Home » उत्तर प्रदेश चुनाव » Why demonisation of the Rohingya in Jammu is criminal, and dangerous
 

जम्मू:रोहिंग्या शरणार्थियों पर हमला आपराधिक और ख़तरनाक है

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 February 2017, 9:13 IST

13 फरवरी 2017 के द इंडियन एक्सप्रेस अखबार में जम्मू-कश्मीर की पैंथर्स पार्टी पर एक आलेख था, जिसमें उन्होंने रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को जम्मू छोड़कर जाने को कहा है. आलेख में भाजपा के विधि प्रकोष्ठ के सदस्य हुनर गुप्ता द्वारा रोहिंग्या के निर्वासन के संबंध में दर्ज की गई पीआईएल का भी ज़िक्र था. पैंथर्स पार्टी और भाजपा हमें मनवाना चाहती हैं कि रोहिंग्या और बांग्लादेशी डोगरा के लिए खतरा बन रहे हैं. मैं यहां रोहिंग्या का जिक्र कर रही हूं. मैंने जम्मू सहित अन्य जगह रह रहे इन शरणार्थियों से 5 साल तक बतौर शोधार्थी बात की है.


भारत में शरणार्थियों के आश्रय को लेकर विशेषज्ञ सहमत होंगे कि शरणार्थियों को यहां से चले जाने की बार-बार मांग से केवल सीमित मकसद पूरा होता है. इससे सार्वजनिक उन्माद पैदा होता है, लोगों में चिंता पैदा होती है कि शरणार्थी समुदाय परेशानी खड़ा कर सकता है. इससे फिर वह उत्पीड़न तर्कसंगत बन जाता है, जिसका कि वे अक्सर शिकार होते हैं.


ज़ाहिर है, जम्मू के संदर्भ में पैंथर्स पार्टी और भाजपा इस बात को बड़े आराम से अनदेखा कर रहे हैं कि रोहिंग्या कानूनी तौर पर स्टेटविहीन हैं. वे ‘स्टेट के किसी भी कानून के अधीन वहां के देशवासी नहीं माने जाते.’ वे बर्मा के 135 जातीय समूह में नहीं माने जाते और उन्हें बर्मा के नागरिक माने जाने के लिए खुद को ‘बंगाली’ मानना होगा.


आज इस समुदाय के साथ विश्व में सबसे ज्यादा पक्षपात है और म्यांमार से वे काफी संख्या में लगातार भाग रहे हैं. वहां उनका जीवन खतरे में है. इस तरह उनके ‘निर्वासन’ की मांग, बिना उसके नतीजे पर विचार किए, नॉन-रिफाउलमेंट के सिद्धांत का साफ उल्लंघन है. इससे म्यांमार में इस समुदाय पर हो रहे अपराध भी बढ़ेंगे.

 

हमारी दया पर शरणार्थी


भारत ने शरणार्थियों को हमेशा सिर माथे बैठाया है, पर इसके लिए भारत जवाबदेह नहीं है. कइयों में उनके लिए भावना मानवता के नाते है, तो कइयों का उनके साथ दो टूक व्यवहार है. वे हमारे मूल संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे हैं. भारत के न्यायालयों में शरणार्थियों के संबंध में सरकार की नीतियों पर कभी सवाल नहीं किया गया.


खुशकिस्मती से कुछ ट्रायल कोर्टों ने शरणार्थी कानून बनाने की सिफारिश की है. कुल मिलाकर, शरणार्थी हमारी दया पर जी रहे हैं. इस परिदृश्य में रोहिंग्या को चले जाने को कहना राजनीतिक पार्टियों की कूटनीति है, जिसमें वे आसानी से निशाना बन जाते हैं. इस स्थिति पर सरकार पर्याप्त चिंता क्यों नहीं करती?


कोई कह सकता है कि मिजोरम में मिजोवासी चिन शरणार्थियों को म्यांमार वापस जाने के लिए अक्सर कहते हैं. तथाकाथित समाज सेवा संगठन यंग मिजो एसोसिएशन (वाइएमए), ऐसे प्रकरणों में अक्सर आगे रहा है. बर्मावासियों को इस आधार पर निशाना बनाया गया कि वे ड्रग्स के कारोबार, रेप, हत्या आदि कई अपराधों में संलग्न थे.


यह तथ्य कि ये आरोप पर्याप्त थे और मिजोरमवासी भी अपराध में संलग्न थे, से कोई अंतर नहीं पड़ा. वाइएमए ने ‘विदेशी’ जनसंख्या की गणना की, कई घोषणाएं कीं ताकि इस तरह के सभी ‘बाहरी लोगों’ को आसानी से निकाला जा सके. समय के साथ, मिजो-चिन के संबंध चिन शरणार्थियों के उत्पीड़न की घटनाओं के साथ स्थिर रहे. जब सत्ता और महत्व की बात हुई, तो उत्पीडऩ की घटनाएं हुईं. जहां तक मुझे मालूम है, आज तक उनकी गणना नहीं हुई.


