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सपा, भाजपा, बसपा, सबसे बदला लेगी तेरी निषाद पार्टी

अतुल चौरसिया | Updated on: 1 March 2017, 14:57 IST
कैच न्यूज़


गोरखपुर बहुत पानीदार इलाका है. 17,000 एकड़ में फैला रामगढ़ ताल हो या राप्ती, रोहिणी समेत पांच छोटी-मोटी नदियां. इलाका पानीदार है लिहाजा पानी पर निर्भर समाज की भी यहां बहुलता है. आमतौर पर इन्हें निषाद कहा जाता है. हालांकि इसमें मल्ल, केवट, मल्लाह, दुसाध, बिंद, राजभर समेत 15-16 उपजातियां शामिल हैं. पूरे गोरखपुर जिले में इनकी आबादी 14 प्रतिशत है. इसी संख्या के बल पर यहां एक नया समीकरण आकार ले चुका है, एक नया दल ताल ठोंक रहा है, इसका नाम है निषाद पार्टी.


दल का असली नाम निषाद पार्टी नहीं है, यह दरअसल एक भार-भरकम नाम का संक्षिप्त रूप है. इसका पूरा नाम है "निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल" यानी NISHAD. दल के अध्यक्ष हैं डॉ. संजय कुमार निषाद. इस दिलचस्प नाम के बारे में उनका कहना है, 'हमने चुनाव आयोग को कई नाम सुझाए थे. पर आयोग को उन नामों से दिक्कत थी. तब हमने यह नाम ईजाद किया. संयोग से यह हमारी विचारधारा से पूरी तरह मेल खाता है. इलाके में सबसे बड़ी जाति होने के बावजूद अब तक निषादों को अपना हक़ नहीं मिला है. इस बार हम अपना हक लेकर रहेंगे.'

 

बाक़ी दलों में बेचैनी 


निषाद पार्टी के मैदान में ताल ठोंकने से सपा, भाजपा और बसपा सबके हाथ-पांव फूल गए हैं. अब तक का जो चलन गोरखपुर और आस पास के क्षेत्रों में रहा है उससे यह पता चलता है कि निषाद जाति अबतक एक ब्लॉक में वोट नहीं करती थीं. इसके चलते गोरखपुर के शहरी इलाके में यह योगी आदित्यनाथ को समर्थन करती आ रही थीं जबकि ग्रामीण इलाकों में ये आमतौर पर सपा-बसपा को समर्थन देती थीं. यह बहुत कुछ पार्टियों के उम्मीदवारों पर निर्भर करता था.


गोरखपुर सदर की सीट पर निषाद परंपरागत रूप से योगी और भाजपा को समर्थन देते आ रहे थे. लेकिन इस बार निषादों ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी निषाद पार्टी है. गोरखपुर शहर में एक ट्रैवेल एजेंसी में ड्राइवर की नौकरी कर रहे 22 वर्षीय दिवाकर निषाद कहते हैं, 'डॉ. संजय निषाद ने हमको हमारे इतिहास की जानकारी दी है. हमें अब पता चला है कि निषादों का लंबा चौड़ा इतिहास है. अब हमें एक नेता भी मिल गया है. इसलिए अब हम किसी और दल को वोट नहीं दे सकते हैं.' यही भावना अमूमन ज्यादातर मल्लाह बस्तियों के युवाओं और बुजुर्गों में देखने को मिली.


संख्या बड़ी होने के बावजूद निषाद अकेले दम पर कोई राजनीतिक ताकत नहीं थे, न ही इनके पास कोई प्रभावी नेता या नेतृत्व था. इस बार ये दोनों ही स्थितियां बदल गई हैं. डॉ. संजय कुमार निषाद के नेतृत्व में निषादों को एक नेता मिल गया है. संजय ने एक चतुराई भरा गठजोड़ इस इलाके में खड़ा किया है. यह गठजोड़ पीस पार्टी और अपना दल (कृष्णा पटेल धड़ा) के साथ बना है.


संजय कहते हैं, 'यह असली महागठबंधन है. हमने चार पार्टियों का महागठबंधन बनाया है. बसपा के साथ सिर्फ चमारों का फायदा है तो सपा के साथ सिर्फ यादवों का. बाकी दलित और पिछड़ी जातियां अपने हक से लगातार वंचित हैं. इस बार हम सपा-बसपा और भाजपा को हैसियत बता देंगे.'

 

बिगड़ सकता है समीकरण

 

यह गठबंधन वैसे तो पूरे उत्तर प्रदेश की लगभग 150 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रहा है लेकिन गोरखपुर और आसपास की करीब 14 सीटें ऐसी हैं जिस पर निषाद पार्टी-पीस पार्टी का महागठबंधन तीनों बड़े दलों की समीकरण खराब कर सकता है. गोरखपुर ग्रामीण सीट से खुद डॉ. संजय निषाद चुनाव लड़ रहे हैं.

 

इस सीट पर 90 हजार के आसपास निषाद वोटर हैं. साथ ही इस सीट पर करीब सवा लाख मुस्लिम वोटर भी हैं. निषादों के बीच डॉ. संजय के प्रति बहती लहर साफ देखी जा सकती है. अगर यह समीकरण काम करता है तो निषाद पार्टी कई सीटों पर बड़ा उलटफेर कर सकती है.


डॉ. संजय कहते हैं, 'बसपा के साथ भी हमारे लोग जाते थे, योगी आदित्यनाथ को भी वोट देते थे. पर इन लोगों ने कभी भी निषादों को आगे बढ़ने नहीं दिया. योगी ने कभी एक भी निषाद को नेता नहीं बनने दिया. नेता वो अपनी जाति के लोगों को बनाते हैं.'


यह पूछने पर कि सिर्फ निषादों के दम पर सफलता कैसे मिलेगी, क्योंकि मुसलमान तो अभी भी कमोबेश सपा के साथ है, डॉ. संजय कहते हैं, 'डॉ. अयूब के साथ पसमांदा मुसलमान है. इस इलाके में उसकी संख्या सबसे ज्यादा है. अंसारी और बुनकर हमारा साथ देंगे. पासवान बड़ी संख्या में हैं. उन्हें अबतक हाशिए पर रखा गया है. मैंने उन्हें भी टिकट दिया है. ये सब मिलकर हमारी जीत तय करेंगे.'


किताबी आंकड़ों ने और जमीन पर निषाद पार्टी के समर्थकों ने तीनों मुख्यधारा की पार्टियों के माथे पर बल डाल दिया है. इसका असर इस बार सपा, भाजपा और बसपा के टिकट बंटवारे पर भी पड़ा है. सपा ने तीन, बसपा ने चार और भाजपा ने एक निषाद को टिकट दिया है. इसके बावजूद आम निषाद मतदाता निषाद पार्टी के पक्ष में नजर आता है.


गोरखपुर में पानी तेजी से बह रहा है इसके साथ ही पानी पर निर्भर समाज की राजनीति भी तेजी से बह रही है. 11 मार्च को यह कोई बड़ा नतीजा दे सकती है.

 

First published: 27 February 2017, 10:29 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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