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अखिलेश ने की ममता की अगवानी, पुराने रिश्ते में नई गर्माहट की आहट?

फ़ैसल फ़रीद | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
QUICK PILL
  • पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री जब नोटबंदी का विरोध करने लखनऊ पहुंची तो यूपी के सीएम अखिलेश यादव उन्हें लेने अमौसी एयरपोर्ट गए. 
  • क्या यह शिष्टाचार था या फ़िर नोटबंदी के ख़िलाफ़ सर्वाधिक विरोध करने वाली ममता बनर्जी के साथ खड़े रहना अखिलेश की मजबूरी थी?

इसे राजनीति का तकाज़ा कहिए या फिर केंद्र सरकार का विरोध, मगर यूपी के सीएम अखिलेश यादव ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगवानी के लिए अमौसी एयरपोर्ट पर जा कर एक नए राजनितिक रिश्ते का दरवाज़ा खोल दिया है. ममता बनर्जी नोटबंदी का विरोध करने उत्तर प्रदेश पहुंची थीं. 

उत्तर प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव इस विरोध कार्यक्रम में ख़ुद तो शामिल नहीं हुए लेकिन अपने आधा दर्जन मंत्रियो, विधायकों को वहां ज़रूर भेजा. मंत्री, विधायक और सपा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में सभा कामयाब हुई और ममता बनर्जी संतुष्ट. 

अब उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारे में अखिलेश की अगवानी के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. इसमें कोई शक़ नहीं कि ममता नोटबंदी के फैसले के विरोध की एक धुरी बन कर उभरी हैं. उनका विरोध मुखर होने के साथ-साथ सड़क से लेकर संसद तक में दिख रहा है. 

मगर समाजवादी पार्टी ऐसा ज़ोरदार विरोध नहीं कर पाई. ऐसे में अगर सपा ममता से दूरी बना लेती तो उसकी गिनती भाजपा की तरफ सॉफ्ट कार्नर रखने वाले दल की हो जाती. राजनीतिक रूप से चुनावी साल में सपा यह गलती नहीं कर सकती थी. उसे अपने आप को गैर भाजपा, गैर कांग्रेस पाले में खड़ा रखना है.

ममता-मुलायम संबंध

ममता बनर्जी से समाजवादी पार्टी के रिश्ते नरम-गरम रहे हैं. साल 2012 में ममता और मुलायम के रिश्ते में तब खटास आ गई थी जब मुलायम सिंह ने पलटी मार कर राष्ट्रपति के चुनाव में प्रणब मुख़र्जी का सपोर्ट कर दिया था. और ममता एपीजे अब्दुल कलाम के साथ रहीं. मगर अखिलेश ने अब चुनावी साल में अपनी राजनीति को विस्तार देना शुरू कर दिया हैं. बहुत से फैसलों में अखिलेश अपने आप को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पिता मुलायम सिंह से अलग दिखाना चाहते हैं. 

मौक़े की नज़ाकत भांपते हुए अखिलेश ने फ़ौरन सोमवार को अपने विश्वस्त साथी सुनील सिंह साजन और आनंद भदौरिया (दोनों एमएलसी और वर्तमान में सपा से निष्कासित) पर ममता की सभा सफल बनाने का जिम्मा सौंपा. खबरें है कि मंगलवार को ममता के प्रदर्शन में भारी भीड़ जुटाने का काम इन्हीं दोनों नेताओं ने किया था जो कि मुख्यमंत्री के सीधे आदेश पर हुआ. मतलब साफ़ था कि प्रदर्शन सफल होना चाहिए.

हुआ भी वही, जैसा अखिलेश चाहते थे. वह खुद तो इस सभा में नहीं आए लेकिन अपने आधे दर्जन से ज्यादा मंत्रियों, विधायकों को ममता की सभा में हिस्सा लेने के लिए भेजा और सभी का यही कहना था, 'हम मुख्यमंत्री का सन्देश लेकर आये हैं.' 

वहीं अखिलेश ने इसलिए दूरी बनाए रखी क्योंकि ममता का विरोध मोदी के खिलाफ बहुत मुखर है. इस सभा में 'मोदी हाय, हाय' के नारे लगे और अखिलेश ख़ुद को किसी ऐसी स्थिति में बिल्कुल भी नहीं रखना चाहते थे.

पर्दे के पीछे रहे अखिलेश

मान सकते हैं कि ग़ैर-मौजूदगी के बावजूद पर्दे के पीछे अखिलेश साथ खड़े थे. उन्होंने ममता की हर मुमकिन मदद की. ज़िला प्रशासन ने आनन-फानन में प्रदर्शन की अनुमति 1090 चौराहे पर दी जो मुख्यमंत्री आवास से महज़ 1 किलोमीटर की दूरी पर है. चूंकि तृणमूल कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में कोई खास जनाधार नहीं है, इसीलिए भीड़ की ज़िम्मेदारी सपा ने उठायी. तृणमूल कांग्रेस के पास कहने को एमएलए की एक सीट प्रदेश में है लेकिन वो सीट भी श्याम सुंदर शर्मा के खुद के प्रभाव का नतीजा मानी जाती है.  

अखिलेश का इस मौके पर ममता के साथ न जाने का कदम राजनीतिक तौर पर गलत भी होता क्योंकि तृणमूल कांग्रेस को चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दे दिया है और ममता, मोदी विरोध का चेहरा बन कर उभर रही हैं. इधर सपा की स्थिति उसके मुकाबले बहुत कमजोर है. सैद्धांतिक तौर पर सपा की राजनीति भाजपा, सांप्रदायिकता और मोदी के विरोध की है लेकिन हाल के दिनों में अगर हम देखें तो सपा के कई कदमों ने इस भरोसे को कमजोर किया है और इससे उसकी विश्वसनीयता पर आंच आई है. चाहे वो बिहार महागठबंधन से अलग होने का फैसला हो या फिर उत्तर प्रदेश में महागठबंधन का शगूफा छोड़ कर अलग होने की घोषणा. रही-सही कसर मुलायम सिंह यादव जब तब नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करके पूरी कर देते हैं.

बहरहाल, चुनावी साल और राजनितिक मजबूरियां ही सही, लेकिन आपसी तालमेल वाले इस विरोध प्रदर्शन से अखिलेश ने एक राजनीतिक रिश्ते में फिर गर्माहट ज़रूर ला दी है.

First published: 30 November 2016, 7:39 IST
 
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