शरणार्थी समुदायों को ‘भारत छोड़ो’ जैसे नोटिस अदूरदर्शितापूर्ण है, पागलपन है. इससे आगे जाकर सरकार और शरणार्थी दोनों की चिंताओं का न्यायसंगत हल नहीं हो सकेगा. इसलिए भाजपा के गुप्ता द्वारा फाइल पीआईएल के कुछ सवालों में से एक, मसलन, जिस पर जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट को विचार करना है, वह है कि रोहिंग्या शरणार्थियों के निर्वासन से राहत पाने की सवैंधानिक वैधता का प्रश्न. विदेशियों को भारत में अपनी मर्जी से घूमने का मौलिक अधिकार नहीं है, तो क्या एक अनुरोध कि रोहिंग्या जम्मू छोड़कर कहीं भी चले जाएं, कानूनन मान्य है?

 

लॉन्ग टर्म वीज़ा नीति

 

रोहिंग्या के बहाने देश में शरणार्थियों से संबंधित कुछ अच्छी नीतियां बनी हैं. 2012 में भारत सरकार ने रोहिंग्या के लिए लॉन्ग टर्म वीजा (एलटीवी) की नीति का विस्तार किया, हालांकि इसका पूरा प्रभाव अभी देखना बाकी है. इस नीति से कई दशकों में पहली बार रेफ्यूजी स्टेटस डिटरमिनेशन (आरएसडी) जैसी प्रक्रिया शुरू हुई. यह वीजा निर्गमन प्रक्रिया के हिस्से के रूप में थी. सरकार ने पहली बार यूएनएचसीआर के कार्यालय को उन शहरों और कस्बों में आरएसडी का प्रबंध करने को कहा, जहां रोहिंग्या रह रहे थे.


एलटीवी की व्यवस्था कितनी सकारात्मक और तारीफे काबिल है, इसके लिए उन प्रक्रियाओं के बार में संक्षेप में बताना मुनासिब होगा, जो भारत में शरणार्थियों के रहने को विधिवत करेंगी. भारत में ‘शरणार्थी कानून’ नहीं है. जो दस्तावेज भारत में जनादेश शरणार्थियों की रक्षा की गारंटी देता है, वह है आरएसडी की सफल प्रक्रिया के बाद यूएनएचसीआर द्वारा दिया गया ‘रेफ्यूजी कार्ड’.


इसके बाद उनकी राष्ट्रीयता को देखते हुए शरणार्थियों को एफआरआरओ की ओर से रहने की अनुमति दी जाएगी. अन्यथा यह सुविधा सभी विदेशियों को भारत आने पर प्रमाणिक वीजा पर दी जाती है. इसलिए शरणार्थियों को रहने की अनुमति भारत सरकार की मौन मान्यता है कि शरणार्थियों का भारत में रहना वैध है.

 

संशोधन पर विचार


अगर सरकार महसूस करे कि उसे अपनी सीमा की सुरक्षा का न्यायसंगत अधिकार है और देश में किसी के आने को नियंत्रित करना है, तो उसे आज के दिन में शरणार्थियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी बताने के लिए भी समान रूप से तैयार होना होगा. फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति, नागरिकता अधिनियम, 1955 में प्रस्तावित संशोधनों पर विचार कर रही है.

इसमें अन्य के साथ अनुच्छेद 2 में संशोधन भी है कि विदेशियों के कुछ खास वर्गों-भारत के पड़ोस से आए हिंदू, बौद्ध, पारसी और ईसाई-को वैध किया जाए. हालांकि वे भारत में पहचान के प्रामणिक दस्तावेजों के बिना प्रवेश कर सकते हैं.


यह इसलिए क्योंकि पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों से आए हिंदू शरणार्थी लंबे समय से समस्या का सामना कर रहे हैं. भारत में उन्हें नागरिकता प्रामाणिक दस्तावेजों के अभाव में और नौकरशाही के रोड़ों के कारण नहीं मिल रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों पर धर्म के आधार पर अत्याचार किए जा रहे हैं. जाहिर है, भारत सरकार पड़ोसी देशों के शरणार्थियों को अपनाने और नागरिकता देने को तैयार है. तो रोहिंग्या, जो सिर्फ अपनी पहचान बतौर शरणार्थी ही चाह रहे हैं, उनके साथ वैसा ही व्यवहार क्यों नहीं किया जाता.

First published: 24 February 2017, 9:13 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी