्रचार असरदार रहा है तो यादवों के साथ ही 10 प्रतिशत गैर यादव ओबीसी वोट भी सपा के पक्ष में ही आएंगे. इसका फायदा हमें ही मिलेगा क्योंकि हमारा असल मुकाबला बसपा के साथ है.’

चुनावों में जातीय समीकरणों का गणित कोई नई बात नहीं है. इसके अलावा कई बार भावनाओं का ज्वार जाति के इस गणित पर भारी पड़ जाता है और किसी एक पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. 2014 के चुनावों में मोदी के पक्ष में जनभावना का ऐसा ही ज्वार उमड़ा था. उनका करिश्मा थोड़ा फीका जरूर हुआ है लेकिन जनता पर उनका प्रभाव अभी भी है.

काश विकास किया होता

सपा के हवलदार यादव कहते हैं कि अब 2014 वाली बात नहीं है. जनता का मोदी से विश्वास उठ रहा है. वे कहते हैं, ‘विश्वास की कमी हो रही है और इसका असर चुनाव परिणामों में साफ दिखाई देगा.’ बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. रामाज्ञा शशिधर ने कहा, ‘मोदी ने पिछले ढाई सालों में कुछ नहीं किया. अगर मोदी अपने वादे पूरे करते तो आज लहर भाजपा के पक्ष में होती. उस वक्त ज्यादातर युवा मोदी के पक्ष में थे. उन्होंने नौकरियों और कौशल विकास का वादा किया था लेकिन पूरा एक भी नहीं किया.’

उन्होंने कहा, ‘अब लोगों को लगने लगा है कि साल भर चुनाव प्रचार करने वाले प्रधानमंत्री के पास विकास कार्यों के लिए तो समय बचेगा ही नहीं.’ शशिधर कहते हैं, ‘मोदी अपनी किसी बात पर कायम नहीं रहते और अवसर देख कर बात करते हैं. वे हमारे ‘समाज में व्याप्त निराशा और समस्याओं’ का इस्तेमाल अपने चुनावी फायदे के लिए करते हैं. ऐसे में विकास का मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है और साम्प्रदायिक प्रतीक हावी होते नजर आते हैं.’

इतनी आलोचनाओं के बावजूद मोदी के प्रति लोगों का सम्मोहन कम नहीं हुआ है. हालांकि विकास के वादे करने के बावजूद उन्हें पूरा न करने के कारण लोगों का मोदी में विश्वास कम होने की आशंका तो बनी ही हुई है. इसी को भांपते हुए शायद पार्टी ने ‘रुद्राभिषेक’ के लिए मोदी के काशी विश्वनाथ मंदिर दौरे और काल भैरव मंदिर में मोदी के पूजा करने को टीवी पर दिखाया. कुल मिलाकर धर्म ही भाजपा के काम आता है!

First published: 5 March 2017, 8:35 IST
 
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