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बुंदेलखंड: खेती का मौसम नोटबंदी का इंतजार नहीं करता

अंशु कुमारी | Updated on: 24 November 2016, 8:14 IST
QUICK PILL
  • मोदी सरकार ने जबसे 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का फैसला लिया है, बुंदेलखंड के किसानों और आम लोगों की समस्याएं कई गुना बढ़ गयी हैं. 
  • एक-एक दिन की देरी इनके लिए महंगी साबित हो रही है. अभी तक यहां कुछ गांवों के 80 प्रतिशत खेत परती पड़े हुए हैं.

बुंदेलखंड लंबे समय तक सूखे के कारण चर्चा में रहा. लेकिन इसकी त्रासदी ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है. बुंदेलखंड क्षेत्र में आने वाला उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले का मानिकपुर तहसील हर मौसम में प्रकृति की क्रूरता को झेलता आ रहा है. पहले सूखा, उसके बाद ओला, फिर आयी बाढ़. मुसीबतें बुंदेलखंड का स्थायी भाव है.

लेकिन हाल के दिनों में पहली बार यह इलाका मानव निर्मित समस्या की चपेट में हैं. मोदी सरकार ने जबसे 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का फैसला लिया है, इस इलाके के किसानों और आम लोगों की समस्याएं कई गुना बढ़ गयी हैं. मानिकपुर तहसील के गिदुरहा गांव के सुशील कहते हैं, ‘हम किसानों ने पहले सूखा, ओला, फिर बाढ़ को झेला, इस सबसे किसी तरह बचे तो अब मोदीजी की इस मार की चपेट में हैं. रबी फसल की बुआई के ठीक पहले सरकार के इस फैसले ने किसानों की कमर ही तोड़ दी है. क्या प्रधानमंत्री को नहीं पता था कि यह समय खेती-किसानी का है? गेहूं बोने का सबसे अच्छा समय हम गंवा रहे हैं.’

बीज के लिए कहां से लाएं नकदी

सुशील बताते हैं कि स्थानीय ब्लॉक दफ्तर में बीज नहीं मिल रहा है. पुराने नोट से निजी दुकानदार हमें बीज, खाद कुछ भी नहीं दे रहे हैं. 'इस हालत में बैंक हमको पैसा देगा ही नहीं. हमलोग क्या करें? एक-एक दिन की देरी हमारे लिए मंहगा सौदा साबित हो रहा है. अभी तक हमारे गांव के 80 प्रतिशत खेत परती पड़े हुए हैं. नवंबर के अंत तक भी गेंहू की बुवाई नहीं हो सकी है. आगे क्या उम्मीद है?'

उदास सुशील पूछते हैं, ‘किसान फसल न बोये तो क्या करे, आत्महत्या? परिवार साल भर खाएगा क्या? कैसे गुजारा होगा? हमारे गांव में बैंक नहीं है. 25 किलोमीटर दूर मानिकपुर तहसील में बैंक है. इसलिए हमारे गांव में सभी किसान अपने पास नगद पैसा रखते हैं.'

चार मौतें

इस साल बरसात के मौसम में आई बाढ़ के कारण जंगल के पास का गांव ‘गिदुरहा’ किसी अलग-थलग टापू में तब्दील हो गया था. महीनों तक गांव का संपर्क पूरे तहसील से कटा हुआ था. गिदुरहा गांव मानिकपुर तहसील से 25-30 किलोमीटर दूर रानीपुर वन्य जीव संरक्षण केंद्र के तहत छोटी पुलिया को पार कर आता है. इस गांव में ज्यादातर कोल आदिवासी और ईसाई समुदाय के लोग हैं. बाढ़ के बाद पूरा गांव बीमार हो गया, कोई घर ऐसा नहीं था, जिसमें बच्चे और बूढ़े बिस्तर पर न पड़े हों. इनका मुख्य काम खेती-मजदूरी ही है.

