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सपा का सिल्वर जुबली महोत्सव बन सकता है महागठबंधन का मंच

रंजीव | Updated on: 5 November 2016, 7:48 IST
QUICK PILL
  • नब्बे के दशक में जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनायी थी, तब वह दौर जनता परिवार के जुड़ने, फिर बिखरने का था. 
  • उसके ढाई दशक बाद 5 नवंबर यानी कल जब समाजवादी पार्टी अपनी स्थापना की रजत जयंती मनाएगी तो उसके बहाने समाजवादी धड़ों को एकजुट करने की नयी कवायद भी शुरू होगी. 

समाजवादी पार्टी की रजत जयंती स्थापना समारोह के मंच पर मुलायम सिंह यादव के साथ जदयू के शरद यादव और केसी त्यागी, राजद के लालू प्रसाद यादव, जनता दल (एस) के एचडी देवेगौड़ा, रालोद मुखिया अजित सिंह और इंडियन नेशनल लोकदल के अजय चौटाला मौजूद रहेंगे.

मौका समाजवादी पार्टी की स्थापना के जलसे का जरूर होगा लेकिन इसका सियासी मकसद साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बना कर लड़ने का संदेश देना है.   

समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव बनाम शिवपाल यादव खेमों की रार के कारण नीतीश कुमार समेत कुछ नेता आयोजन में न शामिल होने का मन बना चुके थे लेकिन तीन नवंबर को लखनऊ से शुरू हुई अखिलेश यादव की रथ यात्रा के बाद घटनाक्रम बदला. 

रथ यात्रा को हरी झंडी दिखाने के मंच पर समाजवादी पार्टी के धड़ों का एकजुट होकर दिखना और उसके बाद सपा के शीर्ष स्तर से पटना और दिल्ली में कुछ फोन खड़खड़ाने के बाद हालात बदले. उसके बाद ही पांच नवंबर के आयोजन के कर्ता-धर्ता शिवपाल सिंह यादव ने ऐलान किया कि सभी प्रमुख नेता पांच नवंबर को आएंगे. हालांकि अंतिम समय में नीतीश कुमार ने इस आयोजन में शामिल हो पाने में अपनी असमर्थता जताते हुए कहा है कि शरद यादव उनके प्रतिनिधि के तौर पर आयोजन में शामिल होंगे.

इस आयोजन में कांग्रेस की ओर से कोई शामिल होगा या नहीं, इसके संकेत अभी तक साफ नहीं हैं लेकिन इतना साफ है कि सपा के मंच से महागठबंधन की तस्वीर पेश करने के बहाने इसके कई किरदार दरअसल अपना निजी लक्ष्य भी साधेंगे. 

नीतीश के इरादे

नीतीश कुमार केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद से ही महागठबंधन के पैरोकार रहे हैं. बिहार चुनाव से पहले जनता परिवार के धड़ों के विलय की उनकी कोशिश समाजवादी पार्टी के अड़ियल रवैए के कारण परवान नहीं चढ़ी. उसके बावजूद बिहार में लालू प्रसाद और कांग्रेस के साथ मिल कर उन्होंने विधानसभा का चुनाव जीता. 

गैर भाजपा दलों को एक प्लेटफार्म पर लाने की बातें वह पहले भी करते रहे हैं. उत्तर प्रदेश के चुनाव में यह मुमकिन हो इसकी कोशिशें वे अजित सिंह की पार्टी समेत प्रदेश के कुछ अन्य छोटे दलों के साथ बातचीत के जरिए कर चुके हैं. 

बिहार में मोदी को हराकर राज पाने के बाद भी पड़ोसी उत्तर प्रदेश में विपक्ष को एकजुट करने की नीतीश की कोशिशें यूं ही नहीं हैं. बिहार में भाजपा के साथ साझा सरकार चलाने के दिनों में मोदी और नीतीश की आपसी तल्खी और लोकसभा चुनाव में जदयू का दो सीटों पर सिमट जाने को इसकी बड़ी वजह माना जाता है. बिहार में मोदी की हार नीतीश की निजी जीत भी थी. अब वे उत्तर प्रदेश में भी मोदी की हार देखना चाहते हैं. महागठबंधन के बहाने भाजपा के खिलाफ गैर भाजपा दलों की चुनावी लड़ाई को मजबूती देने के साथ ही यह उनका निजी रण भी है.

दृष्टि 2017 पर लक्ष्य 2019

2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महागठबंधन का तानाबाना भले ही बुना जा रहा है लेकिन असली लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव है. बिहार के बाद हिन्दी पट्टी के एक और प्रमुख राज्य में भारतीय जनता पार्टी को अगर महागठबंधन ने सत्ता में आने से रोक दिया तो उसकी धमक और उसका संदेश दूर तक जाएगा.

लोकसभा के अगले चुनाव से पहले गैर भाजपा दलों के हौसले बढ़ेंगे वहीं भाजपा के लिए असहज स्थिति बनेगी. नीतीश कुमार के जनता दल यू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनके समर्थक उन्हें विपक्षी धड़े में प्रधानमंत्री के लायक चेहरे के रूप में भी देखने लगे हैं. यह चेहरा तभी और निखरेगा अगर उत्तर प्रदेश में भी फतह मिल गयी. 

