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उर्दू-संस्कृत विवादः क्या उप्र विधान सभा संवैधानिक अधिकारों को नकार रही ?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 4 April 2017, 10:47 IST

 

उप्र में समाजवादी पार्टी के विधायक नफीस अहमद द्वारा उर्दू में शपथ लेने से विवाद खड़ा हो गया है. नफीस अहमद आजमगढ़ के गोपालपुर से विधायक हैं. उन्होंने पहले उर्दू में शपथ ली जिस पर भाजपा विधायकों ने विरोध किया. बाद में सपा विधायक को हिन्दी में भी शपथ दिलाई गई. देखा जाए तो जब विधायक नफीस अहमद ने अपनी शपथ के अमान्य होने पर विरोध किया तो उनका विरोध वास्तव में अनुचित नहीं था. कहना न होगा कि पूरे देश की विभिन्न राज्य विधानसभाओं की भाषा एक मुश्किल और कठिन मुद्दा बन गई है. अहमद ने उर्दू में शपथ लेकर एक पुरानी संवैधानिक बहस को पुनर्जीवित कर दिया है.


उप्र विधान सभा के रूल ऑफ प्रोसीजर में स्पष्ट कहा गया है कि विधान सभा के कार्यों का संचालन हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में होगा. यदि आप विधानसभा में होने वाली कार्यवाहियों की भाषा नियमों को ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे तो इसकी व्यापक रूप से व्याख्या की गई है, विशेषकर शपथ के बारे में ही नहीं.

 

अंतःस्थापित नियम-1

 

देश की कुछ विधानसभाओं में शपथ की भाषा के बारे में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है जिस भाषा में विधान सभा की कार्यवाही होती है. उदाहरण के लिए बिहार में विधायक संस्कृत में शपथ ले सकते हैं, उन्हें इसकी अनुमति भी मिली हुई है लेकिन सदन की कार्यवाही देवनागरी लिपि में और हिन्दी में की जानी है.

इसके साथ ही उर्दू में भाषण देने और नोटिस को भी उर्दू में पेश करने की अनुमति मिली हुई है. यदि कोई सदस्य हिन्दी या उर्दू में अपने विचारों को ठीक तरह से से व्यक्त नहीं कर पा रहा है तो विधानसभा उस सदस्य को उसकी मातृभाषा में विचार रखने की की अनुमति देती है.

अंतःस्थापित नियम-2


उप्र विधानसभा के जो नियम हैं, उन नियमों में सामान्य कामकाज की भाषा और शपथ की भाषा के बीच कोई अंतर नहीं हैं. हालांकि उर्दू के खिलाफ एक पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से दिखता है जब उर्दू का विरोध संस्कृत सम्मान के मुकाबले में किया जाता है.

सदन के एक अधिकारी ने कैच को बताया कि कम से कम 13 भाजपा विधायकों ने संस्कृत में शपथ ली और उन्हें दोबारा हिन्दी में शपथ लेने के लिए इसलिए नहीं कहा गया क्योंकि संस्कृत को देवनागरी लिपि में लिखा गया था. देवनागरी लिपि विधानसभा की लिपि है.

रूल्स ऑफ प्रोसीजर्स को देखा जाए तो मालुम चलता है कि कि देवनागरी लिपि की जरूरत केवल लिखने के लिए है मतलब कार्यवाहियों का रिकॉर्ड रखने के लिए. इसका असर यह हुआ कि सदन में तो हिन्दी में बोला जाता है और रिकॉर्ड केवल देवनागरी लिपि में ही रखे जाते हैं. यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि नियमों में संस्कृत का कहीं भी उल्लेख नहीं है. ऐसा लगता होता है कि देवनागरी लिपि को गुप्त रूप से अनुमति दी गई है.

 

संसद में क्या स्थिति है?


संसदीय स्तर पर देखा जाए, तो संसद के सदस्य अंग्रेजी या संविधान की आठवीं अनुसूची में निर्दिष्ट 22 भाषाओं में से किसी में भी शपथ या प्रतिज्ञा लेने को स्वतंत्र हैं. इन भाषाओं में असमिया, बंगाली, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलगु, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली और डोगरी शामिल हैं.

संसद सदस्यों को न केवल उर्दू में शपथ लेने के लिए अनुमति दी गई है बल्कि भाषण भी उर्दू में वितरित किए गए हैं. ये भाषण सामान्यतः देवनागरी लिपि में छपे होते होते हैं लेकिन जब सदस्य विशेष रूप से अनुरोध करता है कि उसे ये भाषण फ़ारसी लिपि में मिलें तो ये भाषण देवनागरी लिपि में प्रिंट किए जाते हैं. फारसी लिपि ब्रैकेट्स में लिखी होती है.

अंतःस्थापित नियम-3

लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने कैच से बातचीत में कहा कि यह सम्मान किसी भी भेदभाव के बिना संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लखित सभी 22 भाषाओं के लिए सभी राज्यों पर स्वतः ही लागू होता है. उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई राज्य ऐसा नहीं कर रहा था तो यह मनमानी कार्रवाई का दोषी है और उसने संवैधानिक अधिकारों को नहीं माना है.
उत्तर प्रदेश के मामले में उर्दू के साथ जो व्यवहार किया गया, वही सभी को आश्चर्य में डालने वाला है. सभी जानते हैं कि उर्दू आधिकारिक तौर पर सरकार की दूसरी भाषा है. तो फिर सवाल है कि विधानसभा में इसे क्यों अनुमति नहीं दी जानी चाहिए?

उर्दू भाषा को सम्मान देने का भार, दायित्व सिर्फ राज्य की नई भाजपा सरकार की नहीं है, बल्कि पूर्व की सपा, बसपा और कांग्रेस सरकारें भी इसकी जिम्मेदार हैं. यह काफी पेचीदगी भरी स्थिति है. उदाहरण के लिए समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने हिन्दी में ली गई अपनी शपथ क्यों वापस ले ली और उन्होंने नियमों को बदलने की कोशिश क्यों कभी नहीं की जबकि वह पूर्व में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में संसदीय कार्य मंत्री थे.

First published: 4 April 2017, 10:47 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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