नोटबंदी के बाद से गिदुरहा और उसके पास के एक गांव में कुल चार मौतें हुई है. इनमें गिदुरहा से दो मौत हुई है. तीन दिन पहले ही गांव के एक कोल आदिवासी महिला सियावती (35) की टीबी की बीमारी से मृत्यु हो गई. हालांकि इन मौतों का नोटबंदी से सीधा कितना संबंध है, इस बारे में विश्वास से कुछ कह पाना संभव नहीं है. लेकिन एक बात सच है कि जिस महिला की मौत टीबी से हुई है उनके घरवालों के पास अंतिम दिन में दवा के लिए पैसे नहीं थे क्योकि पुराने नोट उनसे कोई ले नहीं रहा था.

प्लास्टिक मनी या पेटीएम के बारे में पूछने पर, गांव के किसान सीए मुकुल उल्टे सवाल दागते हैं, 'यह क्या होता है? यह हम नहीं जानते हैं.' मुकुल बताते हैं कि उनके गांव में किसी को भी इस बारे में नहीं पता है. मुकुल भी नोटबंदी के फैसले से परेशान हैं. वो पूछते हैं कि क्या कालाधन किसानों के पास जमा था? जो इस कटाई- बुआई के समय में सरकार ने यह कदम उठाया. कई साल बाद मौसम को हमारे ऊपर दया आई थी. अच्छी फसल की उम्मीद थी, इस नोटबंदी ने सब बर्बाद कर दिया.'

मुकुल बताते हैं, 'घर में रखे पुराने गेहूं को ही साफ कर बोयेंगे. जहां खेत में बुआई से पहले तीन जुताई लगती थी, वहां हम एक जुताई में ही खेत बो रहे हैं, क्या करें गेहूं को किसी भी तरीके से सीजन में ही बोना होगा, फसल नहीं समझती है नोटबंदी.'

बैंकिंग सुविधा नहीं

गांव के लोगों के लिये बैंक की सुविधा इतनी आसानी से उपलब्ध भी नहीं है. इन इलाकों में करीब दर्जनों गांवों को मिलाकर एक बैंक खोला जाता है. मुकुल अपनी कहानी बताते हैं, 'बैंक एक दिन मैं भी गया था, दिन भर लाइन में लगा रहा, पैसा नहीं मिला. फिर नहीं गया. क्योंकि हमें बैंक जाने- आने में 40 रुपए लगते हैं. इतना पैसा हम कहा से लायेंगे. आने जाने का साधन नहीं है. सुबह एक लॉरी (ऑटो) यहां से जाती है और शाम को वही फिर वापिस आती है. मजदूर की स्थिति तो और भी दयनीय है. न काम मिल रहा है न मजदूरी.'

2000 के नये नोट के बारे में पूछने पर लोग बहुत दिलचस्प जवाब देते हैं. सुशील कहते हैं, ‘नहीं, अभी हमारे गांव में किसी ने भी नया नोट नहीं देखा है. लेकिन मानिकपुर के कुछ लोग बता रहे थे कि नया नोट बच्चों के खिलौने जैसा है.'

हालांकि ऐसा नहीं है कि सुशील जैसे किसान सरकार के कालाधन के खिलाफ मुहिम के खिलाफ हैं. उनका बस इतना कहना है कि, 'सरकार यह फैसला फ़रवरी या मई-जून में भी कर सकती थी. रबी की पैदावार अच्छी नहीं हो पायेगी, इसका जबावदेह कौन होगा? किसानों और उसकी फसल से इस देश में किसी को कोई मतलब ही नहीं है.'

देश के किसानों की आवाज ट्विटर और फेसबुक के पोस्ट पर नहीं आती है. लेकिन उनका सवाल देश के प्रधानमंत्री और उनके सलाहकारों को समझने की जरुरत है. उस सरकार को अपने देश की खेती-किसानी को समझने की जरुरत है, जो बड़े फैसले करते वक्त किसानों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है. उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक राज्य है. देश के कुल गेहूं उत्पादन में 36 प्रतिशत गेहूं उत्तर प्रदेश में पैदा होता है. ऐसे में गेहूं की फसल में होने वाला नुकसान केवल किसानों का है या इस देश की अर्थव्यवस्था का भी?

कालाधन से जुड़ी बहस में इस ‘कौलेटरल डैमेज’ का हिसाब भी बहुत जरुरी है.

First published: 24 November 2016, 8:14 IST
 
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