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उत्तर प्रदेश भाजपा: ठाकुर, ब्राह्मण, दलित, बिछड़े सभी बारी-बारी

अतुल चौरसिया | Updated on: 27 July 2016, 7:58 IST

लगभग एक पखवाड़े पहले की उत्तर प्रदेश की सियासी फिजा पर नजर दौड़ाएं तो भाजपा के लिए मौसम बेहद गुलाबी था. चार मुख्य वोट बैंकों में बंटी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगभग तीन पर भाजपा की पकड़ मजबूत दिख रही थी. ठाकुर, ब्राह्मण, पिछड़ा और दलित से मिलकर बने चुनावी परिदृश्य में भाजपा सबसे आगे दिख रही थी. उसके समीकरण सही थे, मोहरे यथास्थान थे.

उसके पास राजनाथ सिंह के रूप में एक बड़ा और भरोसेमंद ठाकुर नेता था जिसे पार्टी ने उत्तर प्रदेश प्रचार अभियान का प्रमुख बनाकर अपनी सोच साफ कर दी थी.

ब्राह्मण परंपरागत रूप से पार्टी के साथ रहे हैं. उत्तर प्रदेश में उसके पास कलराज मिश्रा सरीखे चेहरे हैं तो केंद्र में जेटली से लेकर सुषमा स्वराज तक ब्राह्मण नेताओं की कतार है.

इसी तरह पिछड़ों को लेकर पार्टी की रणनीति बेहद आक्रामक रही थी. पिछड़ों में सबसे बड़ी जाति यादवों की है जिस पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है. इसके अतिरिक्त बाकी बची पिछड़ी जातियों में पार्टी ने केशव मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बड़ा संदेश दे दिया है. एक अन्य अहम पिछड़ी जाति कुर्मी को अपने पाले में लाने के वास्ते पार्टी ने मिर्जापुर से अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया था.

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बचा दलित वर्ग जिसे लेकर पार्टी लगातार आक्रामक अभियान छेड़े हुए थी. दलितों को लेकर संघ और भाजपा बीते दो सालों से एक नया वर्ग सौहार्द समीकरण बनाने में लगे हुए थे. सुहेलदेव यात्रा से लेकर रविदास जयंती और अंबेडकर जयंती के भव्य आयोजन हुए, प्रधानमंत्री आंबेडकर के जन्मस्थान महू गए और यह भी बताना नहीं भूले कि वे पहले प्रधानमंत्री हैं जो बाबा साहब के जन्मस्थान तक पहुंचे हैं. इन आयोजनों के जरिए भाजपा ने दलितों को अपने पाले में लाने का पूरा प्रबंध कर रखा था. इस अभियान के साथ संघ ने भी अपनी ताकत झोंक रखी थी. मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के हालिया विस्तार में छह दलितों और आदिवासियों को शामिल कर अपनी दलित हितैषी सोच को धार दी थी.

कागजों पर जितना मजबूत भाजपा का तिलिस्म दिख रहा था यथार्थ उसके विपरीत है

तो कागजों पर इतने मजबूत समीकरण से पैदा हुई परिस्थितियां भाजपा के लिए बड़ी खुशी का सबब थे. फिर अचानक से पिछले एक पखवाड़े के दौरान जो कुछ हुआ उससे ऐसा लगता है कि कागज पर दिख रही ताकत कागजी है, सच्चाई कुछ और है.

ब्राह्मण कार्ड

कहानी में मोड़ आने की शुरुआत हुई 15 जुलाई से. कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. इस घोषणा ने अचानक से सूबे के एक बड़े और प्रभावशाली वोटबैंक को भाजपा से कुछ हद तक विमुख कर दिया. हालांकि शीला दीक्षित की उम्मीदवारी की राह में उनकी उम्र एक बाधा बन रही है. इसके बावजूद राजनीति के जानकारों की मानें तो कांग्रेस ने इस दांव के जरिए बाकी पार्टियों से बढ़त बना ली है. लंबे समय बाद किसी पार्टी ने प्रदेश में ब्राह्मण को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया है.