नेताजी की निगाहें

बिहार में महागठबंधन से आखिरी वक्त पर अलग हो जाने के बावजूद उत्तर प्रदेश में इसकी पहल के पीछे समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह की क्या रणनीति है? यहां भी नजरें 2019 पर हैं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में अगर गैर भाजपा दलों के महागठबंधन ने मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी को हरा दिया तो मुलायम का कद बढ़ेगा.

2019 में गैर भाजपा दलों के नेता के रूप में वह भी उभरेंगे. लालू प्रसाद के अड़ंगे के कारण एक बार प्रधानमंत्री न बन पाने का अफसोस सपा प्रमुख कई बार बयां कर चुके हैं. लालू अब उनके करीबी रिश्तेदार हैं. ऐसे में महागठबंधन के बहाने सबसे बड़ी कुर्सी के दावेदार के रूप में मुलायम को सामने लाने से उनके समर्थक गुरेज नहीं करेंगे. 

कांग्रेस की दिलचस्पी

उत्तर प्रदेश में गैर भाजपा दलों के संग मिल कर चुनाव लड़ने की कांग्रेस की मंशा भी 2019 की उसकी हसरतों से ही जुड़ी हैं. लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार के बाद बिहार में महागठबंधन का हिस्सा बन कर ही वह भाजपा के खिलाफ जीत का जश्न मना पायी. 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा का रथ विपक्षी पाले ने रोकने में कामयाबी पायी तो केन्द्र में भगवा पाले की मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव से पहली न सिर्फ खासी ऊर्जा मिलेगी बल्कि राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता को लेकर उठते रहे सवालों पर भी तात्कालिक रूप से विराम लग सकेगा. कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सपा प्रमख मुलायम सिंह यादव से बीते दिनों लखनऊ मुलाकात यूपी में महागठबंधन की बात को बढ़ाने के सिलसिले में ही हुयी. 

अखिलेश को भी भाए

महागठबंधन बना तो अखिलेश के लिए भी यह मुफिद होगा. अव्वल तो गैर भाजपा वोटों का बंटवारा नहीं होगा. खास तौर पर मुस्लिम वोटों के बिखराव से भाजपा को लाभ की जो संभावनाएं उत्तर प्रदेश में बनतीं दिख रहीं हैं, उस पर काफी हद तक विराम लगेगा. दूसरे, महागठबंधन की ओर से अखिलेश को चेहरा बता कर चुनाव प्रचार की संभावनाएं बढ़ेंगी. खास तौर पर नीतीश कुमार इसके प्रबल पक्षधर बताए जातें हैं.

समाजवादी पार्टी में किसी नए विवाद को न जन्म देने के लिए चुनाव बाद ही मुख्यमंत्री तय करने की बातें की जा रहीं हैं लेकिन पाला बढ़ा और महागठबंधन के रूप में बाकी पार्टियां भी हिस्सा बनीं तो चेहरा अखिलेश के ही होने पर मुहर लग जाने की संभावना भी बढ़ेगी. लिहाजा 2017 में दोबारा सत्ता में लौटने और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर फिर बैठने की अखिलेश की मुहिम में महागठबंधन अड़ंगा कम और सहूलियत ज्यादा लेकर आएगा.

कुछ ऐसा ही राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजित सिंह के मामले में भी है. लोकसभा चुनाव में उऩके जाट वोट बैंक में भाजपा की सेंध ने अजित सिंह को सियासी तौर पर हाशिए पर ला दिया है. लिहाजा महागठबंधन का हिस्सा बन कर वह यूपी में अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता वापस पाना चाहेंगे. 

बहन जी का एकला चलो

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती गैर भाजपा खेमे की अकेली ऐसी नेता हैं जो फिलहाल किसी पाले की ओर झुकतीं नहीं दिख रहीं. उन्होंने एकला चलो की नीति अख्तियार की है. 2017 में कामयाबी बसपा के बेहतर सियासी भविष्य के लिए जरूरी है. दलितों और पिछड़ा वर्ग की छोटी-मझोली कई जातियों में बसपा के प्रभाव कारण ही यूपी में मायावती के बगैर किसी महागठबंधन की कामयाबी की संभावनाओं पर सवाल भी उठते रहे हैं.

नीतीश कुमार यह कह भी चुके हैं कि महागठबंधन तभी बन सकेगा जब उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा हाथ मिलाएं. इसके लिए वे बिहार में उनकी और लालू प्रसाद की सियासी दुश्मनी खत्म कर हाथ मिला लेने की मिसाल जरूर देते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की तल्खी सियासी कम और निजी ज्यादा है.

 नब्बे के दशक में दोनों दलों के एक होने और फिर अलग होने के बाद लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड ने सियासी तनातनी को व्यक्तिगत लड़ाई में तब्दील कर दिया जिसकी खटास अभी तक कायम है. लिहाजा उत्तर प्रदेश में महागठबंधन बनने की सूरत में उसमें शामिल दलों में सीटों का बंटवारा तो शायद फिर भी हो जाए लेकिन पाले में बसपा का आना बेहद मुश्किल लगता है.

First published: 5 November 2016, 7:48 IST
 
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