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बनारस: बागियों ने कमजोर किया मोदी का किला, राहुल-अखिलेश की जोड़ी कर सकती है कमाल

आवेश तिवारी | Updated on: 4 February 2017, 8:22 IST

उत्तर प्रदेश विधानसभा में वाराणसी की आठ विधानसभा सीटें भाजपा का ही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और स्वीकार्यता को तय करेंगी. पीएम की संसदीय सीट होने की वजह से समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी ने यहां की सभी विधानसभाओं में जमकर किलेबंदी की है. कांग्रेस ने अपने पूर्व सांसद राजेश मिश्रा को शहर दक्षिणी सीट से उम्मीदवार बनाया है यह सीट पिछले 26 वर्षों से भाजपा की परम्परागत सीट रही है.

इसी तरह कांग्रेस ने पीएम मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले अजय राय को पिंडरा विधानसभा से उम्मीदवार बनाया है. जैसा की उम्मीद थी कैंट और रोहनिया विधानसभा से भी बेहद ताकतवर उम्मीदवारों को उतारा गया है.

ऐसे समय में जब भारतीय जनता पार्टी के साथ साथ आरएसएस के कार्यकर्ता टिकट वितरण को लेकर बेहद नाराज है, चुनाव से पहले ही यह तय माना जा रहा है कि इस बार मत प्रतिशत भी कम रहेगा, तब बनारस जिले की भाजपा इकाइयों के भीतर मचा दंगा उम्मीदवारों के लिए मुश्किलें खड़ा करेगा, बनारस के नतीजों पर सबकी निगाह जा टिकी है.

भाजपा के सामने बागियों की दीवार

उत्तर प्रदेश की ही नहीं देश की राजनीति में राजनारायण, कमलापति त्रिपाठी, डॉ संपूर्णानंद जैसे दिग्गज नेताओं का कद तय करने में बनारस की विधानसभा सीटों  की बड़ी भूमिका रही है. लोकसभा चुनाव में जब प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम बनारस से उम्मीदवार के तौर पर तय किया गया तो इसके मूल में वजह यही थी कि भाजपा न सिर्फ हिंदी भाषी राज्यों में बल्कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी अपनी उपस्थिति को मजबूत करना चाहती थी. नतीजे भी अच्छे आये और नरेंद्र मोदी रिकार्ड मतों से विजयी हुए.

लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री ने जिस तरह से बनारस के ताबड़तोड़ दौरे किये उससे न केवल बनारस बल्कि समूचे पूर्वांचल में भाजपा और मोदी के पक्ष में लहर बन गई थी. इस लहर ने पूर्वांचल के ज्यादातर हिस्सों में परंपरागत रूप से कमजोर रहे भाजपा के संगठन और नेताओं की महत्वाकांक्षा को भी पर लगा दिए. हर नेता इस लहर पर सवार होकर सत्ता के मुहाने तक पहुंचने की इच्छा रखने लगा है. इसका खामियाजा टिकट वितरण के दौरान सामने आया है.

बनारस भाजपा भी इससे अछूती नहीं हैं. टिकट वितरण के बाद अब पार्टी के भीतर तो असंतोष देखा ही जा रहा है, सुनने में आ रहा है कि संघ भी टिकट वितरण को लेकर बुरी तरह से नाराज है. शहर दक्षिणी से भाजपा के कद्दावर विधायक श्यामदेव राय कहते हैं, 'अजीबो गरीब बात यह है कि पार्टी के किसी भी स्थानीय नेता को विश्वास में ही नहीं लिया गया जबकि ऐसे गतिरोध आसानी से दूर किये जा सकते थे.'

नए का रोग पुराने की नाराजगी

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, 'उत्तर प्रदेश और केंद्र में भाजपा की जो नई टीम बनी है वो पुराने लोगों से राय नहीं लेती लोकसभा चुनाव में उनका यह फार्मूला सही साबित हुआ था. लेकिन विधानसभा चुनाव में यह फार्मूला कारगर होगा इसकी उम्मीद कत्तई नहीं है.'

पीएम मोदी की बनारस सीट से उम्मीदवारी के लिए लड़ाई लड़ने वाले तिलक राज मिश्रा जैसे नेताओं को हाशिये पर रख दिया गया, दल बदल कर आये लेकिन बड़ा कद रखने वाले दयालु जैसे नेताओं को भी टिकट वितरण में पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया.

यह बात सच है कि यूपी के विधानसभा चुनाव में स्थानीयता और जात-पात का असर बेहद गहरा पड़ता है और निस्संदेह समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा इसका बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं. इन तीनो ही पार्टियों ने अपने सबसे मजबूत और दिग्गज प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है. गठबंधन के बावजूद उम्मीदवारी तय करने में कांग्रेस ने  स्थानीय पसंद का ख्याल इस कदर रखा है कि सूची जारी होने से पहले ही कांग्रेस के घोषित उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार शुरू हो चुका था.

घर घर प्रचार न हुआ तो क्या होगा

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक पदाधिकारी जो टिकट वितरण और नेताओं की मनमानी से बेहद आहत हैं कहते हैं, 'हमने थाल में सजाकर जीत विपक्ष को सौंप दी है, मुझे न जाने क्यों लगता है कि पार्टी के भीतर ही कुछ लोग मोदी जी को असफल साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. पार्टी ने ओम माथुर और सुनील बंसल को टिकट तय करने की जिम्मेदारी दी थी. इसकी एकमात्र वजह लोकसभा में पार्टी का प्रदर्शन था जबकि विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश को और गहराई से देखने की जरुरत थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया.'

वो कहते हैं कि बनारस में घर-घर जाकर प्रचार करने से ही माहौल बनता था लेकिन जब संघ और भाजपा के लोग निकल कर वोट मांगेंगे ही नहीं तो उम्मीदवारों का क्या होगा? गौरतलब है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां की आठ सीटों में से भाजपा ने तीन, सपा और बसपा ने दो दो और कांग्रेस ने एक सीट जीती थी.

First published: 4 February 2017, 8:22 IST
 
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