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भाजपा के नजरिए से देखें तो फिलहाल उसका कोई भी ब्राह्मण चेहरा प्रदेश के सियासी आसमान पर चमक नहीं पा रहा. भाजपा के एक नेता कहते हैं, 'पिछले पच्चीस सालों के दौरान ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में उसी तरह से वोटबैंक में तब्दील हुआ है जैसे मुसलमान. अब वह जहां अपना फायदा सबसे अधिक देखता है उसके पक्ष में एकतरफा मतदान करता है. शीला दीक्षित को सीएम पद का उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस ने एक बड़े हिस्से को भाजपा से दूर कर दिया है. जाहिर है पार्टी को अब शीला दीक्षित के मुकाबले में एक ब्राह्मण चेहरा देना होगा. कांग्रेस के इस कदम से ब्राह्मणों को लेकर सभी पार्टियों में होड़ शुरू हो सकती है.'

एक सच्चाई यह है कि अब तक प्रदेश में सबसे ज्यादा ब्राह्मण मुख्यमंत्री हुए हैं, दूसरी सच्चाई यह है कि 1989 के बाद से यानी 27 सालों से कोई भी ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना है.

भाजपा के मुकाबले देखा जाय तो बसपा भी बेहतर स्थिति में है. उसके पास सतीश मिश्रा के रूप में एक ब्राह्मण नेता पहले से है और यह आम धारणा है कि जब बसपा की सरकार बनती है तब मिश्रा के जरिए ब्राह्मणों की चांदी रहती है. बसपा इसे सर्वजन फॉर्मूला कहती है.

उत्तर प्रदेश: दयाशंकर पर फिसली भाजपा को स्वाति का सहारा

प्रदेश की आबादी में लगभग 12 फीसदी ब्राह्मण हैं. बसपा और काग्रेस के दांव से एक बात तय है कि इस तबके का भ्रम और बढ़ा है जो कि भाजपा के लिए सुखद स्थिति नहीं है. भाजपा प्रदेश इकाई के एक नेता कहते हैं, 'एक बड़ी जाति के हाथ से निकलने की सूरत में बहुत संभव है कि भाजपा दूसरी अहम जाति ठाकुरों पर दांव लगाए. प्रदेश में हमारी पार्टी सीएम पद के लिए ठाकुर नेता का नाम सामने ला सकती है.'

लंबे समय बाद किसी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया है

भाजपा ठाकुरों के मामले में पूरी तरह से बैकफुट पर आ गई है. दरअसल भाजपा का एक तीर से दो नुकसान हो गया है. पार्टी के उत्तर प्रदेश इकाई के पूर्व उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने बसपा अध्यक्ष मायावती की तुलना वैश्या से कर दी. इसके बाद एक राजनीतिक तूफान आया जिसमें संसद का एक पूरा दिन उड़ गया, लखनऊ की सड़कें नीले झंडे से पट गईं जो दलित मायावती से विमुख नजर आ रहा था वह फिर से गोलबंद हो गया.

अचानक से वीराने में खोई मायावती राजनीति के केंद्र में आ गईं. भाजपा के इतर देश की लगभग सभी पार्टियां मायावती के पक्ष में खड़ी हो गईं. मायवती संवेदना का केंद्र बन गईं. दलित अस्मिता की आंच दहकने लगी. जो मायावती पिछले लोकसभा चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल सकी थीं उनके पीछे अचानक से दलित आ जमे. अवसर देख मायावती के समर्थकों ने लखनऊ में बल प्रदर्शन किया. वहां भी लगभग वही सब दोहराया गया जो दयाशंकर सिंह ने मायावती के लिए कहा था.

मायावती को रक्षात्मक कर देने वाली स्वाति सिंह हैं एमबीए, एलएलबी और एलएलएम

भाजपा ने आनन फानन में दयाशंकर सिंह से किनारा कर लिया. उन्हें पद और पार्टी दोनों से चलता कर दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि सूबे की दूसरी प्रभावशाली जाति राजपूत भी बुरी तरह से बिदक गई. देर से जगते हुए बेटी के सम्मान में भाजपा मैदान में उतरी. पर नुकसान हो चुका था. अब भाजपा दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाती सिंंह के जरिए नुकसान की भरपायी करना चाहती है.

ठाकुर सूबे में लगभग 7.5 फीसदी हैं. लेकिन संसाधनों पर हिस्से और राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से वे ब्राह्मणों के बाद दूसरे नंबर पर आते हैं. वीपी सिंह, वीर बहादुर सिंह जैसे राजपूत नेता प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. मौजूदा भाजपा की सरकार में गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी सूबे के सीएम रह चुके हैं. वर्तमान समय में उन्हें ठाकुरों का सबसे बड़ा नेता माना जाता है. लेकिन दयाशंकर सिंह की करतूत और उनके साथ हुए बरताव ने ठाकुरों का मोहभंग किया है.

दूसरी तरफ प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी है जिसका क्षत्रिय नेताओं और वोटरों से रिश्ता ठीकठाक रहता है. एक समय में उसके पास अमर सिंह से लेकर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया जैसे क्षत्रिय नेता थे. संयोग से यह युगल जोड़ी आज फिर से सपा के साथ खड़ी है. लिहाजा दयाशंकर और भाजपा से चोट खाए ठाकुर मल्हम की तलाश में सपा के पाले में जा सकते हैं. जोड़तोड़ के महारथी मुलायम सिंह भी इस माकूल मौके को चूकेंगे नहीं.

वोटबैंक के लिहाज से दलित उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा तबका है

इसके दूसरी तरफ वो दलित खड़े है जिनका अपमान हुआ है. मायावती अपने अपमान को दलितों के अपमान से जोड़ने में पूरी तरह से सफल होती दिख रहीं हैं. ऐसे में भाजपा और संघ मिलकर लंबे समय से उत्तर प्रदेश में दलितों को लेकर जो सियासत बुन रहे थे उसकी हवा निकलती दिख रही है.

वोटबैंक के लिहाज से दलित प्रदेश का सबसे बड़ा तबका है. 22 फीसदी आबादी के साथ यह हमेशा उस स्थिति में रहता है जहां से किसी भी एक बड़े वोटबैंक का साथ मिलने पर यह सरकार बना सकता है. वह मुसलमान भी हो सकता है और ब्राह्मण भी.

भाजपा के नजरिए से उत्तर प्रदेश की स्थिति को एक और तरीके से समझा जा सकता है. भाजपा और नॉन भाजपा वोटबैंक. चमार (8.5%), यादव (15%) और मुसलमान (19%) यह वो वोटबैंक है जो पूरी तरह से भाजपा के खिलाफ वोट करता हैै. यह मिलाकर लगभग 42 फीसदी हो जाता है. इसके बाद भाजपा की उम्मीदें टिकती हैं बाकी बचे लगभग 58% हिस्से पर. इसमें आते हैं ठाकुर, ब्राह्मण, ओबीसी (यादव के अलावा) और दलित (चमार के अलावा).

इस हिस्से को लेकर मारामारी सबसे ज्यादा मची हुई है. ठाकुरों को लेकर सपा और ब्राह्मणों को लेकर बसपा, कांग्रेस के पास प्लान 'बी' तैयार है. अगर समय रहते ठाकुरों और ब्राह्मणों को लेकर हुए नुकसान से भाजपा नहीं उबरती है तो 2017 में उसका अवध गमन अधर में लटक सकता है.

फिलहाल उसके हाथ में ओबीसी की यादवों के अतिरिक्त बची हुई जातियां ही मजबूती से खड़ी दिख रही हैं. लेकिन ये जातियां हमेशा यूपी की सियासत में हाशिए का हिस्सा रही हैं. कागजों पर जितना मजबूत भाजपा का तिलिस्म दिख रहा था यथार्थ उसके विपरीत है.

हालांकि 2014 में भाजपा इस तिलिस्म को तोड़ चुकी है जब यादव और चमार भी अपनी जातिगत पहचान से ऊपर उठते हुए हिंदू हो गए थे. लेकिन समाजवादी पार्टी के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर मजेदार बात कहते है, 'काठ की हांडी दूसरी बार नहीं चढ़ती.' उनका इशारा मोदी लहर की ढलान की ओर था.

First published: 27 July 2016, 7:58 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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